Tuesday, July 19, 2022

संशय विहग उड़ावन हारी

 सफर जारी है....938

19.05.2022

संदेह और जिज्ञासा से ही किसी प्रश्न की शुरुआत होती है और जब प्रश्न का उत्तर मिल जाए, जिज्ञासा का शमन हो जाये तो समस्या का समाधान मिल जाता है।यह एक सामान्य प्रक्रिया है और हम सबके जीवन में कमोवेश घटित होती है।कुछ प्रश्नों के उत्तर बहुत सरलता से मिल जाते हैं, उसमें किसी तर्क वितर्क की आवश्यकता नहीं होती, संभवतः ये सूचनात्मक प्रश्न होते हैं, क्या, कौन ,कब ,कहां की श्रेणी से सम्बन्धित।तो जैसे ही जानकारी मिलती है, मन तृप्त हो जाता है।बालक, विद्यार्थी और बुजुर्ग की जिज्ञासाएं लगभग एक सी होती है ...मसलन ये क्या है, कौन है, कहां से आया है, कहां जाएगा, कब जाएगा, कितनी देर रुकेगा, खायेगा या नहीं खायेगा,खायेगा तो क्या खायेगा क्या पसन्द है क्या नापसन्द है, बस इतनी जानकारी उनके लिए पर्याप्त होती है।छोटा बच्चा काले पक्षी को देखकर पूछता है ये क्या है आप कोयल या कौआ बता देते हो, वह मान जाता है।दिमाग में एक बिम्ब बिठा लेता है काला पक्षी यानी कौआ या कोयल,फिर उनके आकार की तुलना से एक और सूचना स्टोर कर लेता है कोयल छोटी कौआ बड़ा, कोयल मीठा स्वर कौआ कांव कांव।अर्थात सूचनात्मक प्रश्नों के उत्तर में स्वीकारोक्ति जल्दी हो जाती है।इसमें कोई संदेह या भरम की गुंजायश भी नहीं होती, जैसा कह दिया जाता है कमोवेश मान लिया जाता है।

रामचरित मानस तुलसी ने लिखी और रामायण वाल्मीकि ने, यह विवाद और तर्क का विषय नहीं है पर जो लिखा गया, उससे विद्वानों की सहमति असहमति हो सकती है।वैसे भी अब विज्ञान अपने चरम पर है तो जिसे सिद्ध कर दिया जाए,जो तर्क की कसौटी पर कसा जा सके, उसे ही स्वीकारा जा सकता है,उसी की जय जय हो सकती है ,आस्था और  विश्वास गए तेल लेने।उनकी भला क्या औकात जो तर्क के दरबार मे  अंगद की तरह पैर जमा सकें।अप्रिय भले ही हो पर सत्य ही पुजना चाहिए तभी सत्यमेव जयते की डुगडुगी बज सकेगी ।अब कृष्ण जी युधिष्ठिर के अश्वत्थामा हतो कहते अपना पांचजन्य बजाने नहीं आते जिसकी शोर में नरो वा कुंजरो की आवाज दब जाए।अब तो सब खुले खजाने होता है, जो है वह है और वह सब के सामने आना जरूरी है।रचनाकार अपने आसपास जैसा देखता है, उसे कलम से उकेर भर देता है।जैसा वह अनुभव करता है ,जैसा उसे उचित लगता है, अपनी बात कह देता है।अब रचनाकार तो मर मुल्तान गये और हम आलोचक और व्याख्याकार वर्तमान सन्दर्भों में उनके लिखे को  इतना घोट पीस रहे हैं, इतने अर्थ और अनर्थ कर रहे हैं कि यदि वे उपस्थित होते तो सिर पकड़ कर बैठ गए होतेकि हाय राम, ये मैंने क्या लिख दिया।

        अब  तुलसी बाबा को ही ले लो जो पता नहीं किस धुन में लिख गए शूद्र गंवार ढोल पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी।मार विमर्श मचा हुआ है पर निष्कर्ष पर कोई नहीं पहुंच पा रहा है।कहने को तो लंबी लंबी चर्चाएं होती हैं, खूब द्रविड़ प्राणायाम किये जाते है पर परिणाम सिफर ही रहता है।अरे भाई जो गलती पर होगा ,उसे सुधारने के लिए छल बल ,साम दाम दण्ड भेद का प्रयोग किया ही जायेगा, किसी को पुचकारा जाएगा ,किसी को दुत्कारा जाएगा, अब इसका मतलब ये थोड़े ही हुआ कि हम उसके दुश्मन हो गए।घर में चार बालक हों तो माँ सब से उनककी प्रकृति के अनुसार व्यवहार करती है, कोई आंख दिखाने से ही चुप हो जाता है तो कोई लात घूंसे खाकर भी दीठ का दीठ बना रहता है।उसे कुटे पिटे बिना चैन ही नहीं आता।तो लंबी लंबी चर्चाएं भले करते रहो,अगले को सही गलत भले से ठहराते रहो उनकी व्याख्या को सही गलत भले ठहराते रहो, तुलसी बाबा तो उनका जबाब देने आने से रहे।तो खुद ही उलझो और खुद ही सुलझो।खूब तर्क गढो, गर्मागर्म चटपटी बहस करो और खुद से ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचे बिना उसे डिस्पर्स कर दो।सब तुम्हारी मर्जी।

        पर इसमें कोई शक शुभा नहीं है कि राम चरित की कथाएं बोध जगाती हैं, सुंदर हैं, अनेक संदेहों का निवारण करती है, जीवन जीने के सूत्र दे देती हैं।सिखाती हैं कि काहे का अभिमान करते हो, सीखो हनुमान से जो लंका को धू धू कर जला देते हैं पर प्रभु के पूछने पर मात्र इतना ही कहते हैंसो सब तव प्रताप रघुराई, नाथ न कछू मोरी प्रभुताई।राम कथा सुंदर करतारी, संशय विहग उड़ावन हारी।तो पढ़ते दुहराते रहिये राम कथा को, चर्चा परिचर्चा करते रहिए, इस सब ब्याज से भी आप उसी राम को याद करते हैं जो रघुकुल नायक है, जिनके नाम मात्र से भव सागर पार हो जाते हैं।राम का नाम बड़ा सुखदाई।चर्चा परिचर्चा का जो भी परिणाम हो पर हमें तो राम चर्चा सुनने को मिल ही गई न, तो हम तो अपने भाग्य सराहते हैं कि ऐसे सत्संग का सुयोग जल्दी जल्दी मिलता रहे।

No comments:

Post a Comment

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...