सफर जारी है....996
17.07.2022
बहनापा/भाईचारा......
संबंध निभाना भी एक कला है। एक वे हैं जिनसे अपने गिनती के चार रिश्ते नहीं निभते और दूसरी तरफ वे हैं जो निजी संबंधों के साथ साथ बहनापे और भाईचारे को भी सहजता से निभा ले जाते हैं। वसुधा को कुटुंब ऐसे ही थोड़े कहा गया है। और फिर वसुधा धरती मां है तो उस पर बसने वाले सभी जन भाई बहन ही हुए न, स्कूलों में प्रतिज्ञा करते भी यही दोहराया जाता है भारत हमारा देश है,हम सब भारत वासी भाई बहन है। फिर ये बहनापा और भाईचारा गुम कहां हो जाता है। हमारे संबंधों में सहजता क्यों नहीं रहती, हम एक दूसरे के प्रति कटु और संवेदन शील क्यों हो जाते हैं, एक दूसरे से क्यों झगड़ते हैं, एक दूसरे की आलोचना करते बाज क्यों नहीं आते।
यह सब निर्भर करता है कि आपका किन लोगो से पाला पड़ा है, आप किन लोगों के संपर्क में आए हैं, आप दूसरों के प्रति कैसा सोच रखते हैं। मेरे कार्य क्षेत्र ने मुझे देश के विभिन्न प्रांतों के विद्यार्थियों, शिक्षकों और अन्य अन्य लोगों से मिलने का सुअवसर दिया है। जिस मर्जी कोने में चले जाइए, भरपूर प्यार और आदर मिलता है । ये उन की खूबी है। उत्तर भारत में तो रहते ही हैं पर दक्षिण भारत, पूर्व और पूर्वोत्तर,पश्चिम में भी स्नेहिल संबंधों का दायरा बहुत विस्तृत है। कभी कभी तो लगता है जितना मेरी झोली में डाला जाता है, जितना स्नेह और आदर मेरे हिस्से में आता है, जितना स्वागत और सत्कार भाव मुझे मिलता है, उसका प्रतिदान तो कई कई जन्मों में भी संभव नहीं। शायद स्नेह भाव प्रतिदान मांगा भी नहीं करता, प्रभु बस ये सद्भाव बना रहे इतनी ही प्रार्थना है।
महाराष्ट् कई बार आना हुआ, नागपुर में लंबा प्रवास भी रहा पर इस बार शेवगांव और अहमद नगर के अनुभव यादों में प्रभावी बन गए। शिरडी एयरपोर्ट पर प्रो पुरुषोत्तम जी और प्रिय संजय का स्वागत भाव, शिरडी जी के दर्शन, संत ज्ञानेश्वर जी की साधना स्थली, प्रकृति की अद्भुत छटा, गोष्ठी में गणमान्य लोगों से भावभीनी मुलाकात, पुरषोत्तम कुंदे जी का सधा नेतृत्व दिल में गहरे पैठ गया। लोग बहुत करते हैं तो पैसा खर्च कर आपको व्यवस्था उपलब्ध करा देते हैं पर आपकी रूचि को ध्यान रख परिवार को कष्ट दे आपको मनचाहा भोजन परोसना छोटी बात नहीं होती। क्या देविका जी का प्रेम भाव भुलाए जाने की वस्तु है। फिर शेरके जी का शेवगांव से अहमद नगर की यात्रा, वहां के इतिहास की जानकारी, चांद बीबी का महल और अहमद नगर किले की मजबूत प्राचीर जिसमें जवाहर लाल नेहरू को कैद किया गया था और यहीं उन्होंने डिस्कवरी ऑफ इंडिया लिखी। उन्हें ये सब बताना ही था क्योंकि वे इतिहास के ही आचार्य ही थे।
अहमद नगर में प्रवेश ,प्रिय रिचा से स्नेह मिलन, राजीव जी का भावभीना स्वागत, हिंदी सृजन संस्था जिसकी फाउंडर स्वयं रिचा जी ही हैं,के कर्मठ सदस्यों से मुलाकात बहुत सुखद रही। हिंदी की बढ़ोत्तरी के प्रयास हिंदीतर क्षेत्रों में अधिक व्यापक हैं और विस्तार पा रहे हैं, ये हम सबके लिए सुखद है। लोग आपस में भाई बहिन का संबोधन देते अवश्य हैं पर उसे निभाते व्यावहारिक नहीं हों पाते। पर भाग्यशाली हूं मैं कि ऋचा की ने मुझे जिज्जी का संबोधन मात्र सैद्धांतिक रुप से ही नहीं दिया गया, उसका निर्वाह भी पूर्ण निष्ठा से किया गया। घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर बिलकुल नई जगह में एक घर मिला, घर जैसा वातावरण मिला। किसी से मिलने पर उसके व्यक्तित्व की कई कई परतें खुलती हैं। रिचा लघु कथाकार तो हैं ही, शब्दों को तो साधती ही हैं, पेड़ पौधों वनस्पतियों से उन्हें बहुत प्रेम है। छत पर जो पौधे, लता, बेल गुल्म उनके संरक्षण में फल फूल रहे हैं, वे सब उनके प्रति श्रद्धावनत हैं। अच्छे व्यक्तित्व और चरित्रों से मिलना सब के भाग्य में नहीं हुआ करता। मैं सौभाग्यशाली हूं कि मुझे ये अवसर मिला।
बस कुछ ही घंटों में वापिसी है। आते हैं तो जाते ही हैं। पर जो स्नेह और सद्भाव लेकर जा रहे हैं वह अमूल्य है। तो मिलते रहें ऐसे अवसर और अपने को भरापूरा अनुभव करते रहें।
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