Tuesday, July 19, 2022

सब धन धूरि समान

 सफर जारी है....940

21.05.2022

बात तो बिल्कुल सच्ची है पर दिमाग में बैठ जाये तब बात बने।सारा झगड़ा तो इसी धन को लेकर ही है, सारी इज्जत, सारे क्रिया कलाप,सारे उलाहने तायने,सारा परिश्रम इस धन को कमाने और फिर उससे भौतिक वस्तुओं की खरीद और संग्रह से है, अपने को ऊंचा दिखाने से है।धन संपत्ति ही तो आपको मान सम्मान दिलाते हैं, वे ही आपको ऊंचे आसन पर बैठाते हैं, एक उसी को कमाने के चक्कर में तो व्यक्ति घर बार छोड़ जगह- जगह भटकता है और जिसे कमाने के लिए इतनी हायतोबा की जाती है ,वह साथ नहीं जाता।मर्जी जितना खाते में शून्य के आंकड़े बढ़ते जाए पर जाना खाली हाथ ही होता है।सब यहीं का यहीं धरा रह जाता है।बिल्कुल वैसे ही नंग धड़ंग चले जाते हो जैसे इस दुनिया में आये थे।मुट्ठी बांधे आया तू हाथ पसारे जाएगा, जो भी तूने छीना बटोरा सब पड़ा यहीं रह जायेगा।सब जानते बूझते भी कि पैसों से कभी पेट नहीं भरता, और और कमाने की ललक बनी ही रहती है।

कहीं बाजार में मिलता होता संतोष तो पैसे देकर उसे खरीद लिया जाता।बड़े चर्चे सुने हैं इसके कि जिसे ये मिल जाए उसके तो बारे न्यारे हो जाते हैं ।संतोषी सदा सुखी पढा सुना तो खूब जाता है पर उसे गुनते नानी मरती है।बस पाठ्यक्रम में था तो पढ़ लिया ,रट्टा मार के इम्तहान में लिख आये, नम्बर मिल गए पास हो गए तो क्या अब उसे पकड़े बैठे रहें। दोहा तो अभी तक याद है हमें,कहो तो सुना देते हैं 'गोधन गजधन बाजिधन और रतन धन खानि, जब आबे संतोष धन सब धन धूरि समान'।पर धन धूल के समान हो सकता है ,यह न तो तब गले उतरा था न अब गले उतरता है कि धन को धूरि क्यों कहा गया।अरे धन से ही तो सारे काम सधते हैं,धन ही तो पुजता है इस कलियुग में फिर धन पर धूल कैसे डाली जा सकती है, उसे कैसे भूला बिसराया जा सकता है।वह है तो जीवन है।'जल ही जीवन है 'कहा जाता है पर जल भी तो पैसे से ही  खरीदा जाता है ।पूरेबीस रुपये में बिसलरी का बस एक बोतल पानी आता है इतनी गर्मी में भला उससे कहीं प्यास बुझती है।इससे तो पहले दिन ही अच्छे थे। कहीं भी ओक लगाकर तो कभी पस भरकर पानी पी लेते और खूब तृप्त हो जाते।प्याऊ पर ,कुए पर ,हेण्डपम्प /खेंचू से कैसा सीरा सीरा मीठा पानी मिलता कि पीते ही आत्मा तृप्त हो जाये।उस दिन बहुत प्यास लगी थी तो राह किनारे लाल लाल कपड़े से ढके घड़ों से दो चार गिलास पानी क्या पी लिया , साथियों ने ऐसे आड़े हाथों लिया, ऐसे धो धो के सुनाया कि क्या जरूरत थी इस पानी को पीने की, बस अब बीमार होने की तैयारी कर लो।भला हो जो कुछ नहीं हुआ।यदि उन्नीस बीस कुछ हो जाता तो मुफ्त के पानी के मत्थे ही सारा दोष मढ दिया जाता।तो बताओ जब पानी तक खरीद कर पीना पड़े तो धन से किनारा कैसे करें ,उसे धूल समान कैसे मान लें।

धूल से याद आया धूल की तो बहुत महिमा है, देश की रज में ही लोट लोट कर बड़े होते हैं,यह बहुत पवित्र है तभी तो माथे पर लगाई और कान्हा के द्वारा खाई जाती है।तेरे लाला ने माटी खाई जशोदा सुन माई और ब्रज की रज परम् पवित्र बास जहां राधे रानी को, भूल्यो चतुरानन यहां हर लियो मन त्रिपुरारी को।तो ब्रज की धूल तो छोटी /तुच्छ हो ही नहीं सकती।तो दोहे में धन को धूल समान क्यों कहा गया।अच्छा ये धूल रेत के लिए कही गई होगी जो उड़ उड़ के आंख में जा पड़ती हैं, कंकड़ सी ककराती है, घर भर को गन्दा कर देती है, जिसे हम धूल डालना कहते हैं ,जो किसी काम की नहीं होती, जिसे बिल्कुल निकृष्ट कोटि में रखा जाता है, जिस धूल से कोई काम नहीं सधता, धन उसके समान है और वह धन भी गोधन, गज धन और बाजि धन जैसा है।आज के युग में किसे गाय, हाथी ,घोड़ा चाहिए भला।गाय का गोबर, घोड़े हाथी की लीद से तमाम गन्दगी ही फैलती है न, दूध डेरी से लो, घोड़े से भी तेज इलेक्ट्रिक वाहन उपलब्ध हैं और आजकल भला हाथी पालने का साहस किसके पास है तो वह सवारी के लिए ही अच्छा लगता है।सोने जबाहरात हीरे मोती मूंगे जैसे रत्न रखकर क्या अपने को संकट में डालना है, अरे भाई इमिटेशन का मिलता है न सब मार्केट में तो वक्त जरूरत उसे पहन लो, क्यों चोर लुटेरों को दावत देते हो।तो गौ, गज, बाजि और रतन धन की तुम्हें जरूरत है नहीं, इन सबका विकल्प रुपय्या तुम्हारा प्रिय है पर उसका भी संचय करना ठीक नहीं।याद तो होगा ही पूत सपूत तो का धन संचय, पूत कपूत तो का धन संचय।लायक निकल गया तो वैसे ही ढेर लगा लेगा और कपूत की गिनती में रहा तो सब वैसे ही बारे न्यारा कर देगा।

तो संतोष को खोजो ,कहीं से भी खोज कर लाओ।फिर लगता है ये कहीं साईं की तरह मन के अंदर ही तो छिपा नहीं बैठा है ज्यों तिल माहि तेल है ज्यों चकमक में आगि, तेरा साईं तुज्झ में जागि सके तो जागि।जैसे पुहुपन में बास है,जैसे मृग की नाभि में कस्तूरी बसी है वैसे ही संतोष भी तेरे मन के अंदर ही छिपा बैठा है, बस उसे बाहर लाना बाकी है।तो सन्तोष कहीं किसी दुकान पर और बाजार में नहीं मिला करता,वह हम सबके पास है।जब आबे सन्तोष धन सब धन धूरि समान, संतोषी सदा सुखी।जब संतोष का भाव आ जाये तो कम में भी अगन मगन रहा जा सकता है, बहुत सा रेज सा पैसा नहीं चाहिए, बस दो टैम दाल रोटी का जुगाड़ हो जाये, तन ढकने को वस्त्र मिल जाये औऱ सिर छिपाने को जगह तो हमसे बड़ा राजा भला कौन होगा और ये भी न मिले तो भी खुला आसमान और धरती तो है ही न, जो जीवन देता है वह चुग्गा और पानी भी देगा, बस ये भाव बना रहे तो सब सध जाता है।बस दोहराना होता है, मनन करना होता है जब आबे सन्तोष धन सब धन धूरि समान।

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