Wednesday, August 17, 2022

आलस वैरी तन बसै

 सफर जारी है.....९८४

०५.०७.२०२२

आलस वैरी तन बसै......

जो भी छोटा बडा काम करना हो, उसे कल पर वे लोग छोड़ते हैं जो अपने कमफर्ट जोन से बाहर ही नहीं निकलना चाहते। वे जैसा है सब वैसा ही रहने देते हैं पर स्थितियों को लेकर हमेशा रोते झींकते रहते हैं कि काश हम ये कर लेते वो कर लेते और फिर सारा दोष परिस्थिति या व्यक्ति अथवा वस्तु पर डाल दिन भर उसे ही आलोचित करते रहते हैं। मसलन नाच न जाने आंगन टेढ़ा या बाबा आबे तो घंटा बाजे को अपने जीवन का ध्येय वाक्य बना लेते हैं। उन्हें चाहिए तो सब पर वे स्वयं को रंचमात्र भी कष्ट नहीं देना चाहते। उनके मानस में यह बात अच्छी तरह बैठ गई होती है कि अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम, दास मलूका कह गये सब के दाता राम। वे तो उस दाताराम को भी चेलेंज कर देते हैं जब हमें ही करने को उठना पड़ा, तो तुम्हारी क्या उपयोगिता रह जाएगी। हम तो नौकरी के लिए आवेदन तक नहीं देंगे, अब दाताराम हैं तो हमें घर बैठे नौकरी देंगे, अपॉयंटमेंट लेटर हमारे घर चल कर आएगा, कोई सहायक हमें कुर्सी पर बिठा देगा। और फिर हम दाताराम को भूल भुला कर अपने को सर्वेश्वर मांगने लगेंगे कि देखो हमें तो बैठे बिठाए नौकरी मिल गई, क्या करें स्कूल प्रबंधन को हमारी बहुत जरुरत थी, माने ही नहीं वे, जबरन कुर्सी पर बैठा दिया।

यानी वे कहते भले हो सबके दाताराम पर वे अर्धाली पर ही जोर देते हैं अजगर करे न चाकरी। ये दोहा उन्हें इतना रट जाता है कि कबीर तो इनके स्वप्न में भी नहीं आते। कबीर को पढ़ा और गुना होता तो जानते कि आज करे सो काल कर काल करे सो अब, पल में परलै होएगी बहुरि करेगो कब। वे सब काम कल पर छोड़ देते हैं कि कल की कल देखी जायेगी, आज तो आनंद करें।और मजे की बात है कि कल कभी आता ही नहीं ।कल आज बनते ही कल में बदल जाता है। इस कल की बड़ी महिमा है, इसने अच्छे अच्छों को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। इस कल के चक्कर में सब काम कल पर छोड़ दिए जाते हैं और ये बदमाश कभी आता ही नहीं, रोज़ कल की गुंजायस शेष रह जाती है। आलसियों के पास बहानों की लम्बी सूची तैयार रहती है कि आज मन नहीं है, कल देखेंगे। अरे छोड़ो कौन करे, ऐसे ही ठीक है। यानी कुछ कुछ कह कर अपने मन को तसल्ली देते रहते हैं कर के ही क्या हो जायेगा, जो कर लेते हैं उन्हें भी तो अंत में मरना ही होता है फिर ज़माने को क्या याद रह जाता है, तो हम तो बिना करे ही ठीक हैं। कोई अपनी दिन रात की मेहनत से अब्बल रहे, तो उसकी आलोचना करते डोलते हैं अरे हमें सब पता है बास की चमचागिरी की होगी, रिश्वत खिलाई होगी, तरक्की ऐसे ही थोड़े ही मिलती है। मतलब यह है कि खुद कुछ करेगें नहीं और दूसरों में दोष खोज खोज कर , उनकी आलोचना कर अपने मन को तसल्ली देते रहते हैं कि हम तो ऐसे ही भले। और वे करें भी क्यों, भाग्य के इतने धनी हैं कि कोई न कोई बकरा  बलि देने को उन्हें मिल ही जाता है और जो किसी ने इनकी हुक्म उदूली की तो उसे बेइज्जत कर अपने जीवन से ही बाहर फैंक देते हैं। कठोर और असंवेदनशील तो इतने अधिक होते हैं कि अगला इनकी देहरी पर सौ बार नाक रगड़े, अनकिए की माफी मांगता रहे, आंसू बहाता रहे पर इनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता, वे उसे अपने जीवन से दूध में पड़ी मक्खी सा निकाल फैंकते है। यानी जो उनके अनुरूप नहीं चलेगा वह आउट आफ साइट हो जायेगा।

इन महा आलसियों के किस्से बड़े रोचक हैं। उन्हें करने की आदत तो होती नहीं, सो पिछले किए को भुनाते रहे हैं। मसलन पहले तो मैं ये कर लेता था वो कर लेता था, बस अब इच्छा ही नहीं होती करने की। करने को तो आज भी कर लें पर बिना हाथ हिलाए ही यदि सब किया कराया मिल जाए तो इन दामों में क्या बुरा है। बस हम नहीं बदलेंगे, ऐसे थे और ऐसे रहेंगे। 

आपके आस पास भी ऐसे आलसी जरुर होंगे। उनसे अपने को बचा के रखिएगा। वे आलसी हैं तो हुआ करें, अपनी करनी को वे भुगते, बिना साफ सफ़ाई के गंदगी में उनको रहना रास आता है तो आए, अगले को भला क्या परेशानी होगी। वे जैसे हैं वैसे बने रहें, अपने आलस का फल भोगे, उन्हें भोगना ही होगा, वे इससे बच ही नहीं सकते। पर अपने अकर्मण्यता के छीटें दूसरों पर डालने से बाज आएं। बहुत फूली फूली चर ली उन्होंने, अब कोई बलि का बकरा नहीं बनेगा। आलस उनका, अकर्मण्यता उनकी, काम न करने का फैसला उनका, कमफर्ट जोन से बाहर आना वे नहीं चाहते,यथास्थितिवाद में वे बने रहना चाहते हैं तो ठीक है वे रहें और उसका परिणाम भुगते। उन्हें यही जीवन शैली रास आती है तो आया करे, लोगों को क्या परवाह। अरे परवाह तो अपनो को होती है। वे बार बार सुभाषित, उदाहरण और कहानी इसलिए ही सुनाते हैं कि शायद रोज रोज कहने से कुछ बदल जाए, अगले की समझ में भर जाए क्योंकि रसरी आबत जात से पत्थर पर भी निशान पड़ जाता है फिर वे तो मनुष्य हैं, शायद कहीं संवेदना,अच्छाई, समझ दुपक के बैठी हो और किसी बात का मारक प्रहार हो जाए और अगला सोते से जग जाए। किस किस को सुधारोगे, यहां तो हर शाख में उल्लू बैठा है और फिर ये भी नहीं भूलना चाहिए कि लंका में सब बाबन गज के ही होते हैं तो बात कह भले ही दो पर सुधार की कोई उम्मीद मत रखो। अपना काम करो और आगे बढ़ जाओ बस।

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