सफर जारी है....996
18.07.2022
बुजुर्गों के घर /वृद्धाश्रम.....
मां एक कहानी सुनाती थीं जिसमें एक परिवार में बड़े बूढ़े न होने पर घर की मालकिन मिट्टी के बड़े बूढ़े खरीद लाती है, सभी काम उनकी आज्ञा लेकर उनसे पूछकर करती है और बहुत सी मुसीबतों और विपत्तियों से बच जाती हैं। यहां तक कि एक बार चोर उसके चोरी करने आते हैं पर घर की मालकिन को बड़े बूढ़ों से बात करते सुनकर चोरी का माल वहीं छोड़ भाग जाते हैं। पता नहीं, कहानी कितना सच थी पर इतना सच था कि घर में बुजुर्गों का खूब मान सम्मान था, उनसे पूछे बिना, उनकी राय लिए बिना महत्त्वपूर्ण फैसले नहीं लिए जाते थे। घर में उनका स्थान प्रवेश द्वार के पास का कमरा बैठक हुआ करता था जो आज ड्राइंग रूम में बदल गया है। घर के बुजुर्ग घर के रक्षा कवच थे, उनके होते नकारात्मक शक्तियों का प्रवेश घर में वर्जित था। किसी मंथरा और घर फोड़ी की हिम्मत नहीं थीं कि बुजुर्गों की छत्र छाया के होते उस घर पर नजर डाल पाती । आने वाले को ता छान के ही घर में प्रवेश मिलता।
धीरे धीरे समय बदला, प्रवेश द्वार के स्थान पर बुजुर्ग घर के पिछवाड़े भेज दिए गए l उनकी आज्ञा की कोई वकत नहीं रही, अब काम करने से पहले उनकी राय ली जानी आवश्यक नहीं समझी जाती। सूचनात्मक तरीके से उन्हें केवल संदेश दिए जाने लगे कि हम जा रहे हैं। अब जा रहे हो तो जाओ, कौन पूछ रहे हो, सूचना दे रहे हो तो ले ली। फिर इसमें भी कटौती कर दी गई। सारे फ़ैसले चुपचाप किए जाने लगे। बुजुर्गों को इसमें शामिल करने की जरूरत ही नहीं समझी गई । वे आऊट डेटेड जो हो चुके थे। नई टेक्नोलॉजी की समझ नही थी उन्हें। जैसा भी था पर वे घर में तो थे, दो समय रोटी तो मिल जाती थी। अपने बच्चों को देख कर ही खुश हो लेते थे भले ही दूर से देखना होता। बात तो नहीं हो पाती थीं। वे भी क्या करते बेचारे, व्यस्तता दिन पर दिन बढ़ती ही जाती थी। सबको बड़ा और बड़ा जो बनना था, बहुत सा पैसा कमाना था, सबके सपने बहुत बहुत बड़े थे चांद तारों को झोली में भर लेने के। नाती पोतों की अपनी अपनी व्यस्तताएं थी। बहुएं भी घर बाहर और ऊपर से बुजुर्गों को संभालने में चिड़चिड़ करने लगी थीं सो घर में सेवक सेविकाओं की फौज लग गई। पर वे घर के कोने में पड़े उपेक्षित दर उपेक्षित होते चले गए और अब नौबत यहां तक आ गई कि घर के कोने भी वेशकीमती हो गए और वे वृद्धाश्रम में धकेल दिए गए। यहां बस कुछ पैसे भरकर आप सब जिम्मेदारियों से मुक्त थे। बस बिलकुल निजी और प्राइवेसी वाली बिंदास लाइफ, मर्जी चाहे जहां घूमो, जहां मर्जी घूमो कोई रोकटोक करने वाला नहीं।
इस सुख में डूबे बिलकुल भूल गए कि हम अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे थे। अगली पीढ़ी बहुत मायन्यूटली सब ओबजर्ब कर रही थीं। हम कौन अमर मूल खा कर आए हैं, बूढ़ा तो हमें भी होना है तो जैसे को तैसा तैयार बैठा है। कहां आदर्श थे कि अभिवादन शीलस्य नित्य वृद्धोपसेविन चतवारी तस्य वर्धनते आयु विद्या यशोबलम। और आज ओल्ड एज होम की बढ़ती संख्या बता रही है कि समाज की संरचना पूरी तरह बदल चुकी है, लोगों के सोचने के तरीके बदल गए हैं। शायद वे अधिक अपडेटेड हों और हम पिछड़े सोच के हों। पर इतना तो निश्चित है कि जैसा बोएंगे वैसा काटना तो होगा ही। हम आज जितने एडवांस हो रहे है अगली पीढ़ी उससे कहीं अधिक एडवांस होगी तो एक बार जरुर विचार कर लें कि फिर ओल्ड एज होम से आगे क्या डेवलपमेंट हो सकते हैं। बहुत हो गई कमाई, बहुत बड़े बन गए ।अब भी नहीं चेते तो दुर्दशा के लिए तैयार रहो। अरे संस्कारित करो उन्हें, बहुत हो गया।
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