Tuesday, July 19, 2022

सौभाग्य न सब दिन सोता है

 सफर जारी है....937

18.05.2022

शिक्षा के केंद्र रहे नालन्दा की भूमि अहर्निश प्रणम्य है और उस पर गया और बौद्ध गया जाने का यात्रा लाभ और वह भी बुद्ध पूर्णिमा के दिन मिल जाए तो यही लगता है कुछ पुण्य उदय हुए होंगे।कब से मन में था कि गया जाकर दोनों कुल के पितरों का पिंड दान कर सकें।ईश्वर ने ज्यादा प्रतीक्षा नहीं कर बाई।वैचारिक संगोष्ठी से मन तो वैसे

 ही उत्फुल्ल था और जब अलसुबह इस कार्यक्रम की जानकारी मिली तो पांचों घी में और सिर कढ़ाही में था।मारे उत्साह के रात भर नींद ही आंखों से कोसो दूर चली गई औरबस रात सपनों में बीत गई।

 पटना से गया लगभग135 किलोमीटर है ट्रेवलर में लद कर हम नवरत्न सफर पर चल दिये।एक से एक बढ़कर विद्वान और बिल्कुल मौलिक और अनछुए विषयों पर चर्चा इस यात्रा में खूब तड़का लगाया।गरम और नरम दल अपने अपने पक्ष को बखूबी रखते और जैसे ही बात का रुख किसी विवाद की तरफ मुड़ता, न्यायमूर्ति तुरन्त उसे एक नए विषय में बदल देते।पासंग मारने की तो जरूरत ही नहीं पड़ी।सुन्दरकांड की सारगर्भित व्याख्या,वरिष्ठ पत्रकार के चुभते सीधे सीधे सवाल, सहयोग परिषद के संरक्षक की संतुलित टिप्पणी, अपना अपना पक्ष रखते दो प्रमुख रचनाकारों की जुगलबंदी ने खूब समा बांधा।क्या नहीं था इस यात्रा में कहानी, कविता, गजल, शास्रीय संगीत, रवींद्रनाथ टैगोर के गीत वह भी सुर और ताल में, सच में बहुत यात्राएं की होंगी पर ये सफर कुछ हट के था।अपने अपने विषय के महारथी विद्वानों को सुनना काफी लाभदायक रहा।हम तो चुप्प ही श्रोता बने रहे।अब इतने लोग कहने वाले तो एक आध गम्भीर श्रोता भी तो जरूरी था।

 आयोजक भाई की निगाहें तो बिल्कुल सीसीटीवी की माफिक काम कर रही थीं कि कब किसको फल फलारी चाहिए कब किसका प्यास से तड़क रहा है और किसे कब चाय की तलब लग रही है,जब पेट में चूहे उपद्रव मचाने लगे तो गर्मागर्म पूड़ी आलू सब्जी और जलेबी की व्यवस्था हो गई।खा पी के निच्चू हो के सोचाचलो अब वो काम तो कर लें जिसके निमित्त आये हैं।बड़े विधिविधान से पूरी मंडली ने अपने अपने पितरों को विधि विधान से गया में स्थापित किया।और जब पंडित जी तीन पीढ़ियोंके नाम पूछ रहे थे और याद न आने पर ब्रह्मा विष्णु महेश या गंगा जमुना सरस्वती का नाम लेने की छूट दे देतातो लगा सच में हमारे पूर्वज देवी देवता ही तो हो गए हैं।कोई रिश्ता ऐसा नहीं था जिसका उल्लेख नहीं हुआ हो।रिश्तों की दृष्टि से कितने भरे पूरे हैं हम।और जिन नामों से इतनी चिपक है वह तो दूसरी पीढ़ी तक को याद नहीं रहता।सभी साथी बहुत ही विचारवान और तार्किक थे पर यहां सब आस्था और विश्वास के साथ पूजा सम्पादित कर रहे थे।मैं बार बार सभी के चेहरे पर पसरी शांति और आनन्द के भाव को चोर निगाहों से देख लेती।संकल्प तो एक लेकर आया था लेकिन उनके शूभ संकल्प ने सबको अपने रंग में भरंग लिया।सभी की चाह बलबती हो उठी और अंत में सभी ने गया में पिंड भर ही दिए।सच।ये ऐसा लगा मानो पितर साक्षात आकर हमें आशीर्वाद दे रहै हों।

 अगला पड़ाव बौद्ध गया था, निर्वाण पा बुद्ध तो हम सबके लिए पूजनीय हो गये हैं।कितनी शांति है उनके चेरेहरे पर जैसों सबको अपना सा बनने की सीख दे रहै होंबुद्धम शरणम गच्छामि।धम्मम शरणम गच्छामि,संघम शरणम गच्छामि केवल तीन सूत्र वाक्य ही नहीं, ये जीवन की सार्थकता है।पर बुद्धत्व सबके हिस्से तो नहीं आता फिर भी बोधि बृक्ष में नीचे बैठने से छूने से कुछ तो शांति मिलती ही है।ये सारे अवसर जिस के ब्याज से हाथ आये उसका उल्लेख किए बिना बात पूरी कैसे होगी भला।आजादी के अमृत महोत्सव के चलते स्वाधीन भारत में सांस्कृतिक पुनर्जागरण के विविध आयाम विषयक संगोष्ठी में संस्कृति के वैश्विक रूप को तो उकेरा ही गया साथ ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओंपर सार्थक चर्चा थी।इसी क्रम में हनुमान चालीसा के अधिकृत विद्वान पूज्य प्रदीप भैया और सुंदरकांड पर अपनी व्याख्याओं से सबके संदेहों कक निवारण करने वाले आदरणीय मनोज जी से परिचय खाते में जुड़ गया।सच में इस शैक्षिक यात्रा के कई संदर्भ बहुत मौजूं हैं।बस मैं तो इतना ही कह सकती हूँ कि संतों की संगत सदैव सुखकारी होती है और सारे दुखों को स्नेहिल स्पर्श से ही हर लेती हैं।हम बथुआ को तो गेंहू के संग पानी लग गया, बस इतने में ही भर पाये।मिलते रहे ऐसे सौभाग्य, बस ऐसे क्षणों को तो साड़ी के पल्लू में घिर्र के बांधने कक मन होता है।

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