Tuesday, July 19, 2022

क्यों नहीं लेते राम का नाम

 सफर जारी है...934

13.05.2022

        एक गीत के बोल सुबह से बहुत हावी हैं 'सुबह और शाम, काम ही काम'।अब हो सकता था कि शाम तक सब भूल भुला जाते पर दोपहर की खाने की छुट्टी में घर जाते मित्रों ने फिर दो पंक्तियां उछाल दीं... जिज्जी, काम से काम पे जा रहे हैं।वाह री औरत की जात,कहीं भी हो कितनी भी व्यस्तता हो पर घर हमेशा हावी रहता है कि अम्मा जी के भोजन का समय हो गया कि बच्चे स्कूल से आ गए होंगे कि भूखे होंगे कि पति को दवाई देनी है कि घर पर मेहमान आ गए होंगे।पता नहीं घर तो दोनों का होता है पर इन चिंताओं का कन्सर्न एक से ही ज्यादा क्यों होता है।शायद वह घर निर्मात्री होती है इसलिए या अधिक दायित्व शील होती है या पूरा आसमान अपने ऊपर टिका समझती है कि कहीं वह हटी तो छत भरभरा कर न गिर पड़े।अपने को धुरी मानने की भूल करती है या सच में परिवार की धुरी ही वह होती है, राम जाने।पर जब देखो काम और काम में अपने को आकंठ डुबोये रहती है।तो अपनी बिरादरी को इतने अधिक  कामों में व्यस्त देख गीत की मूल पंक्तियों  'सुबह और शाम काम ही काम क्यों नहीं लेते पिया प्यार का नाम' में ही बदलाब कर नई पंक्तियां गढ़ दीं। क्यों नहीं लेते बन्धु राम का नाम.अब प्यार व्यार तो हवा हुए, यह तीसरापन तो राम को याद करने का है।बहुत गुलछर्रे उड़ा लिये, फूली फूली चर ली, इस उस की चुगली में खूब समय बिता दिया।कबीर को पढा तो जरूर कि 'बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलिया कोय, जो दिल खोजा आपना मुझसे बुरा न कोय'।पर उसे गुन नहीं पाये।दूसरों की तरफ संकेत करते बिल्कुल भूल गए कि चार अंगुलियों का इशारा हमारी ओर ही है।

        भजन को केवल गाने के लिए गुनगुनाते रहे, उसके भाव को पकड़ ही नहीं पाये, भगवान के आगे घण्टरिया बजाते रहे पर कभी भक्ति में लीन नहीं हुए।भले ही दिखाने को नेत्र बन्द थे पर सच में तो सब देखते ही रहते थे।मुंह से राम राम बोलते और दिमाग में कुछ और ही चलता रहता।शायद इसे ही मुंह में राम बगल में छुरी कहते होंगे।'माला तो कर में फिरे जीभ फिरे मुख मांहि, मनवा तो चहुँ दिसि फिरे ये तो सुमरिन नाहि'।ऐसा ही तो सुमरिन करते रहे हम।सूरदास ने कम से कम स्वीकारा तो था कि 'प्रभु हों सब पतितन को टीको, और पतित सब दिना चार के हों तो जनमत ही को'।कम से कम ये भक्त कवि अपने विषय में स्पष्ट तो थे, अपनी कमियों को जानते थे तो थे।और जानते थे इसलिए उन बुराइयों से छुटकारा पाना चाहते थे।'अच्छा हूँ या बुरा हूँ जैसा भी हूँ तुम्हारा' कहते थे, प्रार्थना करते थे, अनुनय विनय करते थे, विनय के पद रचते थे, गोविंद को इतना चाहते थे कि उन्हें प्रेम के मोल खरीद ही लेते थे।याद है न प्रेम दीवानी मीरा घोषित कर देती है 'माई री मैंने लीनो गोविन्दो मोल, कोई कहे महंगों कोई कहे सस्तो लियो री तराजू तौल'।

        गोपियों के  पास तो एक ही मन था जो श्याम संग चला गया।स्पष्ट कह देती हैं गोपियाँ ' ऊधो मन न भये दस बीस, एक हुतो सो गयो श्याम संग को आराधे ईश'।पर यहां तो मन भौतिक वस्तुओं के पीछे ही डांव डांव डोलता है।कृष्ण के वियोग में यदि मधुवन हरे हैं तो उन्हें उलाहना सुनने को मिलता है 'मधुवन तुम कत रहत हरे, विरह वियोग श्याम सुंदर के ठाड़े क्यों न जरे'।पर यहां तो कृष्ण मिले न मिले ,मन उनके अभाव में व्याकुल हो कब रोता है, कब ह्रदय के अंदर से पुकार निकलती है।बस किसी तरह मन का सा हो जाये और मन का सा क्या है बस भौतिक संसाधनों की प्राप्ति।ईश्वर से मांगते भी क्या है बस ये मिल जाये वो मिल जाये।सारा सारा दिन इसी उठापटक में निकाल देते हैं ।ईश्वर से नेह लगाया ही कब, उसे मीरा राधा की तरह चाहा ही कब, कभी उसके विरह में इतने तड़पे ही नहीं कि उसे पाने में सब खोना पड़े।बस दिन रात उससे बहुत कुछ मांगा होगा कभी अपने लिए तो कभी अपनों के लिए।पर कभी ध्रुव की सी लगन नहीं लगी कि सब छोड़ 'ओम नमो भगवते वासुदेवाय 'का अजपा जप करते, कुछ मालाएं जपी भी तो तुरंत उनका फल चाहा।निष्काम भक्ति करना नहीं आया।तीन चौथाई बीत गई, अब पसरत्ता समेटने की बारी है पर मन की चंचलता पर किसका बस है, वह तो निरंकुश है, कभी भी कहीं भी चला जाता है।खूब गीता पढ़ लो पर मन तो अभ्यास से सधता है।

        तो अर्थोपार्जन में ही लगे रहे, न किसी भूखे को खाना दिया न प्यासे को पानी।अब निर्लिप्त निरासक्त भाव से काम करने और हर क्षण प्रभु को भजने का अभ्यास डालना है।हर कदम पर राधे और श्याम निकले, बस हाथ भले ही काम करे पर जिव्हा राम ही राम जपे।बस प्रभु सुबह और शाम कर लिया बहुत काम, अब समय है काम के साथ साथ प्रभु को याद करने का, उसका  नाम लेने का।तो याद कर लो ये पंक्तियां.... 'सुबह और शाम, काम ही काम, क्यों नहीं लेते बन्धु राम का नाम, नाम ही तारे, नाम उबारे लेता चल प्रभु राम का नाम'।

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