Wednesday, August 17, 2022

प्रेम किए दुःख होय

 सफर जारी है....975

26.06.2022

प्रेम किए दुःख होय......

ये ढाई आखर का शब्द प्यार/प्रेम न जाने कितनों कितनों की तकदीर बदल देता है, किसी की झोली में खुशियां ही खुशियां डाल देता है, उसे उत्साह से भर देता है और वह गाता डोलता है एक तू जो मिला सारी दुनिया मिली। जो कहीं किसी को उसका प्यार न मिले या प्यार में धोखा मिल गया तो वह दुख के सागर में डूब जाता है,रोता बिसूरता है तुम न जाने किस जहां में खो गए , उसके विछोह में वियोग में पगला जाता है।पता नहीं हम क्यों भूल जाते हैं कि प्रेम सौदा नहीं होता कि एक ने किया तो उसे प्रतिदान मिले ही मिले. अब प्यार किया या हो गया जैसा कि प्यार किया नहीं जाता हो जाता है,तो हो गया तो हो गया, उस पर किस का बस। अब ये जरूरी तो नहीं कि प्यार करो और उसका प्रतिदान भी मिले ही मिले। मिल जाएं तो सौभाग्य और न मिले तो क्या, प्यार थोड़े ही कम हो जाता है, फिर  प्यार शर्तों पर थोड़े ही किया जाता है कि ऐसा होगा तो ऐसा होगा, मेरे अनुसार चलो तो प्यार है और जो तुमने नेक अपने मन की कर ली तो प्यार बिला गया, उड़न छू हो गया।ये तय थोड़े ही हुआ था कि तुम एक पैसा दोगे वह दस लाख देगा। तुम दस करोड़ प्यार करो, वह एक भी न करे क्योंकि प्यार तुम कर रहे हो, वह नहीं।अब वे लम्हे जिन में बड़े बड़े वादे किए गए, साथ निभाने के दावे ठोके गए कि जब तक सूरज चांद रहेगा इन हाथों में हाथ रहेगा, गंगा जमुना में जब तक ये पानी रहे,मेरे सजना तेरी जिंदगानी रहे या ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे, छोड़ेंगे हम मगर तेरा साथ नहीं छोड़ेंगे जैसे गीतों नगमों की पंक्ति गुनगुनाई गईं। क्या वे वादे इतने कच्चे थे कि जरा सी ठें लगी और टूट गये। 63 का आंकड़ा 36में बदल गया, जरा सा माहौल क्या बदला, हवा का रुख तिरछा क्या हुआ, मन का सा क्या नहीं हुआ,सुर ही बदल गए, तुम तो दुर्वासा बन गए भाई, सब तहस नहस कर दिया, कोई मेल मुरब्बत नहीं बरती, अगला पिछला कोई क्षण याद नहीं आया, तुमने तो चुनरी और पटके में लगी गांठ कैंची से ही काट दी कि न बाबा आएगा न घंटा बाजेगा। सब भुला बिसरा दिया। बिलकुल महाजन बन गए, सब सूद के साथ वसूल लिया। एक प्रहार की जगह दस गुना प्रहार कर दिए फिर भी क्रोधाग्नि कम नहीं हुई बल्कि हर बार अगले के आने की आहट उसमें घी की आहुति का काम करती रही।

 नहीं भाई नहीं ,ये तो प्यार की परिभाषा नहीं हो सकती,ये सब तो प्रेम के दायरे में आता ही नहीं। प्यार के परिंदे तो बने पर उनके किस्से नहीं पढ़े क्या, लैला मजनू, शीरी फरहाद, पारो देवदास ये पुराने हो भी गए तो नए में से मिसाल चुन लेते। अरे इन मीरा, राधा, गोपी, शबरी का इतिहास ही जान लेते।प्रेम दीवानी तो मीरा भी थी, जब देखो तब श्याम रंग में डूबी रहती थी, गाती रहती थी ऐ री मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दरद न जाने कोय, घायल की गति घायल जाने के जिही लागी सोय। मीरा ने तो अपने प्रेम पात्र को मोल खरीद लिया, माई री मैंने लीनो गोविंदा मोल, कोई कहे मंहगो कोई कहे सस्तो लियो री तराजू तोल। श्याम सुंदर तो थे ही इतने मोहक कि गोपियां सांवरे के प्रेम में रंग गई, उद्धव ज्ञान की पोटरी लेकर आए गोपियों को समझाने, आयो घोष बड़ो व्योपारी तो साफ़ साफ़ कह दिया ऊधो मन नाहे दस बीस, एक हतो सो गयो श्याम संग को आराधे ईश। बेचारे उद्धव अपना सा मुंह लेकर लौट गए। गोपियों को इससे लेना देना कहां था कि श्याम उन्हें प्यार करते हैं या नहीं, तुम करो मत करो, हम तो करते हैं, इतना काफ़ी है। घनानंद अपनी तान अलग छेड़ते हैं अति सूधो सनेह को मारग है जामे नेक सयानप बांक नहीं, और अंत में उलाहना भी दे देते हैं तुम कौन सी पाटी पढ़े हो लला मन लेत हो देहु छटाक नहीं। अब इन सब की तो चर्चा करना ही बेकार है। ये नए युग की प्रीत है जिसमें युग युग से हम गीत मिलन के गाते रहे हैं, गाते रहेंगे की कोई गुंजाइश बाकी नहीं रही।

 अब नए जमाने के प्यार हैं जिसमें अपना अपना फायदा देखा जाता है कि जितना मिलेगा उतना ही प्यार करेंगे। और जो इसमें भावुक हो जाते हैं वे निरे बेवकूफ कहलाते हैं, जब देखो टसूबे बहाते रहते हैं, मिलने के लिए तड़फते रहते हैं और अगला उसे कुत्ते सा दुतकारता रहता है। अरे ये भावुकता छोड़ो, जब अगला तुम्हें कौड़ी के भाव नहीं पूछ रहा, सूखी घास भी नहीं डाल रहा तो तुम क्यों बार बार उसकी देहरी पर सिर फोड़ने चले आते हो और हर बार जलील होकर अपना सा मुंह लेकर लौटते हो। ये एकतरफा प्यार के किस्से  समझ से बिलकुल परे हैं। एक ऐंठ के मारे पैंठ को जाता है, बात बात पर लतियाता  है और दूसरा फिर भी वहीं सिर पटकता है। अरे भाई, जब अगला कान में रूई ठूंसे बैठा है तो काहे को सप्तम स्वर में रेंकते हो। फिर तुम्हें बार बार एक ही संवाद को सुनने में आनंद आता हो तो तुम्हारी मर्जी। भले ही ये एकतरफा प्यार हो पर प्यार करने वाला इसी में खुश है। उसे प्रेमास्पद से कोई शिकायत भी नहीं, वह उसे देखे, उसकी उपेक्षा करें, उससे दूरी बरते, कोई फरक ही नहीं पड़ता। वह तो मान कर चलता है प्रेम का कंटीला रास्ता तो उसने चुना है, स्वेच्छा से चुना है किसी ने जोर जबरदस्ती तो नहीं की।

  अब यदि प्रेमास्पद को आपने भगवान जी का दर्जा दे रखा है तो  ये भी याद रखो प्रभु तो तपस्या पूरी होने पर दर्शन देते हैं। और तपस्या पूरी होने का समय निर्धारित करना कम से कम तुम्हारे हाथ तो है नहीं , वे जब आएंगे तब आएंगे, तुम तो बस धैर्य बनाए रखो, तपस्या पूरी हो जाएगी तो दर्शन हो जाएंगे नहीं तो अगले जन्म में मिलेंगे, क्या परवाह है। शबरी ने लंबी प्रतीक्षा की कि राम आएंगे, राम आए। गोपियों को भी अंतत सांवरा मिल गया, तो तुम भी धीरज धरे रहो। वैसे एक बात बताओगे बंधु ,कभी रत्नावली की फटकार याद आती है क्या अस्थि चरम मय देह में तामें ऐसी प्रीत, जो होती भगवान में तर जाते भवभीत। जितना समय जितनी आस्था जितना भाव किसी व्यक्ति में लगाने की ठानी है ,उसका आधा भी भगवान में लगा देते , तो मन में शांति आ जाती। प्यार की ढैया अपनी जगह है और मान सम्मान अपनी जगह। उतना झुको जिससे पीठ में कूबड़ न निकल आए , कम से कम अपनी और अपनों की इज्जत तो बनी रहने दो।  ब्याह करो, गृहस्थी जोड़ो, लड़ो झगड़ो, चार कह सुन लो, मार झंझट है, प्यार का समय धरा किसके पास है, ये बड़े लोगों के चोचले होते होंगे, होता होगा कभी प्यार अंधा, अब तो प्यार कम सौदे अधिक होते हैं। अरे घर गृहस्थी से फुर्सत मिले तो आई लव यू की सोचें, मध्यवर्गीय तो दाल रोटी की व्यवस्था में ही उलझा रह जाता है। हां ,साथ रहते एक दूसरे की परवाह जरूर होती है चाहो तो उसे प्यार का नाम भले दे लो। तो प्यार की ढय्या तुम्हें ही मुबारक हो, हम तो ऐसे ही भले।

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