सफर जारी है.....995
16.07.2022
नियम तो नियम है ......
चलना सब को सड़क पर ही है, सड़क सबकी है, किसी की बपौती नहीं। तभी तो कह दिया जाता है सड़क तेरे पिताजी की है क्या। जो कर देगा, वह चलेगा। तो एक दूसरे पर भन्नाते क्यों हो। नियम बना दिए गये हैं, सबको पालन करना ही चाहिए, जगह जगह यातायात के सिपाही भी आपको नियंत्रित निर्देशित करते मिल जाएंगे। और जो आपमें इनकी जेब भरने की सामर्थ्य हो तो नियम तोड़ने पर भी तुम्हारा चालान नहीं कटेगा, तुम्हें छोड़ दिया जायेगा और तुम ट्रैफिक नियमों को घता बताते, लाल बत्ती को नज़र अंदाज़ करते कालर ऊंची कर मूंछों पर ताव देते फर्राटे से निकल जाओगे। यानी जिन्हें नियमों का पालन करवाने के लिए नियुक्त किया गया वही उन्हें तोड़ने में सहायक हो जाएगा। यही नियति है नियमों की, वे बनाये तो बड़े सोच समझ के जाते हैं लेकिन पालन के समय उनकी धज्जियां उड़ा दी जाती है। नियमों में जान बूझ कर कोई लू पोल छोड़ दी जाती है जिससे अगले को लाभ मिल सके और आपका कोटा भी पूरा हो सके। नियमों में ढील दिए जाने का ये सिलसिला सब जगह लागू है कहीं विशेष परिस्थिति का हवाला देकर तो कहीं किसी अपने को लाभ पहुंचाने के लिए नियमों को तोड़ा मरोड़ा जा सकता है, उनकी व्याख्या अलग तरीके से की जा सकती है यानी कुछ भी कर के अपनो काम हो जाना चहिए। यानी नियम कानून वस्तुनिष्ठ नहीं हुआ करते, उनमें व्यक्तिनिष्ठता बनाई रखी जाती है, कुछ जा न कुछ गुंजायश छोड़ दी जाती है।
यदि नियम नियम है तो सबके लिए बराबर होना चाहिए। क
किसी को भी छूट क्यों मिले और यदि एक को भी ये छूट दे दी गई तो अगले के लिए रास्ते खुल जाते हैं। पूरी ज़िंदगी मनुष्य इसी लाभ कमाने के जुगाड में लगा रहता है। लंबी लाइन में कौन लगे, रुको कोई न कोई शॉर्ट कट निकल ही आयेगा। टिकट बुकिंग के लिए एजेंट है तो कहीं आपके कार्य कराने के लिए सुविधा शुल्क की व्यवस्था है। नियम तो जनसामान्य के लिए होते हैं क्योंकि वे आम होते हैं खास नहीं, वे बड़े ओहदे पर नहीं होते, उनके पास देने के लिए सुविधा शुल्क नहीं होता इसलिए वे प्रभावशाली नहीं होते। मूल शुल्क ही मुश्किल से जुट पाता है तो लेने देने को पैसा कहां से आए। पर अब अधिकांश लोग ले दे के काम कराने की फिराक में लगे रहते हैं। यानी इनके पास इतनी मुद्रा है कि वे कमफर्ट जोन से बिना निकले भी उनके काम संपन्न हो जाते हैं। तो इसीलिए तो सब लक्ष्मी की फिराक में उसकी जुगाड में लगे रहते हैं। आश्चर्य है न स्कूल की फीस मुश्किल से जुटाने वाले भी अपने पाल्यों को ट्यूशन दिलाने की व्यवस्था में विश्वास करते हैं, क्या करें उन्हें करना पड़ता है। तो सबकी मानसिकता यह बनती जा रही है कि दुनिया में बने रहना है, अपनी को अप टू द डेट रखना है तो बस सारा ध्यान कमाने और कमाने पर दो, बाकी तो सब पैसे के बल पर साध लिया जाएगा। एसा न होता तो आदमी की इतनी हिम्मत कैसे हो जाती कि वह आपसे यह कहने का साहस कर पाता कि साब कुछ ले दे के हो जाए तो बताए। आप योग्यता पूरी करते हों न करते हों पर आप दूसरे की जेब भरने की सामर्थ्य रखते हों तो सब संभव हैं। कैसे भाई क्या आप प्रभावशाली के रौबदाब में आकर नियम बदल दोगे या पैसों की गरमी उन नियमों की बखिया उधेड़ कर रख देगी। नहीं भाई नियम नियम होते हैं, वे केवल पटल पर लिखने के लिए नहीं होते, केवल फाइलों में कोट नहीं होते, जिल्द चढ़ा मढवा कर रखने के लिए नहीं होते। वे सब के द्वारा पालन के लिए होते हैं फिर चाहे साधारण हों या विशेष, आम हों या खास, गरीब हो या अमीर।
तो ये सुविधा शुल्क की परिपाटी खत्म कीजिए साब, बहुत हो गया, सबको लाइन में लगने दीजिए। नियमों को तोड़ने पर दंड सबके ताईं समान रखिए तभी ये नियम कानून बचे रहेंगे और लोग इसके अनुपालन को आवश्यक मानेंगे। एक जेसे अपराध के लिए दो प्रकार के दंड कैसे हो सकते हैं साब। तो साब जी नियम केबल बनाइए ही मत उनके अनुपालन के निर्देशों को भी आवश्यक कर दीजिए।
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