सफऱ जारी है....970
21.06.2022
पिता दिवस के ब्याज से .........
ये सारे दिवस पिछले कुछ सालों की उपज है. हमारे समय में तो पिताजी एक गरिमा पूर्ण व्यक्तित्व हुआ करते थे जिनके आगे बोलने की हिम्मत ही नहीं होती थी. बस वे हैं, हम सबका ख्याल रखते हैं, ज्यादातर बातें तो माँ के माध्यम ही उन तक पहुंचती थी औऱ बातें भी क्या होती थी
कभी स्कूल की फीस, कॉपी किताब या पिताजी के साथ रिश्तेदारी में जाने की जिद. इससे अधिक कोई मांग जेहन में आती ही नहीं थी. छोटी छोटी खुशियों में ही जिंदगी जी लेते थे. आज लोगों की बड़ी बड़ी कथा कविता पढ़ते हैं तो लगता है काश हम भी ऐसे रचनाकार होते. जो मन में था पिता सब समझ जाते, कभी जिद करने रूठने मटकने फूं फा करने की नौबत ही नहीं आई. यदि मांग जायज है तो कहने की नौबत ही नहीं आती थी औऱ गलत है तो कितना भी फ़ैल जाओ, पूरी नहीं होती थी. नहीं का मतलब नहीं ही था. औऱ वैसे सच बताएं तो ऐसा कोइ अभाव कभी लगा ही नहीं जिसके लिए जिद की जाए. पढ़ाई लिखाई का सब सामान बिना कहे ही मिल जाता, स्कूल की ड्रेस बनबा दी जाती, रोज के औऱ धराउ के कपड़े होते ही थे. रोज मौसम की फल फलारी, मूंगफली, भुने अनाज आते ही थे. अब औऱ क्या चाहिए था जिसके लिए जिद करते. नंबर से सबको रिश्तेदारी में भी ले जाते. मेला तमाशा खूब दिखाने ले जाते. घर क्या था, स्वर्ग था. ज़ब दफ्तर से लौटते तो काफी दूर से ही सीटी की आवाज से हम बच्चे दौड़ पड़ते कि पिताजी आ रहे हैं.
ज़ब अपने घर के हो गये तो हमेशा यही कहते रहे जाओ बेटा अपने घर खुश रहो. बस एक बार उन्होंने बहुत मन से कहा बेटा दो चार दिन रुक के जाना, पता नहीं क्या हुआ मुझे तुरंत मना कर दिया औऱ इस बात का मलाल मन में ही रह गया.पिता होते ही होंगे गौरवशाली,अपनी संतान की छोटी से छोटी जरूरत का ध्यान रखने वाले, खुद कष्ट सहकर बच्चों के लिए सब सुविधा जुटाने वाले. सच कहती हूँ एक व्यक्ति की तनख्वाह में छह बच्चों का पालन पोषण जिसमें किसी बच्चे को कभी अभाव लगा ही नहीं, कैसे सम्भव हुआ आज ये खुद अनसुलझी पहेली है.
पिता होना यानी दायित्व शील होना, लड़कियों के लिए घर वर तलाशना, उन्हें संस्कारित करना, दूसरे के घर जाके निभाव कर सके, ऐसी शिक्षा देना. चिंताए तो बहुत होगी उन्हें पर चेहरे पर म्लानता नहीं दिखी, बड़ी बड़ी चिंताओं को हँस कर उड़ा देते थे. सारी रिश्तेदारी के निभाव को पहले नंबर पर रखा जाता. हम बच्चे कभी कभी चिड़चिड़ करते तो प्यार से समझा दिया जाता बेटा ये सब अपने ही हैं, ऐसा नहीं कहते, जो है मिल बाँट कर खालो, इतना ही है औऱ इसी में काम चलाना है, बस उनका इतना कहना ही हमारे लिए ब्रह्म वाक्य हो जाता. अब पिताजी ने कह दी तो कह दी.
आज ज़ब बच्चों को पिता से जुबान दराजी करते देखती हूँ, तायने उलाहने मारते देखती हूँ, आलोचना करते देखती हूँ तब लगता है क्या पिता से ऐसा भी कहा जा सकता है. वे तो पिता है हमारे जन्मदाता हैं उनसे तो हमारा जीवन है, वे हमें पालते पोसते हैं, दुनिया की मुसीबतों से लोहा लेना सिखाते हैं. फिर उनके प्रति ही बच्चों के मन में वैर कैसे पल जाता है, वे उन्हें आलोचित कैसे कर लेते हैं, उनमें भाषाई उदंडता कहाँ से घुस आती है, वे उनके लिए असभ्य औऱ गंदे विशेषनों का प्रयोग कैसे कर पाते हैं. पुत्र पुत्री तो पिता के आत्मज आत्मजा हुआ करते हैं न, फिर वे उनसे कैसे कंस का सा क्रूर व्यवहार कर पाते हैं, ये गलत आदतें उनमें कहाँ से प्रत्यारोपित हो जाती हैं. वे पिता को पिता का सा मान क्यों नहीं दे पाते. मान तो मन से होता है किसी के कहने भर से उपजा नहीं करता औऱ किसी के मना करने से समाप्त नहीं हो जाता. तो बच्चे बच्चे होते हैं औऱ पिता पिता.उनमें एक फासला होता है जैसे गुरु शिष्य में एक हाथ की दूरी होती है. वास्तव में ये दूरी नहीं, ये बड़ों के प्रति मान है. बस ये मान बना रहे, भाषा के संस्कार बचे रहें, हम पिता को तो क्या दें पाएंगे पर अपनी संतान के प्रति अपने दायित्वों का निर्वाह कर पाएं यही बड़ी बात होगी , यही पिता का सच्चा मान होगा
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