सफर जारी है....930
08.05.2022
आपने अनुभव किया होगा कि कभी कभी आप होते तो हो पर आप नहीं होते,आपके अस्तित्व को नकार दिया जाता है, आप लोगों की निगाह में नहीं चढ़ पाते ,उनकी अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पाते तो वे आपको अपने खाते से माइनस कर देते हैं। यानी उनके लिए आप होकर भी नहीं होते।आप भीड़ से घिरे होते हैं पर आप बेहद अकेलापन महसूसते हैं, इसके जस्ट बिपरीत भी होता है जब आप बिल्कुल अकेले हों फिर भी कुछ यादें, कुछ साथ ,कुछ बातें आपको भरापूरा रखती हैं। हाथ और झोली भले ही खाली हो पर आप खुशी के सागर में डूबते उतराते रहते हो, क्योंकि आप मन से बड़े समृद्ध होते हैं। और ऐसा आप अकेले के साथ ही नहीं होता,इस श्रेणी में बहुत से लोग आते हैं।वे मन के निश्छल, भोले भाले, सीधे सादे कहें तो बिल्कुल सिम्पलटन, छल कपट से दूर भले ही हो पर बेहद अव्यावहारिक होते हैं।बात बात पे सोचते बहुत हैं।नियमों और सिद्धांतों के पीछे लठ लेकर पड़े रहते हैं। इनकी समझ में दो दूनी चार का गणित ही आता है।दुनियादारी में निल बटा निल होते हैं।स्कूल की पढ़ाई में भले ही सौ में से नब्बे ले आते हों पर जीवन की पढ़ाई में कभी पास नहीं हो पाते।
बार -बार ठगे जाते हैं पर अपने नियमों में कोई हीला हवाला बर्दाश्त नहीं करते।दुनिया ऐसों को शेखचिल्ली और लप्पू झनझन की कैटेगरी में रखती है।जो जरा मीठा बोल जाए, तमीज से पेश आ जाये उसके मुरीद हो जाते हैं,इनका बस चले तो ऐसों के पैर ही छू लें।जरा सी बात पर खुश हो जाते हैं और किसी की तिरछी निगाह और वक्र भृकुटि से इनके खून का दबाब बढ़ जाता है।अब लाख समझा लो कि भई दुनिया ऐसे ही चलती है पर इनके दिमाग में तो भूसा भरा होता है, बिल्कुल ठस्स दिमाग होते हैं।कोई समझाए बुझाए तो उलटा उसे ही ज्ञान देने लगते हैं कि देखो संत भी तो बिच्छू के काटने पर उसे बार -बार पानी से बाहर निकाल देते हैं कि जब ये अपनी दुष्टता नहीं छोड़ता तो मैं अपनी सज्जनता क्यों छोड़ूँ भला।अब संत कहते हैं तो ठीक ही कहते होंगे। पर बड़ा मुश्किल होता है विपरीत स्वभाव वालों के बीच जिंदगी बिताना ,जिमि दसनन महुँ जीभ बिचारी।विभीषण होते तो जाकर पूछ लेते कि उन्होंने कैसे जीवन जिया, सारे दुष्ट राक्षसों के मध्य अपनी शुचिता कैसे बरकरार रख पाए।रावण तो सगा भाई था कोई चचेरा तयेरा नहीं ,बिल्कुल मां जाया, एक ही कोख से पैदा थे दोनों पर स्वभाव बिल्कुल अलग, एक पूरब तो दूसरा पश्चिम।जब विभीषण ने समझाया दूत अवध्य होता है या श्री राम की भार्या को वापिस लौटाने में ही भलाई है तो भरे दरबार में लात मार कर निकाल दिया। वो तो भला हो राम जी का कि उन्होंने ह्रदय से लगा लिया, लंका का राज ही दे दिया पर जगत में तो घर का भेदी लंका ढाए प्रसिद्ध हो ही गया।
जब दांतों के मध्य जीभ जैसी स्थिति हो, चारों ओर हउआ ही हउआ हों तो बहुत सावधानी रखनी होती है।कभी कभी आप परिस्थिति को जानते समझते तो अच्छी तरह हैं पर ......मारीच को खूब पता था कि मिठबोला भांजा रावण अपनी गलत मंशा के लिए उसे सोने का मृग बनने का ऑफर दे रहा है पर वह बेबस था तो सोच लिया जब दोनों तरफ से मरना ही है तो राम जी के हाथों मरना ज्यादा उचित होगा कम से कम मुक्ति तो हो जाएगी।उसने तो इसीलिए हा राम हा राम उचारा था।उसकी तो मुक्ति हो गई पर हा राम सुर के सारे संदर्भ ही बदल गए और रावण साधु का वेश धर भिक्षा मांगने के ब्याज से सीता को हर ले गया।
तो जो हो वही बने रहो, अपनी मूल प्रकृति को छोड़ो मत।कभी कभी हो के भी मत हो ओ, कोई बात नहीं, नान विजिविल होना अदृश्य होना भी अच्छा है।अरे किसी को नहीं दिखते तो क्या पर हो सत्य तो यही है न।और तुम्हें कौन किसी से प्रमाणपत्र लेना है।अपने में मस्त रहो, कोई बोले तो ठीक न बोले तो ठीक, कोई खुश तो अच्छी बात, नहीं खुश तो अपनी बला से।सबको खुश रखने का कोई ठेका नहीं लिया और ले भी लेते तो सबको खुश किया भी नहीं जा सकता था।जब महादेव पार्वती नहीं कर पाए तो हम कौन खेत की मूली है।तो करते रहो ,चलते रहो ।रुको मत, जो रुक गया ठहर गया वो गया।हो तो सही ,अब किसी को नहीं दिख
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