Wednesday, August 17, 2022

कर्ता के कछु और

 सफर जारी है....974

25.06.2022

कर्ता के कछु और......

यदि सब कुछ व्यक्ति के हाथ में होता तो संभवत दुख की परिकल्पना ही नहीं होती पर ऐसा हो कहां पाता है। कोई तन दुखी कोई मन दुखी, कोई धन बिन रहत उदास, थोड़े थोड़े सब दुखी एक सुखी राम के दास।हर के जीवन में कुछ न कुछ दुख हैं, चिंताएं हैं जिनके समाधान खोजे से भी नहीं मिलते। व्यक्ति सोचता कुछ और है और होता कुछ और है। कुछ दुख ऐसे होते हैं जिन्हें उघाड़ कर सबको दिखाया नहीं जा सकता पर वे मन को अंदर ही अंदर खोखला कर देते हैं । फिर रहीम याद आते हैं... रहिमन अंसुवा नयन ढरि जिय दुख प्रगट करेही,जाहि निकारो गेह ते कस न भेद कहि देही। 

क्यों बांटो किसी से अपना दुख , किसी को कह कर हल्के हो भी जाओगे तो भला क्या होगा, अगला दो की चार बना कर तीसरे के कान में कू कर देगा, तीसरा चौथे के और चौथा पांचवें के में। यानी जो बात आपके पेट में नहीं पची वह भला दूसरे के में  कैसे पचेगी। बिना कहे तो उसका पेट फूल के तोमडिया हो जाएगा, फिर कैसी होएगी। तो। हर को  अपने दुख तो खुद ही झेलने होते हैं पर जब गागर ऊपर तक भर जाती है तो न चाहते भी छलक ही जाती है। कभी कभी लगता है आंखों की प्यालियों में कटोरियों में अश्रु जल जब समा नहीं पाता तो वेग से गालों पर बहता जाता है, लाख रूमाल और नेपकिन से आंखें पोंछते रहो पर आंखों से बरसात तो बंद नहीं होती न। साथ साथ सुबक भी निकलती रहती है, आवाज भारी हो जाती है, आंखे डबडबाई सी रहती है, कुछ का कुछ मुंह से निकल जाता है पर इस सबसे दुःख थोड़े ही कम हो जाता है, हां दुख की अभिव्यक्ति भले हो जाती हो।

      कितने कितने दुख है इस जगत में, मनचाहा न मिलने का दुख, मिल जाए तो उसे सहेजे रहने का दुख, जरा  चूक हुई नहीं कि उसके खो जाने, बिल्ट जाने और बिछड़ जाने का दुख। और फिर जो बिछड़ जाता है ,उसे खोजते खोजते खोजते पूरी जिंदगी बीत जाती है लेकिन वह न जाने कहां लुप्त हो जाता है, हमसे बिछड़ जाता है। जो कभी अपने थे, वे पराए हो जाते हैं। फिर दुनिया समझा समझा कर हार जाए, मन नहीं मानता।  अतीत की गलियों में गोल गोल घूमता रहता है, समय न जाने कितना आगे बढ़ जाता है, कितना पानी बह जाता है पर हम वहीं के वहीं खड़े पुरानी ,सुंदर और मनभावन यादों में खोए रहते हैं। ये यादें ही तो मन दुखाती हैं, बड़ा तड़फाती हैं, बार बार आंखें डबडबा जाती हैं पर फिर खुद ही खुद को सांत्वना देनी होती है, मन को संभालना होता है, दिनचर्या पूरी करनी होती है, सामाजिकता निभानी होती है पर जैसे ही एकांत मिलता है कि यादें आपने घेरे में ले लेती हैं।

      किसी दूसरे को समझाना कितना सरल होता है, कैसे कैसे उदाहरण और नजीर दे दिए जाते हैं पर भगवान न करे किसी अपने को क्या ,दुश्मन को भी दुख की छाया भी  छू सके। अपने को क्षण भर अगले की स्थिति में रख कर देखो तो अहसास होगा कि दुख,बिछड़ने का दुख, अपने सबसे प्यारे वस्तु/ व्यक्ति के विमुख हो जाने और उससे अलग होने का दुख कैसा तोड़ता है, कितनी पीड़ा होती है, इसे तो भुक्त भोगी ही जान सकता है। घायल की गति घायल जाने के जिही लागी सोय। अगले व्यक्ति को उस दुख का अहसास तो तब होता जब वह उसका अंग बना होता। जब अपना दिमाग न चले तो इसी बात पर विश्वास करना होता है कि  मेरे मन कछु ओर है कर्ता के कुछ ओर। फिर ये कष्ट हमें ईश्वर की ओर से दिए गए हैं, तो भोगने तो होंगे ही चाहे कलप कलप के रो रो के भोगे या ईश्वर का प्रसाद मान सिर झुका स्वीकार लें। कुछ दुखों के समाधान नहीं हुआ करते, बस उन्हें भोगना ही होता है। तो ईश्वर जिन कष्टों को दूर नहीं कर सकता फिर चाहे वे अपने हो या अपनो के, उन्हें सहने की शक्ति दे। ये दिन भी बीत ही जायेंगे। जब वे दिन नहीं रहे तो भला ये ऐसे कितने दिन टिकेंगे। दुःख भरे दिन बीते रे भैया फिर सुख आए रे, रंग जीवन में नया छाए रे।

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