सफर जारी है...935
14.05.2022
अब भई अधिक बक बक करने की आदत नहीं है, शब्दों के खर्च के मामले में थोड़े सूम से हैं।करें भी क्या, बचपन से ये ही सिखाया पढाया गया कि बोलने से पहले सौ बार और लिखने से पहले हजार बार सोचो।शब्दों को सोच समझ कर खर्च करो।न ज्यादा न कम, बस जहां जितनी जरूरत हो उतना ही। सोच सोच के काम करने की ऐसी घुट्टी पिलाई गई कि अभी तक असर है।बहुतेरा सोचते हैं कि हम भी दुनियावी हो जाये ,बकबकी हो जाएं, जो मुंह में आये सो बोलते जाएं, न ये देखे कि क्या कहा जा रहा है,। किससे कहा जा रहा है और क्यों कहा जा रहा है।बस हमें तो कहना सिद्ध।न कह पाने का कैसा प्रेशर होता है, ये तो बस वही जानता है जो नहीं कह पाता और पेट पकड़े बैठा रहता है कि मौका मिले तो हल्का हो लें। अपने मन का गुबार निकाल लें, काहे को अपने दिल दिमाग पर भार रखे रहें।
सो लोग दनदनाते आते हैं, शब्दों से पूरे लबालब और आते ही बिना क्रम के उगलना शुरू कर देते हैं, बीच बीच में उत्तेजित भी हो जाते हैं, शब्द कम क्रोध ज्यादा उगलते हैं,अपनी गलतियों पर उनकी नजर जाती हो न जाती हो पर अपने गलत सलत को किसी भी प्रकार से सिद्ध करने में लगे रहते हैं।पहले ऐसे लोगों से मिलने में बहुत कोफ्त होती थी, लगता था पूरा दिन ही बेकार चला गया।धीरे धीरे धैर्य आता जा रहा है अब सामने वाले की भाप निकलने तक बिल्कुल मौन बने रहते हैं और अगला जब कह कबा के खाली हो जाता है तब उसके हालचाल पूछना शुरू कर देते हैं।अब जब अगला क्रोध की ज्वाला में जल रहा हो तो आप जो मर्जी कहिये, वह उसे अपने मूड के अनुसार ही ग्रहण करेगा।तो ऐसे में चुप्पी लगाना ही बेहतर है।पहले तुम ही हल्के हो लो।वैसे भी जब दिमाग में इतना उल्टा सीधा भरा हो तो सामने वाले की सही बात भी गलत और भली भी बुरी लगती है।
अपने को रिलीज करने के बाद जैसे ही उठ के चले कि हाथ पकड़ कर बैठा लिया ।इन सभी बातों का जबाब भी लेते जाओ।चुप थे तो इसलिए नहीं कि हमारे पास जबाब नहीं था या हमें बोलना नहीं आता था या तुम से डर लगता था या तुम जैसों से दबते थे या तुम्हारा सामना करने की हिम्मत नहीं थी या शब्दों का टोटा पड़ गया था या कि हम मुंह में दही जमाये बैठे थे कि तुमसे कमजोर पड़ते थे।बस सिखाया गया था अगला जब बोले तो उसे पूरी तरह सुनो, बीच में मत टोको, कितना भी तीखा कटु और बदतमीजी से बोले, बोलने दो क्योंकि हर व्यक्ति वही दे पाता है जो उसके पास होता है।कहने की तमीज बाजार में नहीं बिका करती जिसे खरीद कर पहना जा सके।ये तो परिवार से संस्कार से विरासत में मिलती है।जो मारे क्रोध के कांप रहा हो उससे अच्छे शब्दों और व्यवस्थित होने की मांग कैसे की जा सकती है भला।ये विशेषता तो शांत चित्त वालों की होती है।
अगले को ये समझाना भी जरूरी हो जाता है कि सुनने वाला ईंट की मोटी दीवार नहीं है कि जब मन करा, भड़भड़ी में आये और सौ पचास चौबे ठोक के खिसक लिये ।बस अपने को रिलीज किया और हाथ झाड़ चल दिये कि अपना तो हो गया ।नहीं साहब इतनी आसानी से नहीं जा सकते आप, अब तो जबाब लेकर जाना होगा।खाली हाथ तो नहीं जाने देंगे भला।अब ये कोई बात थोड़े ही हुई कि इतना इतना दिया और बदले में खाली हाथ जाने दें।तो सुनो और तसल्ली से सुनो, आराम से सुनो, अब सब कह लिया तो खाली हो के सुनो कि जो अभी अभी विष रस को उड़ेल गए हो, उसे हमने छू आ भी नहीं है, हमारे काम का है भी नहीं, चाहो तो उसे पिछबाडे कचरे के ढेर में जाकर फैंक सकते हो, अकेले नहीं उठा पा रहे हो तो साथ में दो नौकर भेज देते हैं,आराम से घर पहुंचा आएंगे।अब सुनो, गलती को स्वीकारने में जो सुख है ,उसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते।गलती से भी गलती हो गई हो तो उसके लिए केवल तीन शब्द बोल लीजिये दोहरा लीजिये कि मुझे क्षमा करें, मुझसे गलती हो गई, आगे से ध्यान रखा जायेगा, बस बात समाप्त।ध्यान रखिएगा कि हर बात का जबाब बात से ही नहीं हुआ करता । कुछ के जबाब में चुप्पी में भी छिपे होते हैं।तो इन चुप्पियों को कम मत समझियेगा, उसके अर्थ और संदर्भ ग्रहण कीजियेगा। बड़े दिलकश होते हैं ये संदर्भ।
सजायाफ्ता मुजरिम की तरह हाथ बांधे खड़े रहने की कोई जरूरत नहीं ,केवल गलती को स्वीकार कीजिये।उसे असत्य कथनों से पोषित मत कीजिये क्योंकि एक असत्य की रक्षा के लिए अनेक असत्य गढ़ने पड़ जाते हैं। आप अपने बुने जाल में स्वयम फंसते जाते हैं।फिर निकलना बहुत मुश्किल होता है।असत्य की गुजलकें बड़ी मोहक होती है,बड़ी जल्दी गिरफ्त में ले लेती है तो जितना हो उससे बच कर रहना सीखिए साब।काम करते हैं तो उन्नीस बीस होता ही है सो करेगा उसी से गलती भी हहोगी।जो हाथ बांध कर बैठे हैं ,जो करना ही नहीं चाहते, वे तो वैसे भी खुद मरे के समान हैं।बस केवल अपना समय नष्ट कर रहे हैं।दूसरों का तो क्या बिगाड़ पाएंगे पर हां, स्वयम को नष्ट जरूर कर लेंगे।तो उठिए, भाषाई समझ विकसित कीजिये, उसके संस्कार को बचाये रखिये, गिरना बहुत आसान होता है, सारी ताकत तो उठने में ही लगती है।तो इतने ऊंचे उठो कि जितना उठा गगन है।
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