सफर जारी है...958
09.06.2022
पढ़ते पढ़ाते परीक्षा देते लगता था कि इससे बड़ा और कोई काम हो ही नहीं सकता और जब रिजल्ट निकलता और कहीं पास हो जाते तो सोचते हमने जग जीत लिया।कुछ अंको की बढ़त रिजल्ट कार्ड को शोभनीय बना देती और पहला दूसरा स्थान पाने पर बहुत विशेष बन जाते।मैया बलैया लेते नहीं थकती थीं और पिता कम से कम सौ पचास लोगों के मध्य इस समाचार को कह कबा नहीं लेते तब तक उनकी रोटी नहीं पचती थी।जब ये किताबी पढ़ाई खत्म हुई और बी ए एम ए, बीएड एमएड पीएचडी सब कर करा ली तो बड़े खुश हुए कि चलो ये परीक्षा का दौर तो गुजरा।पढ़ लिख कर तैयार हुए तो जीवन की सबसे जरूरी बात चाई माई कर दी गई क्योंकि सीखे गए ज्ञान की असली परीक्षा तो अभी बाकी थी।वो रात भर रट्टा मार मार कर कॉपी भर लिखने की परीक्षा से पिंड छूटा तो लगने लगा था कि चलो अब परीक्षा से छुट्टी हुई।हमें क्या पता था कि इससे बड़ी परीक्षा तो अभी बाकी है।वहां कम से कम तीन घण्टे लिख लिखा कर हाथ में रिजल्ट कार्ड आते छुट्टी तो मिल जाती थी पर इस परीक्षा में न तो रट्टा काम आता था और नकल की तो रत्ती भर गुंजायश न थी।और मजे की बात कि कोई अंक नहीं कोई रिजल्ट नहीं, बस बात बात पे ताने उलाहने कि ये भी नहीं आता, वह भी नहीं आता।।समझ ही नहीं आता था कि ये कौन से प्रश्न हैं जो रोज नए नए तरीके सेआ खड़े होते हैं।स्कूल कालेज की परीक्षा में एक प्रश्न भी आउट आव सिलेबस आ जाता तो विद्यार्थी मार हंगामा मचा देते कि पेपर आउट ऑफ सिलेबस आया है और परीक्षार्थियों के भविष्य को ध्यान रखते अंकों में विशेष ढील दे दी जाती, सब पास कर दिए जाते, गेंहू के साथ खतुआ बथुआ को भी पानी लग जाता।
तब साल में दो छोटी आंतरिक परीक्षा और एक वार्षिक परीक्षा होती उसी में दादी नानी सब याद आ जाती और अब तो रोज ही परीक्षा सी होती, सारे के सारे प्रश्न आउट ऑफ सिलेबस, हंगामा तो दूर की बात, चूं भी नहीं कर सकते थे और सारे प्रश्नों के उत्तर में बड़ा सा गोला मिलता।बहुत कोफ्त होती एक तो इतने कठिन कठिन प्रश्न हल करने को दे दिए जाते और उस पर कोई छूट भी नहीं मिलती।असफल होने पर ऐसी बेइज्जती होती और वह भी सरे आम कि बस बार बार स्कूली परीक्षा को याद कर रो लिया करते।समझ ही नहीं आता था कि ये पढाई नई थी कि हम ही घबराहट में सब भूले जा रहे थे, प्रश्नों का उत्तर देते हकलाते लगते।रोज रोज की असफलता से सारा आत्मविश्वास चुक सा गया लगता था।उन परीक्षाओं से उबरते तो क्या पर धीरे धीरे आदत में आ गया कि भाई अब फर्स्ट सेकंड आने के सपने छोड़ो, अब तो सप्लीमेंट्री और ग्रेस मार्क्स के भी लाले पड़ गए।हमेशा भय सा लगा रहता पता नहीं अब कौन सा नया प्रश्न पूछ लिया जाए।सारी हुशियारी धरी की धरी रह गई।माता पिता ये समझ ही नहीं सके कि इस घर का हीरा उस घर में कोयला कैसे सिद्ध हुआ।जिस प्रतिभा पर उन्हें बड़ा नाज था, जिसकी होशियारी की मिसाल दी जाती थी, अब वह औसत विद्यार्थी की श्रेणी में भी क्यों नहीं रखा जा सका।क्या पढाई बदल गई या परीक्षा के तरीके, अब सफलता इतनी दूर कैसे हो गई कि उसे छूने के लिए कई कई कोस लगातार दौड़ना पड़ता है फिर भी मिल पाने की कोई गारंटी नहीं हुआ करती।इन परीक्षाओं से उबरे तो सामाजिक और कार्यस्थल की परीक्षाएं मुंह बाएं खड़ी थी।लगता है पूरा का पूरा जीवन परीक्षाओं से भरा हुआ है।हर दिन कुछ नए प्रश्नों के साथ परीक्षा शुरू होती है,पढ़ने और दोहराने का अवसर नहीं है, बस एक समय विशेष में जो सीख लिया,वही खजाना काम आ रहा है, बहुत कुछ सिलेबस बदल गया है, अब उसकी किताबें भी नहीं मिलती, बहुत से ऐसे प्रश्न हैं जो अनुत्तरित ही रह जाते हैं, पहले का सा समय तो रहा नहीं कि दौड़े छूटे जन्मदाताओं के पास प्रश्न लेकर पहुंच गए और जब तक संतोषजनक उत्तर नहीं मिला उनसे दिमाग मारते रहे।अब स्वयम से ही सारे प्रश्नों के उत्तर खोजने होते है,कोई मार्गदर्शक भी नजर नहीं आता जो सही रास्ते सुझा सके।फिर गुरुजी की तलाश में चल निकलते हैं पर सारे प्रश्नों के समाधान तब भी नहीं मिलते।तो बस अभी तक पढाई और परीक्षा में व्यस्त हैं पहले किताबें पढ़ते थे अब लोगों के चेहरे पढ़ते हैं।पहले परीक्षाएं एक निश्चित समय और अंतराल पर होती थी अब कभी भी हो जाती हैं, कोई निर्धारित शेड्यूल नहीं है।बस अभी लिखते लिखते वाक्य भी पूरा न हो और परीक्षा की घड़ी आ जाए, कौन जानता है।तो हर क्षण परीक्षा देने का मानस बनाये रखो।
जीवन ही एक परीक्षा है, कठिन सरल सभी प्रकार के प्रश्न हैं तो तैयारी तो पूरी रखनी होती है, अब पास फेल की चिंता रही भी नहीं ।बस परीक्षा दे देंगे और दूसरी परीक्षा की तैयारी में जुट जाएंगे।जो परिणाम होगा, स्वीकार लेंगे।अपना सा कर देंगे, जो आता है लिख देंगे, बाकी परिणाम विधाता पर छोड़ देते हैं।अब सब अपने हाथ तो नहीं हुआ करता न।
No comments:
Post a Comment