Tuesday, August 30, 2022

दर्शक दीर्घा

 सफर जारी है....1041

31.08.2022

दर्शक दीर्घा........

आप जब मंच पर माइक के सामने होते हैं तब आपकी निगाहें दर्शक और श्रोता के चेहरे पर बराबर बनीं रहती है। और नहीं बनीं रहतीं तो बनी रहनी चाहिए। आखिर आप उनके लिए ही तो बोल रहे होते हैं। वे ही तो आपका लक्ष्य होते हैं। इसलिए किसी भी कार्यक्रम को संबोधित करने से पहले यह जानकारी लेना बहुत जरुरी होता है कि आखिर दर्शक दीर्घा में बैठने और  सुनने वाले कौन होंगे, किस स्तर के होंगे। वे बुद्धिजीवी हैं, सहृदय श्रोता हैं, विषय में रूचि रखते हैं या सभागार भरने को भीड इकठ्ठी की गई है।तदनुसार ही आप अपनी बात को रखते हैं। बात जिनको संबोधित की जा रही है, उन्हें अच्छे से समझ में आ जाए इसलिए आप अपनी आवाज को स्पष्ट रखते हैं, उच्चारण शुद्ध रखते हैं, वाणी प्रखर होती है। आप बोलते हैं, दहाड़ते या मिमियाते नहीं। पिच कई बार बढाते घटाते हैं, कुछ शब्दों को रेखांकित करते  श्रोताओं का ध्यान आकर्षित करते हुए दोहराते हैं, भावाभिव्यक्ति के लिए हाथ भी चलाते फिराते हैं, जो कह रहे हों उसे प्रभावी बनाने के लिए चेहरे पर भी भाव लाने की भरसक कोशिश करते है। आप ये सब करते हैं कि बात सही तरह से समझाई जा सके, श्रोता उसे ग्रहण कर सकें।

और जो आपकी बात आपका कथन सामने वाले के दिल में गहरा उतर जाता है, तो उसकी स्वीकारोक्ति नकार उसके चेहरे पर आ जाते हैं। दोनों हाथ अनायास ताली बजाने को उठ जाते हैं और जब तक आप बोलते हैं तालियों की गड़गड़ाहट आपके उत्साह को बनाएं रखती है। आप मंचस्थ और दर्शक दीर्घा में बैठे चेहरों पर आते जाते भाव से अपना मूल्यांकन कर सकते है कि आप उन्हें बांधे रखने में कितने सफल हुए हैं। निश्चित ही दर्शक दीर्घा में बजती तालियां आपके उत्साह को हवा देती है।  पर यहीं सबसे अधिक सावधानी अपेक्षित  है। इन तालियों के भेद को समझा जाना जरुरी है। जहां करतल ध्वनि आपके बोलने से सहमति होती है, वहीं विषय समझ न आने पर ये हूटिंग का रुप भी ले लेती है तो तालियों के प्रभाव में मत खो जाइए, उसकी गूंज से इस अंतर को समझते रहिए। जहां विषय की गहरी समझ जरुरी है वहीं उसे आप रख कैस रहे हैं, इस पर भी ध्यान जरुरी है। अच्छे से अच्छा वक्तव्य अच्छी प्रस्तुति के अभाव में अप्रभावी हो जाता है। आप विषय को किस रुप में रख रहे हैं ...सूचना दे रहे हैं, समझा रहे हैं, उद्धरणों से पुष्ट कर रहे हैं, व्याख्यायित कर रहे हैं, अपनी टिप्पणी जोड़ रहे हैं, किसी के कथन को कोट कर रहे हैं या उस विषय की परते खोल श्रोताओं के लिए सरल और सुगम बना रहे हैं। कई कई बार व्याख्यान विषय पर नहीं, मैं पर आधारित हो जाता है। मैंने ये किया मैंने वो किया सी आगे बढ़ता ही नहीं है। सूचनात्मक रुप में कोई जानकारी देते हुए आगे बढ़ जाना एक बात है और स्वयं को केंद्र में रख बातें करना दूसरी।

आपके बोलने से पूर्व आपका परिचय दे ही दिया जाता है कि अब अमुक अमुक बोलेंगे। इसके बाद तो आपके शब्द, आपकी बातें, आपकी भाषा शैली, विषय की रोचक प्रस्तुति ही दर्शक दीर्घा को बांधे रखती हैं। पिन ड्रॉप साइलेंस का अर्थ ही होता है कि अगला आपको सुन रहा है, सुन ही नहीं रहा , बड़े ध्यान से सुन रहा है। कितनी कितनी जोड़ी आंखें आपके चेहरे को गौर से देखती हैं, आप पर चस्पा हो जाती हैं, कान आपको सुनने के लिए प्रतीक्षारत होते हैं तभी आपकी गुरु गंभीर वाणी, खनकती आवाज गूंजने लगती है। आपकी आवाज में वह दम होना चाहिए कि जब तक आप बोलें , कान आपकी तरफ ही लगे रहें, आंखें भले ही बंद हो साधारणीकरण करवा रही हो। ये सब तब घटित होता है जब आप पूरी तैयारी के साथ पोडियम पर होते हैं, माइक संभालते हैं और श्रोता को बांध लेते हैं। ये भी ध्यान रखना जरुरी है कि सामने बैठे श्रोता सुनने ही आए हैं। तो आपको भी सुनाने में दक्ष होना जरुरी है।

          साथियो, अपनी बात रखने का जब जब अवसर मिले, उसे पकड़ो। कहने की पूरी तैयारी रखो। विषय की अच्छी तैयारी रखो। इस गुमान में मत रहो कि हमें सब आता है, इसके लिए क्या पढ़ना पढ़ाना, सब ठीक है, क्या है दो चार भारी भरकम बात कह देंगे, इधर उधर की सूचना चैंप देंगे, बस हो गया काम। हमारा तो नाम ही इतने रौब दाब वाला है कि सब लोहा मानते हैं। इस गलत फहमी में मत रहिएगा जनाब। लोग आपको सुनने आते हैं न कि आपके नाम और पद को। तो जब जब लोगो से संवाद का अवसर मिले उसे व्यर्थ मत जानें दीजिए। अपने पास  रूपरेखा तैयार रखिए, कहने वाली बातों को रेखांकित कर लीजिए। संबोधन में अधिक समय व्यर्थ मत कीजिए, वातावरण को खुशनुमा बनाए। रखिए। अपने श्रोताओं को उस कालखंड में ले जाइए जिसकी बात आप रख रहे हैं। आपके शब्द यह कमाल कर सकते हैं आपके चेहरे पर आते जाते भाव ये प्रभाव पैदा कर सकते हैं, आपकी आवाज की पिच, उसका सुरीलापन, उसकी दहाड़, उसकी करुणा संवेदना सब मिल मिलाकर संयुक्त प्रभाव छोड़ती है और जब आप अंतिम सोपान पर आते हैं तो लगता है आप एक नए लोक में श्रोताओं को घुमाकर एक्जिट पर छोड़ रहे हों। आप वाणी को विराम देते हैं तब श्रोता उस काल खंड से जैसे बाहर निकलता है और तालियां बजने लगती हैं, श्रोता आपको और सुनना चाहते हैं।

          तो अपनी वाणी में ये प्रभाव पैदा कीजिए, सुर को तराशिये, विषय की पूरी तैयारी रखिए और पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने श्रोताओं के मध्य उपस्थित होइए, मंच पर चढ़िए, माइक संभालिए और अपने को अभिव्यक्त करना प्रारंभ कर दीजिए। सारी शुभकामनाएं और शुभेच्छाएं आपके साथ हैं।

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