सफर जारी है.....९८३
०४.०७.२०२२
हाशिए भी ज़रूरी हैं.....
जो परिधि से बाहर हैं, वे हाशिए पर ही हैं । पेज तक पर लिखते हाशिया छोड़ दिया जाता है। हाशिए अक्सर उपेक्षित ही रह जाते हैं, वे पेज की शोभा बढ़ाने के लिए होते हैं, अनुच्छेद परिवर्तित करना हो तो हाशिए के बाद भी कुछ स्पेस छोड़ दिया जाता है। रूलदार कागज हो तो हाशिए अनिवार्य रूप से होते ही हैं पर सादा कागज पर भी स्केल से हाशिए खींच लिए जाते हैं। दरअसल हाशिए पृष्ठ की शोभा को द्विगुणित करते हैं। तो हाशिए हाशिए होते हैं, वे मूल पृष्ठ नहीं होते, हां पृष्ठ का ज़रूरी हिस्सा अवश्य कहे जाते हैं।अब ये अलग संदर्भ है कि कुछ जरुरी नोट्स सदैव से हाशिए पर ही लिए जाते हैं । बहुत कुछ छूटा भी हाशिए पर ही लिखा जाता है। जांचक भी सुझाव और अंक उसी पर टीप देता है। तो इसका एक अर्थ यह भी हुआ कि हाशिए कभी कभी मुख्य पृष्ठ से महत्वपूर्ण हो सकते हैं। हां, उन पर मूल विषय वस्तु सुंदर सुंदर सुडौल अक्षरों में नहीं लिखी जाती। जो भी टीपा जाता है दरअसल वह मूल को अधिक व्यवस्थित करने के लिए तो बहुत महत्वपूर्ण होता है पर वह मूल नहीं होता।l
मूल ज्यादा बड़ा है या उसे सुडौल सुव्यवस्थित सुघड़ बनाने वाला हाशिया। कहीं कहीं तो मूल लिखे में इतनी काटपीट होती है कि सब हाशिए में ही सुधार सुधार कर लिख दिया जाता है और उस लिखे को फिर दूसरे नए पेज पर उतारना होता है ठीक वैसे ही जैसे संतान को जन्म तो जननी ही देती है पर कई बार उसे सर्वश्रेष्ठ सर्वोत्तम बनाने और सर्वोच्च आसन पर बैठाने का कार्य जननी के अभाव /अनुपस्थिति में पालिता करती है फिर भी पालिता जननी पद तो नहीं ही पाती न, जिन्दगी भर हाशिए पर ही बनी रहती है। दोनों एक दूसरे के पर्याय नहीं हुआ करते।हाशिए का वजूद परिधि के आगे सदैव बौना ही रहता है। यदि ऐसा है भी तो क्या, परिधि हाशिए भले ही क्षितिज की तरहआपस में कभी न मिले पर अपने अपने वजूद के साथ अस्तित्व में सदा ही बने रहते हैं।
तो घर,परिवार,समाज,कार्यस्थल हर जगह हाशिए जैसे लोग बहुत ज़रूरी होते हैं, वे होते हैं पर नहीं होते। दिखते नहीं है पर बीम की तरह संभाले सब रहते हैं। स्तंभ की तरह सदैव खड़े रहते हैं। हाशिए हमेशा सजग होते हैं। उन्हें दौड़ के सब संभालना जो होता है। परिधि पर सूक्ष्म दृष्टि गढ़ाए रहते हैं, सबका अवलोकन करते रहते हैं , जहां गलत होता दिखा, सही करने दौड़ते हैं। वे अभ्यासी हैं। ज़िंदगी भर परिधि को आकार ही तो देते रहते हैं। उनका क्या, वे तो परिधि के चारों ओर ओट किए रहते हैं और इसी में खुश हो लेते हैं। दुनियां भले ही उन्हें महत्व दे न दे, पर वे अपने में भरे पूरे रहते हैं। क्या फर्क पड़ता हैं उन्हें इस उस की चकल्लस से, कौन उन्हें इन उन से प्रमाण चाहिए। सो हाशिए हाशिए ही बने रहें, इतना ही काफी है।
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