सफर जारी है.....951
01.06.2022
जो बाजी जीतते हैं, सामान्य से इतर कुछ बड़े काम कर जाते हैं, घर परिवार बाहर कार्य स्थल के साथ साथ समाज में भी अपने को सिद्ध कर पाते हैं, अपनी उपलब्धियों का परचम लहरा पाते हैं, विनीत और मृदुभाषी होते हैं, सबसे हिलमिल कर रह पाते हैं जिनके संपर्क दायरे विस्तृत होते हैं जो भीड़ में अलग पहचान जाते हैं, वे किसी अलग दुनिया से नहीं आते।वे भी हम सबकी तरह दो हाथ पैर के स्वामी होते हैं,उनके पास भी वही चौबीस घण्टे का सीमित समय होता है पर उनके पास समय प्रबन्धन और लगन का विशेष गुण जरूर होता है जिससे वे सफलता के शिखर पर पहुंचते हैं।
कल एक सप्तति आयोजन में प्रतिभाग करने का संयोग बना।देश आजादी के पिचहत्तर वर्ष पूरे होने की खुशी में अमृत महोत्सव मना रहा है यानी उपलब्धियों के क्षण हमें सदैव गौरवान्वित करते हैं, हमें उन्हें सेलीब्रेट करते हैं।जीवन के सत्तर वर्ष की उपलब्धि का जश्न सप्तति का अवसर है।साहित्यकार और रंगकर्मी का जीवन केवल परिवार के लिए ही नहीं हुआ करता, उसकी परिधि में समाज, विद्यार्थीऔर शोधार्थी सभी सिमट आते हैं।उसका व्यक्तित्व बरगद सा विशाल होता जाता है।उसकी जड़े गहरे जमती जाती है।उसके पास सब को देने के लिए कुछ न कुछ जरूरी होता है।वह दोनों हाथों से बांटता है फिर भी कोष खाली होने के बजाए बढ़ता और बढ़ता ही जाता है।व्यये कृते वर्धते एव नित्यं विद्या धनम सर्व धनम प्रधानम।ज्ञान का कोष कभी खाली नहीं होता चाहे से जितना मर्जी बांटो। सच तो ये ज्ञान पुस्तकीय सूचना भर नहीं है, अनुभव सम्पन्नता आपको बड़ा बनाती है,आप स्वयम करके सीखते है।रोजाना के अनुभवों और seekh को उसमें जोड़ते जाते हैं, प्रतिदिन एक नया पाठ उसमें सम्मिलित होता जाता है।आप गहरे कुए जैसे होतेजिसके पानी का स्रोत कभी सूखता नहीं है।
कई कई बार हम इतने सामाजिक हो जाते हैं कि परिवार कहीं बहुत पीछे छूट जाता हैं और हम शिखर पर अकेले रह जाते हैं।पर कल के आयोजन की एक विशिष्टता यह भी रही कि पूरा परिवार इस आयोजन में सहभागी था और जब साहित्यकार ने अपना रचना कर्म तीसरी पीढ़ी को हस्तांरित किया तो सभी रोमांचित हो गए यानी पुत्र के साथ पौत्र भी दादा से साहित्य संस्कारों की विरासत प्राप्त कर रहा था।एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक मूल्यों का हस्तांतरण सदैव सुखद ही होता है।सामाजिक परिवेश की बड़ी भूमिका होती है और हमारे द्वारा तैयार विद्यार्थी शोधार्थी हमारी मेहनत का प्रतिफल होते हैं ।इन आयोजनो से ये संदेश भी जाता है कि उम्र केवल आंकड़े भर नहीं होती, उसमें आपका अनुभव भी सम्मिलित होता हैं, आप केवल संचय ही नहीं करते जाते ,बल्कि समानांतर बांटना भी सीखते हैं।आचार्य अच्युतन साहित्यकार के साथ साथ रंगकर्मी और सफल अभिनेता भी है।जिंदगी के पारी उन्होंने सावधानी से खेली इसलिए सफल ता उनके कदम चूमती है।सप्त ति तो मात्र एक पड़ाव है, हम सबकी शुभकामना है कि वे शतायु हों।
केरल हिंदी परिषद के संरक्षक आदरणीय बालकृष्णन नायर,उनके पुत्र श्रीजू, आचार्य मूसा, श्री रघुराम जी,कालीकट विश्वविद्यालय हिंदी विभाग के अध्यक्ष आचार्य प्रमोद कोपवृत जी, शशिधरन जी, तमाम हिंदी सेवी, रंगकर्मी और हिंदी अध्येताओं से मिलकर मन बहुत प्रसन्न है।प्रो गोपीनाथन जी से रूबरू मुलाकात न होने का दुख साल रहा है पर अगली बार अवश्य मिलेंगे।हिन्दी का भविष्य निश्चित ही उज्ज्वल है।वह अपने प्रयोक्ताओं के मध्य खूब फल फूल रही है।नई पीढ़ी को सीखने का जो थोड़ा बहुत संकोच है वह अवरोध भी जल्दी दूर होगा।दरअसल हिंदी हिंदी कहने से हिंदी नहीं सीखी जाती, उसे सीखने और सिखाने का जज्बा और संकल्प भी मायने रखता है।जशना ने सही कहा कि वे यूट्यूब चैनल के माध्यम से हिंदी सिखातीहैं और स्पोकन हिंदी को सीखने के लिए डॉक्टर इंजीनियर और बैंककर्मी उनके विद्यार्थी हैं।हम मिल कर आगे बढ़ेंगे तो भाषा भी निश्चित तौर से आगे बढ़ेगी।और भाषा के सीखने सिखाने का प्रश्न केवल विद्यार्थी और शिक्षक से ही नहीं जुड़ा है,विविध क्षेत्रों में काम कर रहे फिर चाहे वे रंगकर्मी हों या अन्य, हिंदी को सीखना उतना ही जरूरी है जितना किसी अध्यापक को।तो नवीकरण कार्यक्रमों की परिधि में इन्हें भी शामिल करना बहुत जरूरी है।किसी भी भाषा को प्राथमिक स्तर से सिखाया जाए, विधिवत सिखाया जाए तो उसे जल्दी और आसानी से सीखा जा सकता है।तो इसे भी योजना का भाग बना लेना होगा।
संकल्प से सब सध जाता है तो हम सब सबसे पहले संकल्प के धनी हो बाकी तो सब साथ में मिल ही जाता है।
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