Tuesday, July 19, 2022

भय बिनु होय न प्रीत

 सफर जारी है...939

20.05.2022

शिक्षा सिद्धांत में कब का बदलाब हो चुका है कि सिखाने में दण्ड की भूमिका उतनी प्रभावी नहीं होती जितनी पुरस्कार की फिर पुरस्कार चाहे भौतिक रूप में हो या प्रशंसा और प्रोत्साहन के रूप में।शारीरिक दण्ड तो सिरे से ही प्रतिबंधित कर दिया गया है तो अब इसे भी बदल दिया जाना चाहिए कि लठ के आगे तो भूत भागते हैं,कि भय के बिना प्रीति नहीं होती।पाठशालाएं अब आनंदशाला में बदल रही हैं और अध्यापक उनके लिए सहायक और मार्गदर्शक के रूप में है।निश्चित ही यह सुखद स्थिति होनी चाहिए और सब जगह अनुशासन पसरा होना चाहिए।पर वास्तव में ऐसा है नहीं।अब जब सबको यह विश्वास हो गया है कि हमारा कोई क्या बिगाड़ सकता है, हमें कोई छू के तो दिखादे सीधे उसकी शिकायत कर देंगे, उसे आरोपित कर नौकरी से ही बाहर करवा देंगे तब से अनुशासन हीनता और बढ़ी है।लोग उच्छ्रंखल और मनमौजी होते जा रहे हैं, वे परम् स्वतंत्र न सिर पर कोऊ के भाव से जीते हैं, उन्हें किसी का डर ही नहीं रहा।मुंह उठायेदेर सबेर चले आते हैं और जब मर्जी हाथ हिलाए चले जाते हैं, वे निरंकुश होते जा रहे हैं और आप लिहाज में ही मरे जा रहे हैं कि शायद अब मान जाए और सुधर जाए।पर वे पक्के ढीठ और बेशरम हैं, काली कामर ओढ़े बैठे हैं, उन्हें कोई लाज नहीं आती।बड़े जोर से चिल्ला चिल्ला कर गाते हैं जाने करी शरम,बाके फूटे करम, जाने ओढ़ी बेशर्माई ताने खाई दूध मलाई।तो बेशर्म बन दूसरे के हिस्से को हड़प खुश होते रहते हैं कि देखो हमने तो किया भी नहीं और कैसे मजे लूट रहे हैं।

तो याद आता है कि अनुशासन में कोई लिहाज विहाज नहीं चलता, जो अनुशासन तोड़े उसे तुम तोड़ो।सीधी अंगुली से घी न निकले तो टेढी करो, बरतनभले ही तोड़ना पड़े पर घी पूरा निकाल लो।जिन्हें प्यार मोहब्बत की भाषा समझ नहीं आती, उनके लिएनियम बदलना ही होता है।लठ के आगे तो भूत भी भागता है फिर सारे लिहाज और तमीज एक ओर उठा के रख देनी होती है कि करो या भागो।नहीं है बस का तो सिस्टम से बाहर निकलो।नहीं आता है तो सीखो।इस भुलाबे में मत बने रहना कि इतनी कट गई तो आगे भी कट जाएगी।कटेगी बटेगी कुछ नहीं, स्वयम के कटने पिटने ध्वस्त होने की नौबत आ जायेगी।मार बदनामी होगी सो अलग, कच्ची हांडी बार बार चूल्हे पर नहीं चढ़ाई जाती।जैसा करो वैसा भुगतो।जितना शक्कर डालोगे उतना ही मीठा होगा न कम न ज्यादा।लिहाज की ए एम सीका पीरियड समाप्त हो गया, अब ये रिन्यू भी नहीं हो सकती तो उत्पाद ही बदला जाएगा।अब लगताहै कि बड़े बूढ़े ही सही थे जब वे कहते थे कि दो हाथ की दूरी बनाए रखना बहुत जरूरी है, इतने मीठे मत बनो कि लोग हलुआ का गप्पा समझ कर खा जाएं।ये भी याद रखो कि जो अति का सीधा होता है वह जल्दी काटा जाता है।देखा है न वन में सट्ट सीधे पेड़ सबसे पहले काट लिए जाते हैं और टेढ़े मेढ़ों को ऐसे ही छोड़ दिया जाता है कि इनसे कौन उलझे।तभी तो उनकी हिम्मत बढ़ती जाती है और वे हर किसी से उलझने को तैयार खड़े रहते हैं।

बदलते जमाने और परिस्थितियों के अनुसार स्वयम को बदलना बहुत जरूरी है।ऐसे जितने भी भस्मासुर हैं जिन्हें अमर होने कावरदान मिला हुआ है सबको शिवजी जी चाल से मोहिनी रूप धर नृत्य करते करते स्वयम के सिर परहाथ रखने को बाध्य करना होगा तभी इस गन्द से मुक्ति मिलेगी।जब स्वर की कोमलता का कोई असर न हो तब रुक्ष और क्रुद्ध होना ही पड़ेगा।ये रुक्षता ये क्रोध आपकी सारी नमी अवश्य सोख लेगा पर अब व्यवस्था बनाये रखने और दुष्टों को दंड देने का सही समयहै।सुधरने के बहुत बहुत मौके दे लिये, अब कोई गुंजाइश बाकी नहीं रही, थप्पड़ घूंसे लतियाने का समय बीत गया, अब तो अंतिम वार करो, इस पार या उस पार।या तो सुधरो या रास्ता नापो।सच में भय के बिना प्रीत नहीं होती।भय तो बहुत जरूरी हो गया, प्रेम स्नेह सब गए तेल लेने।अब शस्त्र उठाओ अर्जुन, इनका एक ही उपाय है।ये और कोई भाषा नहीं समझते।समझते होते तो कृष्ण के सन्धि प्रस्ताव ले जाने पर पांच गांव देने पर चुपचाप सहमत हो जाते पर इन दुष्टों ने तो उद्घोष कर दिया कि बिना युद्ध के सुईं की नोंक के बराबर भी जमीन नहीं देंगे तो युद्ध जरूरी है पार्थ।और ये जो तुम्हें अपने रिश्तेदार सम्बन्धी दिखाई दे रहे हैं ये सब अन्याय के भागी हैं।तुम इन्हें पहली बार थोड़े ही मारोगे ये तो बहुत बार मारे जा चुके हैं पर रक्तबीज की तरह फिर फिर पैदा हो जाते हैं, इन्हें अब समूल नष्ट करो।ये रामायण काल में भी थे हर युग में होते हैं।याद करो राम तीन दिन तक जड़ समुद्र के आगे रास्ता देने को अनुनय विनय करते रहे पर कोई फायदा हुआ क्या, नहीं न।तब लक्ष्मण ने क्रोध में आकर समुद्र को सोखने को वाण उठाया और जैसे हीशर संधान करने वाले थे कि समुद्र मणियों से भरा थाल लेकर उपस्थित हो गया और समुद्र पार करने को पुल बनाने का मार्ग भी बता दिया कि नाथ नील नल कपि दोऊ भाई, लरिकाई जे आशीष पाई, तिनके परस किये गिरि भारी।और समुद्र पर पुल बनकर तैयार हुआ, सेना पार उतरी, युद्ध जीतकर कर सीता को लाया गया।

तो ये सारे के सारे प्रसंग यही संकेतित करते हैं यही सीख देते हैं कि भय के बिना प्रीत नहीं होती, बोले राम सकोप तब भय बिनु होय न प्रीत।तो दुष्टों के संहार के लिए शस्त्र उठाओ अर्जुन, इसमें कोई पाप नहीं लगता बल्कि अन्यायी के वध से तो संसार प्रसन्न ही होता है।जो बात से सुधरें उनके लिए बात, जो डांट से सुधरें उनके लिए डांट और जो इन दोनों से न सुधरें उनके लिए ठुकाई पिटाई धुनाई ही मुफीद होती है तभी कहा गया कि भय के आगे भूत भागता है।तो उठा लो शस्त्र अर्जुन और सारे के सारे दुर्जनों का नाश करो जो कामचोर हैं, अपमुरादी हैं परम् स्वतंत्र है, निरकुंश हैं, स्वेच्छाचारी हैं।इन्हें मारने में कोई पाप वाप नहीं लगता।उल्टे पुण्य ही मिलता है।अब पाप मिले या पुण्य, वाणी रुक्ष हो या कोमल, कोई परवाह नहीं।बस आगे बढ़ा कदम पीछे नहीं उठना चाहिए, याद रखो मित्र भय बिनु प्रीत नहीं होती।

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