सफर जारी है....978
29.06.2022
मिसफिटिया ही भले.....
अब इस नई व्यवस्था में हम जैसे तो फिट बैठने से रहे, कारण एक आध हो तो बताएं, लंबी लिस्ट है। देखो भाई बड़े बड़े क्लबों में जाने की तमीज और कल्चर हम एडॉप्ट नहीं कर पाए,तंबोला हमें आता नहीं, फैशन में जीरो और सजने संवरने में डबल जीरो, बात घुमा फिरा के कहने में कोई उपाधि ले नहीं पाए, इतने बड़े हो गए पर ये कला सीख ही नहीं पाए, दो टूक कह देते हैं बिना किसी लाग लपेट के सो सबके बुरे हैं। इसी कारण बिरादरी में छेक दिए जाते हैं। दूध में से मक्खी की तरह अलग कर दिए जाते हैं ।मक्खन लगाना आता नहीं तो अधिकारी वैसे ही पसंद नही करते । नखरे सधते नहीं हमसे, गुस्सा करें और डांटे बांटे तो पिच्च से हंसी छूट जाती है। भाषा की दृष्टि से वैसे ही गंवार है क्योंकि पढ़े लिखों जैसे गिटर पिटर करना नहीं आता। लते कपड़े ओढ़ने पहनने का सबूर है नहीं, कुछ भी लटका कर चल देते हैं, मैचिंग आती है न रंगों का बोध है। बस काले सफेद दुप्पटे और ब्लाउज में ही जिंदगी गुजर गई, ईस्टमैन कलर का जमाना तब था नहीं, अब बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम की तर्ज पर कुछ रंग चुने भी तो वे दो चार रंगो में सीमित हैं लाल हरा नीला पीला। अब अंग्रेजी कलर जानते नहीं।
फैशन की एबीसीडी पढ़नी आई नहीं, बस मुंह धोकर बालो में तेल चुपड लिया, घिर्र के बांध लिए, बालों का स्टाइल आता नहीं, केश सज्जा का डिप्लोमा किया नहीं। क्या करें जब स्कूल जाते कस के दो चोटी बांधने का रिवाज जो था और स्कूल छूटा तो पोनीटेल पर आकर गाडी अटक गई। मेकअप बाक्स आया भी तो क्रीम पावडर के अलावा कुछ समझ ही नहीं आया। फिर क्रीम पाउडर से भी कुट्टी कर ली, बालों की चिकनाई ही चेहरे पर मल ली और बहुत हुआ तो आंखों में काजल लगाया, बिंदी चिपकाई और खरामा खरामा चल देते हैं काम पर या रिश्तेदारी में, ब्याह बरात में, अब क्या हर जगह के लिए अलग अलग तैयार थोड़े ही हुआ जाएगा। अब जो हैं सो हैं, अब क्या खाक मुसलमा होंगे ।सो ज्यादा फैशनेबल और सो कॉल्ड बड़े लोगों के बीच बैठना पड़ जाए तो बडी घुटन महसूस होती है,लगता है छुट्टी की घंटी कब बजेगी, कब मुक्त होंगे जी।
तो बताओ ऐसा ऐरा गैरा पिछड़ा फिसड्डी बाबला सा प्राणी बदलते जमाने के साथ कदम ताल कैसे करे, आज के माहौल में कैसे फिट बैठे । दुनियां मॉडर्न किचिन तक पहुंच गई और हम अभी चौका बासन परात चकला बेलन चिमटाफूंकनी में ही उलझे पड़े हैं, घरों में केसरोल का लेटेस्ट मॉडल आ गया और हम ब्याह के कटोरादान में ही अटके पड़े हैं। अलाने फलाने की रिश्तेदारी में जाने को उतावले रहते हैं, सो घर परिवार अड़ोस पड़ोस इष्ट मित्रो सहेली वाहेली के मध्य झुनझुने से बजते रहते हैं। बाबा आदम के जमाने के कहलाते हैं। बड़े कहें तो कहें ,छोटे बारे भी चलते फिरते हाथ साफ कर लेते हैं। अब क्या करें ये सब नहीं आता तो नहीं आता।
तो इष्ट मित्रों ने सुझाया कि ये सब सीखना बहुत जरुरी है आज के जमाने में , जमाने के साथ मिलकर चलो नहीं तो पिछड़ जाओगी। अंदर से आवाज आई पिछड़ी तो हो ही और क्या पिछड़ोगी। ज्यादा ही नजदीक वालों ने सुझाया जो जो नहीं आता उसकी कोचिंग ले लो। सब सीख जाओगी। सीखते तो तब जब मन बनाया होता। हमें तो इसी फक्कड़ पन में आनंद आता है। कुछ लीपने पोतने की जरुरत तो नहीं पड़ती। पहले पोतें फिर घंटा भर तक घिस घिस के छुड़ाए तो लीपापोती करो ही क्यों। फिर दूसरी बोली छोड़ फ़ैशन को, पर्सनल्टी डेवलपमेंट की क्लास ज्वाइन कर लें, स्मार्टनेस तो भी आ जायेगी। अरे तो क्या स्मार्ट बनने का भी प्रशिक्षण होता है । फिर कल को कहोगी कि हाइट कम है हाई हील पहन लो, ऐसे कपड़े पहनो वैसा हेयर स्टाइल बनाओ। न भैया हम से नहीं होगा। हम तो बिना स्मार्ट ही भले।
तो अब अनफिट हैं तो भले मिसफिट हैं तो भले, हम नाय बदल रए, हम तो ऐसे ही हैं, इतनी गुजर गई तो नेक और रही है वो ऊ गुजर जायेगी राम जी सब भली करिंगे।
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