Wednesday, August 17, 2022

मोकू लायो है कहा

 सफर जारी है....९७५

०६.०७.२०२२

मोकू लायो है कहा ......

उद्धव जब कृष्ण की पाती लेकर आते हैं तो गोपिकाएं जानना चाहती हैं कि कृष्ण ने उनके लिए क्या लिख भेजा है

मोकू लिखो है का कहती वे सभी उस पत्र में अपना नाम देखने की उत्सुक हैं वे सांवरे के प्रेम में पगी हैं लेकिन ज्ञान बाबरी नहीं हैं, उन्होने तो केवल प्रेम का ढाई आखर ही पढ़ा है। बाकी कुछ नहीं जानती। बेचारे उद्धव महाज्ञानी होने का दंभ पाले बैठे थे कि गोपिकाओं को ज्ञान दे कर आयेंगे। यहां तो संदर्भ ही उलट पलट गया, पूरी पाती खींच तान में फट गई, और गोपियों चिंदी चिंदी कागज ले उसे ही हृदय से लगाए बैठी है कि कृष्ण ने उन के लिए कुछ भेजा है, इससे बडा सौभाग्य उनका और क्या होगा। निर्गुण की उपासना करने की सलाह देते उद्धव को कह देती है हमारे पास तो एक ही मन था जो हम कृष्ण को दे चुके हैं, अब दूसरा मन कहां से लाएं। ऊधो मन नाही दस बीस , एक हतो सो गयो श्याम संग को आराधे ईश।

सोचो वहां तो उद्धव आए थे तभी गोपियों को इतना सुख मिला कि कम से कम हमारे प्रिय के पास से कोई आया तो है, उससे ही खबर मिल जाएगी प्रिय की। पूरे माहौल में विरह ही विरह घुला हुआ है लखियत कालिंदी अति कारी या मधुवन तुम कत रहत हरे, विरह वियोग श्याम सुंदर के ठाढे क्यों न जरे। जब प्यारे कन्हैया के आने की खबर और खबर लाने वाले दूत का आगमन इतना उत्साह भर देता है तो यदि सचमुच में प्यारा कान्हा आ जाए तो सब जैसे जी उठते हैं और दुनियां भर की मांओ के लिए तो उनका लाला ही कन्हैया होता है। उसके आने की खबर से ही उसकी बीमारी उड़नछू हो जाती है, मन उत्साह से भरा भरा रहता है और प्यार छलका छलका पड़ता है और कहीं वह सपना सचमुच पूरा हो जाए , आपका लाडेसर भले ही एक सप्ताह को आपके पास चला आए तो परिवार में कैसी खुशी की लहर सी दौड़ जाती है, लगता है जेठ की तपती धूप  अचानक ही सावन की हरियाली में बदल गई हो, जो पौधे धूप से झुलस से गए थे, एकदम सरसा गये। मन और तन कैसा फूल सा हल्का हो जता है।तो हमारा कान्हा भी माता पिता दाऊ भैया और सारे ब्रज वासियों से मिलने चला आया है। बड़े बड़े सूटकेस जादू के पिटारे हैं , खुलते दर खुलते जा रहे हैं, एक से एक करामाती वस्तुएं निकलती जा रही हैं, पर कोई नहीं कह रहा कि माेकू लायो है का, मोकू लायो है का, जो जो उनके लिए लाया गया, सबने सिर माथे लगाया है। लाला आया है यह बडी बात है, लाना तो सेकंडरी है। छोटा सबकी पसंद का ध्यान रख कर कुछ कुछ जरुर लाया है। सबकी रुचि इन सबसे अधिक बातों में है, कितनी कितनी बातें हैं जो सोच के रखी थीं हजार बारह सौ दिन कम थोड़े ही होते हैं, इतने दिनों की बातों को रोज का रोज लिखा गया होता तो अब तक तो ग्रंथ के ग्रंथ तैयार हो गए होते और कहीं भावनाओं के रेखाचित्र उकेरे गए होते तो कितने कितने चित्रों के बंडल होते जिन्हें सुरक्षित रखने को अभिलेखागार भी छोटे पड़ जाते। पर अब सब भूले जा रहे हैं अब उसे जी भर के देखें कि बात करें कि उसकी पसंद का सब बना बना के खिला दें कि नए देश की बातें पूछें कि उसकी सृजन शीलता के नमूने देखें कि समय को पकड़ें। समय तो यू ही भागा जा रहा है, लाला को भी ढेर सारे काम निबटाने हैं। सब जैसे गड्डमड हुआ जा रहा है।

सदा से ही  कम बोलने वाले पिता का मौन मुखर हो गया है । बडेला का प्यार लुटाने का तरीका अलग है , बहन का स्नेह है, बुआ का दुलार है, मौसी का लाड है और मां , उसका तो कहना ही क्या। उसकी तो आंखें भी बोलती है, ध्यान लगा कर बात सुनते भी वह कितने कितने स्वप्न बुनती  हर पल को संजो कर रखने के यत्न में लगी है। लाडेसर ज्याडा ही लड़ैता है तो कई कई बार उसे ममा बॉय का उपनाम भी मिल जाता है। अब पिटपुछने कितने बड़े हो जाएं, मां के लिए तो गोलू मोलू ही बने रहते हैं,मां की गोद का दायरा कम थोड़े ही हो जाता है। सो एक एक मिनट क्या एक एक सैकंड का महत्व है। एक लंबे अंतराल में कितना कुछ घट गया, घर की बुजुर्ग अम्मा का साया छिन गया, कोरोना की विभीषिका से तो कोई अछूता नहीं रहा। सब समय निकल ही गया। अब कुछ उबरे हैं। घर में उत्सव सा माहौल है, दीवारें भी बोलती सी लगती हैं, हवा अचानक से शीतल हो गई है, उमस गर्मी बैचेनी सब भूल भाल गए हैं, बस इसअवसर के एक एक पल को पूरी तरह जीने का मन है। तो जीते है इन पलों को पूरे शिद्दत से।

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