सफर जारी है......953
03.06.2022
पारी खत्म हुई समझो ,सारे बानक ऐसे ही बन रहे हैं,हाथ से सब छूटता सा जा रहा है, जिस क्षण को पकड़ो, सहेजने की कोशिश करो, हाथों से रेत की माफिक फिसल जाता है।धीरे धीरे सब पीछे छूटता जा रहा है। दृश्यो की रील एक एक कर सामने खुलती है और छटा दिखाकर लुप्त हो जाती है।साथी एक एक कर पीछे छूटते जा रहा है।चित्त की स्थिरता को ग्रहण सा लग गया है , समय पंख लगा कर उड़ता जा रहा है, अंधेरे घिरते जा रहे हैं, नजर धुंधलाती जा रही है, लगता है अब कुछ भी हाथ में नहीं रहा।पता नहीं चलता कि लोग बदल रहे हैं, माहौल बदल रहा है या मन ही ठहर सा गया है।चारों ओर सन्नाटा, उदासी, उमस घुमस सी पसरी हुई है।बहुत कोफ्त हो रही है, मन ही तो पगला सा गया है।ध्यान ही तो चूक गया है, उसे रास्ते पर लाने के प्रयास किये तो जरूर जा रहे हैं पर अब स्थितियां बिखर सी गई हैं।एक को पकड़ो तो दूसरा हाथ से खिसक जाता है।किस किस को पकड़ो, सब भागने की तैयारी में हैं, बस मौके की तलाश में हैं।अवसर मिले तो खिसक लें।जाने सबको क्यों लगता है कि वे साथ खड़े अहसान कर रहे हैं,काम अपने हिस्से का करते हैं और अहसान अगले पर पटकते हैं।
उनके स्वर की तल्खी बता रही है कि वे निर्द्वन्द हो गए हैं, परम् स्वतंत्र न सिर पर कोऊ सा स्वेच्छाचारिता भाव उनकी नस नस में समा गया है।अब वे बोलते नहीं, फटते से हैं, शब्द उछल उछल कर बाहर आते हैं।उनका अपने शब्दों पर नियंत्रण ही नहीं है।वे छुट्टे सांड की तरह जहां मर्जी भाग लेते हैं, फिर खोल में दुपक जाते हैं।सारे के सारे समीकरण ही गड़बड़ा गए हैं।एक को पकड़ो तो दूसरा छूट जाता है।इस अकड़ पकड़ के दौर में सब चूहा भाग बिल्ली आई का खेल खेल रहे हैं।बस अब खेल खत्म हुआ ही समझो क्योंकि अब दूसरा दौर शुरू होने को है।
सच तो ये है अब नये खेल की पारी शुरू होने वाली है, इस अंक की कथावस्तु समाप्त हुई समझो, अब पर्दा डलने ही वाला है, नये अंक की पटकथा लिखी जा चुकी है, पात्रों की स्क्रीनिंग चल रही है, ये तो भूमिका समझो,बस कुछ ही देर में अंक परिवर्तन होने को है, बस पर्दा उठा ही समझो,शतरंज की बिसात बिछकर तैयार है ,सब गोट अपने स्थान पर रखी जा चुकी है। खेल शुरू होने ही वाला है।अब के खिलाड़ी खूब छंटे हुए और पक्के हैं।किसी के भप्पे में नहीं आने वाले।तो अब के हम दर्शक बने रहते हैं, दूर बैठ कर खेल देखने और खिलाड़ियों को हूट करने का अपना अलग आनन्द है।आप खिलाड़ी जो नहीं है, बस दर्शक दीर्घा में बैठे हैं।जिधर पलड़ा भारी होगा, उधर ही चले जायेंगे, हमें तो जीतने वाले का साथ देना है।अब के भूमिका बदल चुकी है।अब करना बरना नहीं, जबानी जमा खर्च करना है।तो पर्दा बस उठने ही वाला है फिर आराम से बैठकर तेल और तेल की धार देखो।चाहे तो कमेंट भी कर सकते हैं।बल्कि अब कमेंट ही करना है, काम बाम तो बहुत सिलटा लिए ,अब हमीं थोड़े करते रहेंगे, बहुत फूली फूली चर लिये, अब बंधो कुर्सी से, जिम्मेदारी से।अब मांग हमारी है पूर्ति तुम करोगे कहीं से भी करो, हमें क्या, हमें तो बस चाहिए।ही चाहिए।बड़े इतराते से फिरते थे, मैं ये मैं वो करते थकते नहीं थे।बस अब सब तुम्हारा है।तुम जानो तुम्हारा काम जाने।तो तैयार रहना दोस्त, पर्दा उठने वाला है।
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