Wednesday, August 31, 2022

मेरी मईया

 सफर जारी है....1043

02.09.2022

 मेरी मईया......

 लो जी सितम्बर आ गया और याद आने लगे  हिंदी दिवस, शिक्षक दिवस, श्राद्ध पक्ष ,और फिर शारदीय नवरात्र। पिछले चौदह पन्द्रह सालों से इनमें मां को याद करने का दिन और जुड गया है। पहले मां आंखों के सामने थी जीती जागती, अब तो बस यादों में शेष है। सुख में हो दूर बैठी निहारती होगी पर जरा परेशानी आई नहीं तो ढाढस बंधाने, सांत्वना देने ,सिर पर अपना वात्सल्य भरा हाथ रखने चली आती है। मेरी ही नहीं, दुनिया भर की मांऐं ऐसी ही होती हैं अपनी संतानों को नेक कष्ट में नहीं देख पाती। बच्चे मर्जी चाहे जितने बड़े हो जाएं, दादी नानी का पद ही क्यों न पा जाएं, मां के लिए तो दुलारे बच्चे ही बने रहते हैं। बच्चों को अपनी मां की शिकायत करनी हो तो वे दादी नानी की ही धौंस देते है।जब तक मां होती है, कभी लगता ही नहीं कि मां के बिना भी  जीवन हो सकता है। जब तक ब्याहे नहीं जातें तो  घर  पूरा पूरा हम बेटियों का ही होता है । पर  हाथ पीले होते ही अपने उस घर के सन्दर्भ बदल जाते हैं, नाम बदल जाता है, उसे पीहर, मायके , नैहर कहा जाने लगता है। जहां जन्मे, पले, बड़े हुए, खेले कूदे, पढ़े लिखे, जीवन जीने के जरूरी  सूत्र सीखे, वही घर अचानक से पराया हो गया और एक बिलकुल नए अजनबी माहौल को हमारा नया घर कहा जाने लगा। हम बेटियां अचानक से पराई हो गईं। कहा सुना तो जाता था कि बेटियां पराई अमानत होती हैं, उन्हें दूसरे घर जाना होता है, ये घर तो प्रशिक्षण शाला है, सीखो और दूसरी जगह जाकर बरतना, मत बनाओ खाना पर आंखों में जरूर भर लो कि सब किया कैसे जाता है। केबल आंखों में ही मत भरो, करके भी देख लो जिससे तुम्हारी आदत में आ जाए और हमें भरोसा हो जाए कि तुम सब कर लोगी, सब निभा ले जाओगी। सुनते तो थे कि बेटियों को ये घर छोड़कर एक दिन अपने घर जाना ही होता है, इनकी आगे की जिंदगी की डोर उस नए घर से बंधी होती है पर मन में बड़ा भरोसा था कि जैसे रोने मचलने रूठने मटकने पर पिताजी मां को कह देते..... क्यों रुला रही हो गुड़िया लाडो को, जो मांग रही है दे क्यों नहीं देती। हमारे मजे हो जाते कि हमारे मन की सी हो गई। पर हमें कहां पता था कि ये इतना लाड प्यार  इसलिए था कि वे जानते थे कल को ये बच्चियां अपने अपने घर चली जाएंगी तो आना जाना भी दूसरे की मर्जी से होगा। विदा होते खूब हिचकी ले ले के रोए पर मां पिताजी रोकने के बजाय उल्टा हमें ही पाठ पढ़ाने लगे कि लाली ,खूब अच्छी तरह रहना, वह घर भी तुम्हारा है, वहां भी माता पिता भाई बहिन हैं, बस उन रिश्तो के नाम बदल जायेंगे, वहां जेठ देवर ननद होंगे। पुत्री दो कुलो को पवित्र करती है टाइप और भी बहुत कुछ समझाया गया। जीवन भर कोशिश तो पूरी की कि मातृ और श्वसुर कुल कलंकित न हो। गलती से भी कुछ ऐसा हो जाता तो उनकी आत्मा को कितना कष्ट होता।

          जब जब आना होता मां, सोचते खूब बतराएंगे, कितनी कितनी बातें इकठ्ठी हो जाती तुम्हें बताने के लिए, पर तुम हमारे बिना कहे ही सब समझ जाती। तुम्हारे आगे मन खोलने की जरूरत ही नहीं पड़ी, तुम तो अंतर्यामी थीं। चेहरा देखकर तो छोड़ो, आवाज के सुर से ही सब समझ जाती कि उनकी लाडो कैसी है। धीरे धीरे समझ आ गया कि लड़कियों के दो घर हुआ करते हैं एक वह जिसमें जन्म लेते हैं, पलते हैं, बड़े होते हैं, शिक्षित दीक्षित होते हैं और जब फसल तैयार हो जाती है तो अधिकार क्षेत्र बदल जाते हैं। ये ही दुनिया की रीत है, इसमें नया क्या है। जब बेटियां ब्याही जाएंगी तभी घर में वधुएं आएंगी न। मां का सारा लाड प्यार तो उनके जानें के बाद ही याद आता है। जब तक मां  है तब तक उसे हम बच्चे टेकिन फार ग्रांटेड लेते हैं। वह कुछ भी करें हमें लगता है ये तो करना ही था , मां जो हो। मां यानि दुनिया की सबसे शक्तिशाली औरत जो अपने बच्चे की जीवन रक्षा के लिए किसी भी चौखट को पूज सकती है तो उस पर कुदृष्टि रखने वाले के लिए रणचंडी बन उसका संहार भी कर सकती है। बच्चे के लिए तो मां अनमोल और सबसे जरुरी होती है। कितने नादान और कभी कभी इतने स्वार्थी हो जाते हैं हम बच्चे कि जब मां को हमारी सबसे अधिक जरूरत होती है हम अपनी गृहस्थी में उलझे होते हैं, हमारे पास बीमार मां को देखने जानें उसकी सेवा सुश्रुषा करने के लिए समय का टोटा होता है, जरा सा करना पड़ जाए तो कितना भुनकते तुनकते हैं, झींकते है। मां तो वैसे ही बहुत संकोच में होती है सौ जरूरतों को मार लेती है बहुत ज़रूरी होने पर धीमे और कमजोर स्वर में बहुत ज़रूरी कुछ कहती भी है तो उसे हम कान पर होकर टाल देते हैं। पता नहीं वाकई व्यस्त होते हैं या अपनी परिस्थितियों पर परदा डालने हेतु मार व्यस्तता ओढ़े रहते हैं। मां, तुम मां हो, सब गलतियों को नज़र अंदाज़ कर देती हो, उन पर धूल डाल देती हो पर जब अपना ही अंतर धिक्कारता है कि मां के लिए इतना भी नहीं कर सके और जो किया, उसका भी अहसान सा थोपते रहे तो सिर शर्म से झुक जाता है।

          मां तो सब जानती है अपने बालक की रग रग पहचानती है,उसने ही तो गढ़ा है अपनी संतति को। वह कभी नाराज होती ही नहीं, बस अपने बालक को सुधारने, रास्ते पर लाने को नाराजगी का चोगा जरूर ओढ़ लेती है और बच्चे के द्वारा गुदगुदी करने पर हाल मान भी जाती है। मन में रेशा नहीं पाले रखती। मां, आप तो हमेशा यादों में हो, आपको अलग से याद नहीं करना पड़ता। आपकी आवाज, आपके निर्देश कि बेटा ऐसे कर लेना दिमाग में गूंजते रहते हैं। आप ही ने सिखाया था माता पिता गुरु का ऋण चुकाने का सबसे अच्छा उपाय अच्छे माता पिता बनना है, अपने बालक की भली भांति परवरिश करना है, उसे न केबल शिक्षित करना है बल्कि संस्कारों से दीक्षित भी करना है कि वह आप पर गर्व कर सके। कोशिश तो की है मां, पर शायद आप जितना सफल नहीं हो सके। गुरु ऋण उतारने के सन्दर्भ में आपका निर्देष था जो सीखा उसे सब में बांट दो, विद्या बांटने से बढ़ती है व्यय कृते वर्धते एव नित्यम विद्या धनम सर्व धनं प्रधानम। हां, थोडा थोडा रोज बांट ही तो रहे हैं। बस मां , तुम हम बच्चो को दिशा निर्देशित किए रखना, आयु में भले ही छह सात दशक पार कर लिए हों पर अकल के तो कच्चे ही बने रहे, समझदार और व्यवहार कुशल बनना नहीं आया, अभी भी कोई बिना गलती के बिना बात के ऊंचे स्वर में चिल्ला दे तो झट आंखें बरस जाती हैं कि हमारा क्या कसूर था, बिना बात ही लतियाए धकियाए गए। अब नहीं सुधर पाए तो नहीं सुधर पाए, कांच का सा मन है सो हाल किरच जाता है। हम भी क्या राम कहानी ले के बैठ गए मां तेरे आगे। बस ख्यालों में आती रहना, ढाढस बंधाती रहना, सब कर लेंगे, सब निबट जाएगा, बस तुम्हारा आशीर्वाद बना रहे। सो जा मां, बहुत देर हुई, तुम याद आती हो, तो पिटारा खोल के बैठ जाती हूं।

 सादर नमन और भाव पूर्ण स्मरण मां।

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