सफर जारी है....1040
30.08.2022
जैसे पेड़ खजूर .......
ये लो कल्लो बात, हम तो जे समझे बैठे थे कि सारी मुसीबत नाटे कद वालों की होती है, आलोचना के शिकार वे बनें और कहीं आस पास में छह फुटिया खड़ा हो जाए तो कद और छोटा लगने लगे और मन में धुकुर धुकुर अलग लगी रहे कि जे बांस से हटें तो नेक सहज हो पाएं। लंबे कद की शान में तो बड़े बड़े कसीदें पढ़े गए कि जिसकी बीबी लम्बी उसका भी बडा नाम है और जिसने अच्छा खासा कद पाया हो वह तो दूर से ही अलग चमकता रहता है। फिर हमारे कबीर जी को क्या हो गया कि लिख मारा बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर। अब खजूर के पेड़ के अपने आनंद हैं। कन्या लांगुर गाते दुहराते हैं न मईया तेरी गेल में एक लंबो पेड़ खजूर, बापे चढ़ के देखियो मेरी मईया कितनी दूर कि लांगुर तुम लुटिया हम डोर सरक चले जई वन में कि चक्की चल रई बड़ के नीचे रस पी जा लांगुरिया। और कबीरा यों कह रए कि बडा भया तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर और जैसे ही आगे की लाइन पढ़ी कि पंछी को छाया नहीं फल लागे अति दूर सो ज्ञान चक्षु खुल गए कि ताड़ जैसे लंबे लंबे होने का कोई अर्थ नहीं जो किसी के काम न आ सको। अब खजूर और ताड़ के पेड़ भले से लंबे हो पर आम आदमी के बस का न तो उस खजूर को तोड़ पाना सहज है और न राहगीर को उन चार पत्तों की छाया नसीब हो पाती है जो शीर्ष पर टिके बस अपने में ही आनंदित होते रहते हैं पर किसी के काम नहीं आते।
फिर पड़ा विद्या विनयम ददाति कि पढ़े लिखें गुने व्यक्ति तो नम्र होते हैं, ऐंठ के मारे पैंठ को नहीं जाते। अब देखो फलों से फलों से लदा वृक्ष कैसे झुका झुका सा रहता है कि छोटा बालक भी हाथ बढ़ा के डाली झुका कर फल तोड़ ले नहीं तो पेड़ को झकझोर कर हिला दें तो पके आम कैसे टप्प सीना जमीन पर गिर पड़ते हैं। फिर बताया गया नर की अरु नल नीर की गति एकही कर जोय, ज्यों ज्यों नीचो हे चले त्यों त्यों ऊंचे होय। जो भरे होते हैं वह अधजल गगरी से छलकते नहीं और थोथे चने से बजते नहीं। के अधजल गगरी छलकत जाए और थोथा चना बाजे घनात। जो शारीरिक कद से छोटे हो तो उसे बढ़ाने के ढेर विकल्प बता दिए गए और सबसे आसान तो ऊंची एड़ी के उपानह पहन लो कि पटरे पर खडे होकर ऊंचे पे रखी वस्तु भी उतार लो। मतलब कद को लेकर कोई सोचने विचारने की बाट नहीं, उसके विकल्प खुले हैं।
पर छोटे न हों हम बुद्धि से हों ईश मय से विश्व मय, हों राम मय और कृष्ण मय जगदीश मय जगदेव मय प्रार्थना सुनी तो लगा कि छोटे कद जा होना उतना हानिकारक नहीं जितना बुद्धि से सोच से छोटा होना। जो छोटा सोचते हैं वे कभी बड़े बन ही नहीं पाते, वे क्षुद्र बुद्धि के मालिक होते हैं। पहले तो सोचते विचारते ही नहीं हैं और जो कहीं सोचना पड़ भी जाए तो केबल स्व केंद्रित सोचते हैं एमआ बांटे रेवड़ी फिर फिर अपने को देय। उनका घेरा बहुत आत्म केंद्रित और छोटा होता है। उससे इतर उनकी दृष्टि ही नहीं जाती। और जो कभी किसी के लिए कुछ करने की नौबत आ पढ़े, कि किसी मजबूरी में करना ही पड जाय तो किए हुए को इतनी इतनी बार गायेंगे सुनाएंगे कोट करेंगे कि लेने वाले को अपराध बोध होने लगे कि किस मुहूर्त में मैं सहायता लेने चला गया। सुनते तो यह भी हैं कि यदि के लिए कुछ करना ही पड जाए, किसी भी भाव से करो तो करके उसे भूल जाओ। उसका हिसाब किताब ऊपर वाला कर लेगा। तुम एक कैसा दोगे वह दस लाख देगा, गरीबों की सुनो वो तुम्हारी सुनेगा। बनो ऐसे कि एक हाथ से दो तो दूसरे को पता भी न चले और देते समय नीचे नेत्र कर लो। मत देखो कि किसे दिया है, बस जो जरूरत मंद था, इसकी थोड़ी सी सहायता की है।दो तो उसे मैगनीफाई मत करो, दे के भूल जाओ क्योंकि आदमी की भला क्या बिसात कि वह किसी को कुछ दे सके। असली सच तो यह है कि देनहार कोई और है भेजत है दिन रैन, लोग भरम हमरो करें ताते नीचे नैन।
सो छोटा नाटा कद उतनी नहीं बिगाड़ता जितनी छोटी बुद्धि और छोटे सोच से हानि होती है। क्यों सोचो छोटा भला, सोचने में क्या जाता है, बड़ा सोचोगे तो एक दिन कुछ बडा कर भी जाओगे। आखिर जो बड़े सपने देखते हैं वे एक न एक दिन बड़े बनते भी हैं। बस करना होता है। कोरे सपने देखना तो शेख चिल्ली का काम है। तोजैसे पेड़ खजूर न बने, बड़ा सोचें, बड़ा करें छोटे न हों हम बुद्धि से।
No comments:
Post a Comment