सफर जारी है....957
08.06.2022
जो बाहर ही बाहर से सतह छूकर लौट आते हैं, उनके हाथ मोती नहीं लगा करते।वे बाहरी टीमटाम से ही काम चला लेते हैं।बस उतना ही करते हैं जितने से काम चल जाए।पढ़ते भी उतना ही हैं कि बस पास भर हो जाएं।अगली कक्षा में चढ़ जाएं और बस इतने नम्बर आ जाएं कि कहीं चार पैसे कमाने का जुगाड़ हो जाए।इन्हें ज्ञान व्यान से कोई लेना देना नहीं होता।बस किसी तरह काम भर चल जाए।इसलिए वे गहरी समझ भी नहीं रखते, बस थोड़ा थोड़ा सबमें से ले लेते हैं।अपना कुछ नहीं होता, कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा।जिंदगी तो उनकी भी पार लग ही जाती है जो अधकचरे और अधभरे होते हैं ।बस इतना है कि वे छलकते खूब है, बजते भी टनाटन हैं पर गम्भीरता को अपने पास फटकने भी नहीं देते।उससे तो दूर की राम राम भली।काहे को इतना दिमाग मारे तो चुप्प ही खोल में सिमटे पड़े रहते हैं।बस जब भूख प्यास लगी, बाहर मुंह निकाला, खाया पीया और फिर अपने कुँए में जाकर बन्द हो गये।उनका आसमान कुआ ही है।वे कूपमण्डूक ही बने रहना चाहते हैं।उनके लक्ष्य ही बहुत छोटे होते हैं बस वे पूरे हो जाए, फिर उन्हें कोई चिंता नहीं।दुनिया जाए भाड़ में तान लंबी सोइये।उनके जाने सब भाड़ चूल्हे में जाए, उन्हें कोई परवाह नहीं।वे अपनी दुनिया में अगन मगन हैं।। अधजल गगरी छलकत जाए, थोथा चना बाजे घना जैसी कहावतें खासतौर पर उनके लिए ही बनी होती है।बस वे फूली फूली चरने के आदी होते हैं।करेंगे धरेंगे कुछ नहीं पर लाभ और क्रेडिट पूरा का पूरा चाहिए।बस चाहिए सो चाहिए, मुंह से निकल गई सो निकल गई।
जो गहरे उतरते हैं विषय में या पानी में, कुछ न कुछ लेकर ही लौटते हैं।फिर जिन्हें कुछ प्राप्त करने की धुन सवार होती है वे कठिनाइयों की परवाह कब करते हैं, वे दिनरात नहीं देखते, बस जी तोड़ मेहनत करते हैं और लक्ष्य को पाकर ही रहते हैं।लक्ष्य निश्चित करते हैं और उसे पाने के लिए प्रयत्नशील भी होते हैं।मुश्किल तो उनकी है जिन्होंने अपने जीवन के लिए कोई स्वप्न ही नहीं बुने और बुने भी तो शेखचिल्ली से जिन्हें व्यावहारिकता की कसौटी पर नहीं परखा, अपनी शक्ति नहीं तौली, अपने साधन नहीं देखे, उतनी मेहनत नहीं कर पाए जितनी अपेक्षित थी।उन्होंने असफलता का ठीकरा भी दूसरों के सिर फोड़ दिया।वे खुद डूबे तो डूबे पर अपने साथ सनम को भी ले डूबे।
अब समझ आता है कबीर ने ऐसे ही नहीं लिख दिया होगा...जिन खोजा तिन पाईया गहरे पानी पैठि, हों बूडी डूबन डरी रही किनारे पैठि।जो चाह रखते हैं ,उन्हें अपनी बाजुओं पर गजब का विश्वास होता है।वे कोई दांव खाली नहीं जाने देते ।हर कदम सुनियोजित तरीके से उठाते हैं, शत प्रतिशत देते हैं, बाद के लिए कुछ नहीं छोड़ते, सब आज और अभी कर डालते हैं, कल भला किसने देखा है।उन्हें कबीर कभी भूलते ही नहीं.... काल करे सो आज कर आज करे सो अब्ब, पल में परलै होयगी बहुरि करेगो कब्ब।जो ठान लिया सो ठान लिया, फिर चाहे जितने मर्जी आंधी तूफान आते रहें, वे निरन्तर चलते रहते हैं,कोई बाधा उन्हें नहीं रोक पाती।अकेले ही चलते रहते हैं और देर सबेर मंजिल तक पहुंच ही जाते हैं।मंजिल को तो वे पड़ाव भर मानते हैं ,कुछ देर विश्राम करते हैं, शक्ति संजोते और बटोरते हैं और फिर यात्रा शुरू कर देते हैं।आते रहें आंधी तूफान, कड़कती रहें बिजलियाँ, बरसते रहे ओले, होती रहे झमाझम बरसात, वे नहीं रुकते, चलते और बढ़ते ही जाते हैं आगे और आगे।साथी मिलें तो ठीक नहीं तो एकला चलो रे।चरैवेति चरैवेति उनके जीवन का मूलमंत्र होता है।
तो आप भी गहरे जाकर खोज लाइये उन मोतियों को जिनसे जीवन की सार्थकता होती है, डरिये मत गहरे जाने से, सारा तत्व माल तो वहीं छिपा है।और जो आज भी किनारे किनारे डर कर बैठे रहे तो कुछ नहीं होने का।चूहे की मौत मारे जाओगे।तो उठो ,जागो ,संकल्पशील बनो,बात को समझो, जो अभी भी नहीं चेते तो अवसर निकल जॉयेगा, फिर पछताने से कुछ नहीं होने का।बस हाथ मलते रह जाओगे।मन पछितैहे अवसर बीते।सो भाई मेरे, किनारे बैठ कर शेख चिल्ली के से स्वप्न मत बुनते रहो, आगे बढ़ो, हिम्मत रखो, तुम कर सकते हो, तुम्हारे अंदर अपार क्षमता है।तुम चाहो तो दुनिया को गोल गोलघुमा दो।पर चाहो तब न।जब चाहोगे तो सब संभव हो जाएगा।बस संकल्प शक्ति कमजोर नहीं पड़नी चाहिए, बाकी तो सब सध जाता है।
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