Tuesday, July 19, 2022

रिश्ते छीज रहे हैं

 सफर जारी है.....936

17.05.2022

अनाज साफ करते फटकन और आटा पिसाते छीजन  सुना था पर रिश्तों में भी सीलन और छीजन आ जाती है, रिश्ते धुंधुआते हैं,रिश्तों में काट फांस होती है, रिश्तों की बुनाबट में यदि फंदे ही गलत पड़ जाए तो सारी बुनाई ही गलत हो जाती है ।रिश्तों को सींचना होता है, उन्हें खाद पानी देना होता है,गुड़ाई करनी होती है, खर पतवार उखाड़ फेंकने होते हैं।कभी नरमाई तो कभी गरमाई से काम लेना होता है ।उन कोमल तंतुओं को बहुत संभाले रखना होता है जिनके कारण ये रिश्ते जुड़ते हैं,ये अनुभव भी कर लिया।

    रिश्ते जोड़ना एक बात है और उन्हें संभाले रखना दूसरी।जो रिश्ते मां की कोख से मिलते हैं सहोदरों के, उसमें भी संतुलन बनाये रखना होताहै तो फिर वे रिश्ते जो एक नए सम्बन्धके साथ मिलते हैं उन्हें साधे रखना तो और टेढी खीर है।ये मुंह फुलाये रिश्तों को निभाने में तो पूरी उम्र बीत जाती है पर उनके मुंह ही सीधे नहीं होते।किसी न किसी बात को लेकर रूठा मटकी चलती ही रहती है।कितना भी संभल कर चलो पर हड़का तो किसी भी बात पर जा सकता है।रिश्तों की गरिमा तार तार की जा सकते है और तो औरउसे दो फाड़ भी किया जा सकता है।रिश्ते की दुनिया केवल परिवार तक ही सीमित नहीं होती।आप चाहे जहां रिश्ते बना सकते हैं, उन्हें निभा सकते हैं बस शर्त एक ही होती है कि आप उनसे अपेक्षाएं न जोड़ें।रिश्तों में दरार आने की एक बड़ी वजह अपेक्षा है।इसलिए आप पड़ोसी धर्म और दोस्ती के रिश्ते अच्छी तरह निभा ले जाते हो क्योंकि कर के भूल जाते हो, बस इसलिए कर देते हो कि आपको करना अच्छा लगता है।सूद तो दूर की बात,मूल की भी इच्छा नहीं रखते।बस कर दिया सो कर दिया।

   याद करो आप किसी गरीब की बेटी की शादी में जितना मर्जी सहयोग कर दो पर उसे कभी जुबान पर नहीं लाते, उसका जिक्र भे नहीं करते क्योंकि आप उस अपनी मर्जी से करते हैं, करने का कोई दबाब नहीं होता।आपसे कोई कहता भी नहीं है, बस आपको उचित लगा और आपने कर दिया।तो सौ बातों की एक बात यह है कि रिश्ते वहां आसानी से निभ जाते हैं जहां मन में गुंजायश हो, उदारता हो, सामने वाले की परिस्थिति समझ आती हो।ये नहीं कि दस पैसे का किया और दासियों बार इसे गाते रहें, दस लोगों को सुनाते रहे।अरे सम्बाई नहीं तो मत करते।और जो तुम न करते तो कोई दूसरा करता,अगले का काम तो हो ही जाता।सच तो यह है कि दिलों में गुंजायश ही बाकी नहीं रही ।रिश्तों को ऐसा मोड़ तरोड जगह जगह से पिचका दिया कि बस क्या कहें।सारे संदर्भ अर्थ आधारित ही नहीं हुआ करते।व्यवहार बड़ी बात है तो रिश्तों को निभाना है तो खुटसयाने मत बनो।भाषा की गरिमा बनाये रखो।किसी पर चौबीस घण्टे लदे ही मत रहो।उसे व्यक्तिगत स्पेस दो।उसकी भी पसन्द नापसन्द हो सकती है।उसे भी कुछ अच्छा बुरा लग सकता है।उसकी भी इच्छा अनिच्छा हो सकती है।

   रिश्तों को खाद पानी देना जरूरी है।उन्हें पनपने के लिए स्पेस देना जरूरी है, कभी कभी ढील देना जरूरी है।कोई सम्बन्ध न रखना चाहे तो उससे दूरी भी जरूरी है।रिश्तों के ताने बाने ठीक से डालना जरूरी है।जो रिश्ते स्वार्थ आधारित होते हैं उनकी उम्र लंबी नहीं हुआ करती।वे जल्दी दम तोड़ देते हैं।यथार्थ में तो वे पहली चोट में ही टूट गए होते हैं पर बाहरी दिखाबे के लिए हम उन्हें आरोपित किये रहते हैं।मृतजीवी रिश्तों के मुख में गंगा जल की बूंदे टपकाते रहते हैं।चलो हम कम से कम रिश्तों को जीते तो हैं, लड़ते हैं तो क्या बाहरी के सामने तो सब एक हैं।चिंता है आने वाली पीढी की जब वे अकेले होंगे तो चाचा ताऊ के रिश्ते कहीं समाप्त न हो जाएं, यदि सब अच्छा ही चल रहा था तो घर के बूजुर्ग वृद्धाश्रम में कैसे पहुंच गए, इकलौते बालक को चचेरे फुयेरे तयेरे के अर्थ संन्दर्भक्यों पता नहीं रहते, जब बच्चों के पिता उसके सुख के लिए बिना सास का घर वर तलाशते हैं,उसे पट्टी पढ़ाते हैं कि तू अपना और अपने पति का देख, तुझे सास के कुनबे से क्या लेना देना।तो रिश्ते तो बिगड़ेंगे ही, अब तो सहेजे भी नहीं जा सकते।वे लगातार छीज रहे है और उन्हें छीजना भी चाहिए क्योंकि उसकी उचित परवरिश नहीं हो पाती, उसे बित्ते भर जमीन भी नहीं मिलती,बस सब पर एक ही बात हावी है कि हो सके तो रिसते छीजते रिश्तों को बनाने की एक कोशिश कर ली जाए।

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