Wednesday, August 17, 2022

 सफर जारी है....977

28.06.2022

चलते चलो चलते चलो.....

हां तो चल ही तो रहे हैं जब से होश संभाला है। कितना तो चल लिये , जितना रास्ता नाप आए उसका दूना आगे दिखता है। जाने कितनी लंबी सड़क है कि कहीं ओर छोर दिखाई ही नहीं देता। बस सब एक ही राग अलाप रहे हैं चलते चलो चलते चलो, चरैवति चरैवति । अरे कोई बताएगा क्या कि कुल कितने किलोमीटर की यात्रा तय करनी है, कब तक चलते रहना है, मंजिल कब आयेगी, आयेगी भी कि नहीं या छोटे छोटे पड़ावों में ही संतोष खोजना होगा। अब ये सब कोई बताएं भी कैसे, सब हमारी तरह यात्री ही हैं कोई दस कदम आगे तो कोई दस कदम पीछे, सब भागे ही जा रहे हैं, सबको जल्दी है पर पता किसी को नहीं कि आखिर जाना कहां है। मार धकापेल मची हुई है। सब हाय हाय कर रहें हैं।

       दुनिया में आए नहीं कि स्कूल जाओ स्कूल जाओ  की रट शुरू गई, अरे न मन भर कर सो पाए न खेल पाए बस जब देखो स्कूल का काम कर लिया की डांट फटकार, उससे निबटो तो घर पर भी पढ़ो, पढ़ाई नहीं जी का जंजाल हो गई, खैर स्कूल कालेज की पढ़ाई पूरी हुई तो सोचा अब आराम करेंगे, सब क्लास तो पढ़ ली पर नहीं ये तो किताब की पढ़ाई थी, असली पढ़ाई तो अब शुरू होनी थी। जिंदगी जीने की पढ़ाई। स्कूली पढ़ाई में परीक्षा टाइम टेबिल /स्कीम पहले लिखवा दी जाती, सिलेबस निश्चित था ही,जरुरी प्रश्नो का संकेत कर दिया जाता, फिर गैस पेपर और पिछले वर्ष के सॉल्व्ड पेपर बाजार में मिल जाते थे सो अंदाजा हो जाता कि परीक्षा में कैसा पेपर आएगा। पर जिंदगी की परीक्षा में तो सब कुछ अनिश्चित था न कोई निर्धारित सिलेबस न कोई महत्वपूर्ण प्रश्नों की चर्चा, न गैस और सॉल्व्ड पेपर, बस चढ़ जा बेटा सूली पर भली करेगें राम।

इस परीक्षा को देते पता चल रहा है कि घर वाले सब सिखाने पर क्यों तुले हुए थे।पहले स्कूल जाने की फांय फांय फिर पढ़ लिख लिये तो ब्याह की जल्दी मच गई, चौपाए हो गए ,घर गृहस्थी बस गई तो बालको को टिकटिकाते रहे कि आगे बढ़ो और आगे बढ़ो, वे भी अपनी अपनी राह पकड़ लिये, अपने घर बार में व्यस्त हो गए तो अब फिर दुबारा से सुई हम पर आकर अटक गई है कि आगे बढ़ो आगे, अब कितना आगे बढ़ें, बी ए एम ए ,पी एचडी सब क्लास तो पढ़ लिए, फिर घर गृहस्थी में जुते रहे, अब तीसरा पन आ गया, बाल चांदी हो गए, शरीर में आलस भर गया पर रसना अपना स्वाद खूब खोज लेती है। कुछ करें चाहे न करें, झेंदा तो भरना ही है। तुम्हारी भली चलाई, तुम तो कहते ही  रहोगे, पहले कहना सुनना माता पिता के हिस्से में था, घर बदला तो सास ससुर ने कमान संभाल ली । वे स्वर्ग सिधारे तो कहने वाले और बढ़ गए। अब जे बताओ यदि हमने पूरी ताकत लगाकर पृथ्वी के गोल गोल चक्कर लगा भी लिये तो तुम तो चंदा तारे तोड़ने और आकाश को छूने की बात करने लगोगे । अब वो तो हमसे होने से रहा। 

तो बहुत कर लिया, बहुत चल लिया, अब क्या चलते ही रहें, मंजिल कितनी दूर है बताता कोई नहीं ,बस जिसे देखो चलते रहो चलते रहो की तिकतिक लगाए हुए है। जैसे हम नही चले तो पूरी दुनिया रुक जाएगी, हवा नहीं चलेगी, सूरज नहीं निकलेगा। अरे भाई एक हमारे न चलने से क्या आफत आ जायेगी, अब नहीं चलेंगे, बहुत चल लिया । हम तो एक क्या आधा कदम भी नहीं चलते पर क्या करें हाईकमान का ऑर्डर आ गया कि जब तक सांस तब तक आस तो चले चलो, आगे बढ़ते रहो। मार कविता सुना दी.... बढ़े चलो बढ़े चलो वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो, सामने पहाड़ हो सिंह की दहाड़ हो, तुम निडर डटे रहो। तो ऐसे चलें या वैसे, तेज चलें या धीमे , चलना तो पड़ेगा ही, चल ही रहे हैं क्योंकि चलना ही है। चलना ही जिंदगी है रुकना है मौत तेरी, ओ राह के मुसाफिर किस बात की है देरी।

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