सफर जारी है....935
15.05.2022
सब बोलते हैं, फूल खिलखिलाकर बहुत कुछ कह जाते हैं, रात्रि की नीरव चांदनी भी कुछ कुछ कह जाती है तो भला पाठशाला की दीवारें, खिड़कियां, खेल का मैदान, कक्षा कक्ष का बोर्ड कुछ नहीं कह सकता क्या।अरे भाई, अब वो दौर धीरे धीरे अतीत में बदल रहा है जब पूरे दो साल तक इन पाठशालाओं पर कोरोना का काला साया था, बिल्कुल नीरव और सुनसान हो गई थीं पाठशाला, कक्षा कक्ष सांय सांय भाँय भाँय करते थे, खेल के मैदान बच्चों की पदचाप को तरस गए थे, वह बड़ा सा प्रवेश द्वार बिल्कुल मौन हो गया था।बड़ी और भव्य बिल्डिंग अपनी जगह थी लेकिन उसमें पढ़ने वाले गायब थे, सब जैसे ऑन लाइन में सिमट कर रह जिक था।ब्लैक व्हाइट बोर्ड अपने स्थान पर थे पर उसका प्रयोग करने वाले अध्यापक घरों में कैद थे, बागबानी खूब खिल रही थी पर उसे देखने और ललचाती निगाहों से तोड़ने के लिए उत्सुक बालगोपाल नदारद थे।बड़ा सा घण्टा अपनी जगह टँगा हुआ था, लेकिन टन टन ध्वनि करने वाला चौकीदार घर में सोया पड़ा था।अब वहां किसी की उपस्थिति ही नहीं थी जिसे प्रार्थना सभा में, कक्षा में बुलाने और आधी पूरी छुट्टी के लिए घण्टी टनटनानी पड़े।सब बिल्कुल व्यवस्थित तरीके से मौजूद था पर वे नन्हे मुन्ने बाल गोपाल जिनके लिए ये सारा सरंजाम था, वे ही गायब थे।किसी भी शैक्षिक संस्था के मूल में तो विद्यार्थी ही होते हैं बाकी तो सब उनके सहयोग के लिए ही होता है फिर चाहे अध्यापक हों, प्रधान अध्यापक हों, प्रशासन हो,क्लेरिकल स्टाफ हो,चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हो बड़ा सा पुस्तकालय ,प्रयोगशालाएं और विहंगम क्रीड़ा स्थल।बस जब मूल ही गायब तो सब बेकार सा लगने लगता है।
विद्यार्थी विद्यालय की, संस्था की आत्मा है।उसे मूल में रखकर ही सारे सरंजाम किये जाते हैं तो जैसे ही अध्ययन अध्यापन ऑफ़ लाइन हुए, प्रत्यक्ष शिक्षण प्रारम्भ हुआ, सब बदल गया है।वे मनहूस से कक्षा कक्ष कैसे जीवंत से हो गए हैं, व्हाइट बोर्ड लिप पुत गये हैं, किताबें लगातार पढ़ी जा रही हैं, पुस्तकालय की शोभा लौट आई है।किताबें विद्यार्थियों के हाथों और आंखों की संस्पर्श पा कैसी निखर गई हैं। सूने पड़े वीरान छात्रावास फिर से आबाद हो गए हैं।अध्यापकों की जिजीविषा शक्ति जैसे दुगुनी तिगुनी चौगुनी हो गई हो।सभी की भागदौड़ शुरू हो गई है, हर तरफ अफरा तफरी है।सब जाग से गये हैं।जिसे देखो वही व्यस्त है।सब पेंडिंग काम शीघ्रता से निपटा रहे हैं।उबासी लेते कर्मचारी पूरी तरह सजग हो गए हैं।सबके मन में अपने अपने काम को अच्छी तरह से करने की ललक जाग गई है।इतने बड़े बड़े परिवर्तन हो रहे हैं और वजह बस एक ही है कि संस्था के जैसे प्राण लौट आये हैं।
सच में चार मंजिला अत्याधुनिक भवन कार्मिकों के अभाव में सूने पड़े रह जाते हैं।घर की शोभा घर वालों से ही होती है।जब तक घर में बर्तन न खटके तब तक घर घर सा लगता ही नहीं और जहां चार बर्तन होते हैं तो खटकना तो लाजिमी ही है।घर में लोग हैं तो घर गन्दा भी होगा,अफरा तफरी भी होगी, अव्यवस्था भी होगी, सफाई भी करनी होगी, खाने की व्यवस्था भी होगी, घर घर सा तभी लगता हो जब शोरगुल हो, कोई कुछ मांगे, आप कभी पुचकारे कभी डांटें, बिल्कुल सूमसाम सा और खूब खूब व्यवस्थित तो होटल हुआ करते हैं घर नहीं, संस्थाएं नहीं।जहां लोग होंगे वहीं सारी व्यवस्थाएं आवश्यक होंगी, वहीं कार्मिक अपेक्षित होंगे, वहीं अधिकारी को नियुक्त करने के प्रसंग होंगे, अधिकारी होंगे तो उनके लिए सहायक होंगे, चपरासी चौकीदार होंगे, गाड़ी होगी तो चालक चाहिए होगा।गन्दगी होगी तो सफाई कर्मी होंगे, बागबानी होगी तो माली होंगे।तो एक की आवश्यकता दूसरे से उपजती है।
होते रहे शिक्षण प्रशिक्षण, आते रहें नित नवीन अध्येता, पढ़ाते रहें अध्यापक, पढ़ी जाती रहें ये पुस्तकें पत्रिकाएं ग्रन्थ और समाचार पत्र, बने रहे ये अधिकारी तो मिलता रहे उनके सहायकों को काम।बस चलता रहे ये सिलसिला और बोलती बतराती रहें ये पाठशालाएं, हम जैसे तो इसी में भर पाएंगे।
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