सफर जारी है....950
1.06.2022
जेठ मास की मावस वट मावस है, इस दिन सावित्री की कहानी दोहराई जाती है किस तरह वह अपनी प्रत्युपन्न मति से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण छुड़ा लेती है।विवाह से पूर्व ही नारद जी से उसे पता चल गया था कि सत्यवान की आयु बहुत कम है,वह चाहती तो विवाह से इंकार कर सकती थी, स्वयंवर ही तो था मद्र देश के राजा अश्वपति की कन्या का,उसके लिए वर की क्या कमी थी भला, दूसरा पति चुन सकती थी पर नहीं जो एक बार चुन लिया सो चुन लिया।अब होय सो राम।जो होगा देखा जाएगा।सास ससुर अंधे, उनका राज्य भी शत्रुओं ने छीन लिया।बिल्कुल निर्धन, इकलौता लड़का है सत्यवान तो माता पिता की सेवा तो करनी ही है।दायित्व छोड़ कर कहीं भागा नहीं जा सकता था।सब जानते बूझते चुना, चुना तो चुना फिर ये नहीं कि बीच रास्ते छोड़ कर भागें।निभाया और पूरी शिद्दत से निभाया।यमराज ने तीन वरदान दिए तो उन्हें भी ऐसी चतुराई से मांगा कि एवमस्तु कह यमराज भी अपने वचन से बंध गये।उन्हें सत्यवान का जीवन लौटाना पड़ा।और बस सावित्री का नाम अमर हो गया। महिलाएं सालाना वट बरगद की पूजा करती हैं, जीवन साथी की लंबी आयु मांगती है।
हर बार इस विषय को उठाते आलोचित तो बहुत होती हूँ ,घर परिवार समाज सखी सहेलियों को लगता है कि आज के घोर वैज्ञानिक और तकनीक के युग में ये कैसी महनीया हैं जो हमें इस कथा के ब्याज से फिर से सत्यवान सावित्री के युग में ले जा रही हैं।आज जब बराबरी का युग है तो एक ही क्यों पिदे,बीमार है तो डॉक्टर हैं न, सेवा सुश्रुषा के लिए नर्से हैं सेविका हैं।अब इतना भी क्या कि अगला बीमार है तो उसके लिए हम जान दे देंगे, उसे मौत के मुंह से निकाल कर लाने को मृत्यु के देवता के आगे हाथ पैर जोड़ेंगे।ठीक है भाई हमें भी उसका जीवन प्यारा है तो बड़े से बड़े डाक्टर को दिखा तो रहे हैं।अब ठीक तो व्यक्ति दवाई से ही होगा, अब खुद भी खाना पीना छोड़ के पूजा पाठ में लगे रहो, दुआ मांगो प्रार्थना करो और उससे सब ठीक हो जाएगा, हमारी समझ में तो नहीं भरता भाई।
भर भी नहीं सकता क्योंकि अब सब भौतिकता के दबाब में जीते हैं।दवा से बढ़कर दुआ का असर होता है, इसे सुना ही नहीं, चरितार्थ होते भी देखा है।मनचीता मिल जाए इसलिए दर दर भटकते देखा है, पूजा पाठ जप करते देखा है।कहा तो यहां तक जाता है कि जो बात दवा से नही होती वो बात दुआ से होती है ,जब मुर्शिद कामिल मिलता है तो बात खुदा से होती है।ये स्नेह और सेवाभाव ही होता होगा जिसके चलते पत्नी अपने सुहाग के लिए और मां परिवार के लिए न जाने कितने व्रत उपवास पूजा पाठ तीर्थ में व्यस्त रहती है।और ये सब एकतरफा नहीं है। दूसरे पक्ष को भी परिवार के लिए सब करते देखा है, पाया है ।जब घर की धुरी बीमार हो जाए तो वे कैसे अकेले असहाय से हो जाते हैं।सच्चे मन से बार बार मनाते हैं कि सब जल्दी से ठीक हो जाए।बड़बड़िये तो जरूर होते हैं ,जल्दी तुनक भी जाते हैं पर अगले के लिए सोचते भी खूब हैं भले ही उसकी अभिव्यक्ति के सही तरीके न जानते हों।
बचपन से देखते आ रहे हैं मैया को तीन दिन के इस कठिन व्रत का पारण करते।पहले दिन एक टैम अलोना भोजन, दूसरे दिन अयाचित और तीसरे दिन निर्जल उपवास रखते, पिता को भी खूब चिंतित होते देखा है उन दिनों, हम सबको निर्देशित करना कि आज अपना काम अपने आप करो, मां को परेशान मत करना वह उपवास में है।और इतने कठिन समय में भी मां को पूरी दिनचर्या उसी शिद्दत से निभाते देखा है।रोज शाम पूजा कक्ष के साथ पीपल और तुलसी चौरा पर दीपक जलाते, कहीं सुन भर लिया था कि दीपक जोत से घर का अंधकार दूर होता है, कष्ट कटते हैं ।बस जब तक जिंदा रहीं, हाथ पैर चलते दीपक जलाने में कोई नागा नहीं हुई।पहले बरगद पूजने बल्केश्वर घाट जाती रहीं और अशक्त होते बरगद की डाली को पूजती रहीं।
कहती थी देखो बरगद कितनों को छाया देता है आश्रय देता है, जमीन की जड़ को जो पकड़ता है तो छोड़ता नहीं बल्कि जटाओं को भी मिट्टी को सौंप देता है।सो वट जैसे व्यक्तियों के पास सदा जाओ, बैठो उनका मार्गदर्शन लो, वे हमेशा उपकार करते हैं।सावित्री हम सबके लिए आइकन है ,रोल मॉडल है वह आज भी पूज्य इसलिए हैं कि उसने मूल्यों को नहीं छोड़ा, जो उचित समझा किया, दोनों परिवार को अपना माना,दोनों का सुख चैन चाहा।बहुत कुछ सीखना है उनसे।अब तुम्हें ये सब मखौल लगता है तो लगता रहै पर अपना सच तो यही है मूल्य जहां से भी मिले अवश्य ग्रहण किये जाने चाहिए।ये हमारे आधे अंग के लिए सेवा और श्रद्धा भाव है, यह बहुत निजता का प्रश्न है, आप स्वीकारें या मखौल बनाए आपकी मर्जी पर इससे न तो वट वृक्ष की गरिमा में रंच मात्र अंतर आएगा और न सावित्री का कद छोटा हो जाएगा।
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