सफर जारी है......1048
01.09.2022
नगर ढिंढोरा पीटती.......
शुद्ध ,सात्विक, एकनिष्ठ प्रेम का प्रतीक हरतालिका तीज का पर्व अभी अभी बीता है, सुहागिनों ने अपने जीवनसाथी की लंबी आयु की प्रार्थना की है,अर्द्धनारीश्वर जैसे प्रेम की आकांक्षी हैं वे, सदा समाधि में रहने वाले महादेव की प्रतीक्षा में रत है पार्वती और जब शिव में मोह जागता है तो सती के शव को कंधे पर डाल तांडव करते हैं, जहां जहां देह के अंश गिरते हैं, वह स्थान तीर्थ हो जाता है। कन्याएं भक्ति भाव से शिव जैसे वर प्राप्ति के लिए व्रत उपवास करती हैं और विवाहिता अपने दांपत्य के साफल्य और सौभाग्य के लिए शिव पार्वती की पूजा उपासना करती हैं। गौरी पुत्र गणेश घर घर विराजे जाते हैं, गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ के तुमूलभेदी शोर से वातावरण गूंजने लगता है और फिर ऋषि पंचमी पैर पसार लेती है। भादों बीते कवार में पितरों को याद करते हैं और फिर शारदीय नवरात्र, दशहरा दीवाली, और देव उठने का समय आ जाता है यानि हम उत्सव जीवी वर्ष भर किसी न किसी ब्याज से प्रेम,उत्साह और जिजीविषा को बनाए बढ़ाए रखने हेतु पर्व त्योहार मनाने में मस्त और व्यस्त बने रहते हैं। जीवन है तो धूप छांव की माफिक सुख दुख आते जाते रहते हैं पर ढेर दुख पर भी ये आस्था भारी पड़ती है। प्रभु का नाम लो सब ठीक हो जाएगा का भाव बड़ी आश्वस्ति देता है, जिलाए रखता है, आपसे कोई प्रेम करे या आप किसी के प्रेम में पागल बने रहे, नतीजन प्रेम तो बना ही रहता है। सृष्टि ही प्रेम पर टिकी है। सिखाया समझाया भी यही जाता है कि मिलजुल कर रहो, प्रेम भाव से रहो, आपस में सौहार्द बना रहे, लड़ो झगड़ो मत, एक दूसरे के साथ को महसूस करो, उसे जीओ, तुम्हें बहुत मिला है। उनको देखो जिनके पास मार दौलत भले हो पर प्रेम लुटाने को पात्र नहीं तो अपने अपने प्रेमास्पद में लिप्त रहो। प्रेम ही तो जीना सिखाता है, वह अंधकार भरे रास्ते में रोशनी किरण है।
जब प्रेम इतना पावन है कि मानव को जीने की ताकत देता है तो वह कौन सा प्रेम है जिसे न करने के लिए, प्रेम में न पड़ने के लिए नगर भर में मुनादी पिटवा दी गईं कि ... जो मैं ऐसा जानती प्रेम किए दुख होय , नगर ढिंढोरा पीटती प्रेम न करियो कोय। प्रेम किए बिना कैसे रहा जा सकता है भला और फिर प्रेम किया कहां जाता है, वह तो हो जाता है। प्रेम किया नहीं जाता हो जाता है, दिल दिया नहीं जाता चोरी हो जाता है। जिससे एक बार लगन लग जाए तो जीवन भर के लिए उसी के हो के रह जाते हैं। मीरा को ही देख लो ऐसी लागी लगन मीरा हो गईं मगन, वो तो गली गली हरी गुन गाने लगी, महलों में पली, बन के जोगन चली मीरा रानी दीवानी कहाने लगी। विष राणा ने दिया प्याला मीरा ने पिया वो तो गली गली हरी गुन गाने लगी। ऐसी लगन लगी कि सब भूल भाल गई बस मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई, जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई और पग घुंघरू बांध मीरा नाची रे, इतनी प्रेम दीवानी हुई कि गोविंद को ही मोल खरीद लिया माई री मैंने लीनो गोविंदो मोल, कोई कहे सस्तो कोई कहे मंहगो, लियो री तराजू तौल, माई री मैंने लीनो गोविंदो मोल। जो प्रेम किया तो किया, पूरी दुनिया विरोध में, सास ससुर पति विरोध में पर लगन लगी तो लगी और मीरा प्रभु में जोत बन कर समा गईं।
आखिर कौन सा प्रेम है जिसके लिए लिखा गया प्रेम किए दुख होय। प्रेम करते तो दुनिया बदल जाती है सब जगह हरा ही हरा दिखता है, हर पल सुहाना होता है, एक एक पल को कैद कर के रखा जाता है फिर भले ही दुनिया कहती रहे अरे प्यार का खुमार नशा उतरने दो, पेट की आग प्रेम की आग से बड़ी होती है, चार दिन की चांदनी के बाद फिर अंधेरी रात आती है। प्यार का नशा जब उतरता है और व्यक्ति ठोस कठोर खुरदरे धरातल पर आता है तो खाली यार से भूख नहीं बुझती, जीवन कोरे प्यार से नहीं चला करता, उसके लिए व्यावहारिक होना पड़ता है, दो दूनी चार का गणित लगाना पड़ता है, केलकुलेशन बिठाने पड़ते हैं, प्यार व्यार को बेवकूफी कह घता बतानी पड़ती है। फिर प्रेमासपद की चिन्ता नहीं, उससे मिलने वाले लाभ हानि की बात अधिक प्रभावी हो जाती है। मेरा तेरा शुरू हो जाता है, प्रेम के स्नेहिल वृक्ष में कैक्टस उग आते हैं, मार उठा पटक शुरू हो जाती है, रूठा मटकी होती है, अपने अपने पक्ष में आग्रही हुआ जाता है और लागी लगन टूट जाती है बिलकुल दो टूक हो जाती है, तू अपने घर मैं अपने घर का फैसला हो जाता है और जिस जमीन पर प्यार की फसल लहलहानी थीं, वह सूख कर बंजर हो जाती है। लो और कर लो प्रेम, यही नियति होती है प्रेम कि इसीलिए ढिंढोरा पीटा गया होगा प्रेम किए दुख होय तो प्रेम न करियो कोय।
पर साहब, ढिंढोरा पीटने से कुछ नहीं होता, प्रेम तो दुख कष्ट सह कर भी होता है बशर्ते किसी एक में प्रेम जिंदा रहे। सच तो यह है कि प्रेम के लिए कोई शर्ते निर्धारित नहीं की जाती कि ऐसा होगा तो प्रेम है और वैसा होगा तो प्रेम नहीं करेंगे। ये प्रेम नहीं ,अनुबंध है, एक साझा समझौता पत्र है। पर प्रेम तो आज की दुनिया में भी सांसे ले रहा है। दो में से एक को भी सच्चा प्रेम हो जाए तो दीवानापन खत्म कहां होता है, भले ही प्यार की जड़ में खूब मट्ठा डालते रहो, वह पनपता भी है और वट वृक्ष भी बनता है। कल नासिक के एक साहित्य प्रेमी दंपत्ति मिलने आए , मेरा प्रश्न बार बार उनकी रोजी रोटी को लेकर होता कि जीवन चलाने के लिए कुछ ठोस जमीन चाहिए होती है तो बताओं परिवार चलाने, बालक अजिश की शिक्षा दीक्षा के लिए कुछ तो सोचा होगा, उन दंपत्ति ने जो कहा ,कहीं दिल को गहरे छू गया ...दीदी जिंदगी चलाने के लिए भौतिक वस्तुएं उतनी प्रभावी नहीं होती जितना आपसी सौहार्द भाव होता है, हम दोनो के दिल मिले हुए हैं, और हम सोचते हैं जीवन की छोटी छोटी खुशियों को झोली में समेट लें, जहां जाना होता है बालक को भी साथ ले जाते हैं, इसे भी तो साहित्य के संस्कार देने है, बस दीदी जैसे भी हो, हमारा हो जाता है, मैं लिखती हूं, ये मनोवैज्ञानिक काउंसलर है , जो मिल जाता है उसी में जीवन चल जाता है। पचास के पेटे में पहुंचे उस दंपति से बातें करते लगा कि प्रेम ही तो आगे बढ़ने की शक्ति देता है, कम में गुजारा करना सिखाता है, जब दो प्रेम भाव में साथ हों तो सब निभ जाता है, पैसे की कमी नहीं अखरती। बस ये साथ साथ का भाव बना रहे तो प्रेम जिंदा भी रहता है, खूब हरियाता, लहलहाता और पनपता भी है फिर संसार में ढिंढोरा नहीं पीटना पड़ता कि प्रेम किए दुख होय और प्रेम न करियो कोय।
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