सफर जारी है....969
20.06.2025
अंधरा के गैया, राम रखवैया .....
कहावतें किसी भी भाषा/बोली में हों, अपना पुरजोर असर दिखाती हैं।बात को सशक्त ढंग से प्रस्तुत कर देती हैं फिर भी कोई भैस का भैया उसे न समझ पाए तो ये उसकी नासमझी का सूचक है।मांस भक्षण से ही जाति ही
भृष्ट होती हो तो मक्खी ही क्यों ,फिर तो खूब डट कर चिकन बिरियानी खाओ।।प्याज के छिलके पर भला क्या मुसलमान बनना।ये कहावते कोई आजकल में नहीं रची गई, न जाने कब से चली आ रही है।तो मुहावरे ,कहावतें और लोकोक्ति प्रयोग में जो जितना अधिक समृद्ध होगा, उसकी भाषा की तीक्ष्णता, मारक शक्ति उतनी ही प्रबल और धारदार होगी।कैसे सीखे जाते हैं इतने इतने प्रयोग।कक्षा में पढ़ते पढ़ाते मुहावरे भले वाक्य में प्रयोग कर लें, पर लोकोक्ति और कहावतों के प्रयोग करने में तो छठी का दूध याद आ जाता था।
कहावतें क्या थी, पूरे वाक्य थे, उसे समझाने के लिए एक वाक्य पहले और एक बाद में जोड़ना होता था।जितने कक्षा में विद्यार्थी उतने ही वाक्य बनाने को कहा जाता पर सब एक दूसरे की चोरी करते थे । किताब में लिखे , अध्यापिका द्वारा बोले और बनाये गए वाक्य ही हमारे खजाने होते।घर पर मां खूब सहायता करती नये नये वाक्य बनाना सिखाने में।जिस दिन नये मुहावरे, लोकोक्ति कहावतें सुनते,सारा दिन उसके प्रयोग में लगे रहते।सच बताएं तो जो स्कूल में सिखाया जाता, घर पर उसे इतनी इतनी बार दोहराते कि बस सब याद हो जाता।बात उन दिनों की है जब कक्षा में और दोस्तों में सबसे आगे रहने का नया नया शौक चर्राया था।अपनी प्रशंसा सुनकर फूले नहीं समाते थे।और जो कहीं कुछ गलती हो गई,डांट वांट पड़ गई तो मुंह सुजा कर बैठ गए कि आंखों से गंगा जमुना बहनी शुरू हो जाती।मां बार बार समझाती हर बार सफलता मिले ही मिले, यह जरूरी नहीं होता।बस अपनी मेहनत किये जाओ, हार भी स्वीकारो और जीत भी।हार से सीख लो कि अगली बार इससे भी अच्छा करेंगे।
तो जीवन में चूहा भाग बिल्ली आई का खेल चलता रहा, अब भी चल रहा है।घुड़दौड़ के खेल में शामिल होना आता नहीं।आता क्या नहीं, कभी अपने को इतना योग्य समझ ही नहीं पाए कि बड़े लोगों संग दौड़ सकें।बस जो सहज मिल जाता है, वह सिरमाथे।सिखाया भी यही गया सहज मिले सो दूध सम मांग मिले सो पान, कह कबीर वह रक्त सम जामे खींचा तान।मिल जाए तो ठीक न मिले तो गम नहीं।जिसके संसारी सहयोगी नहीं होते ,उसके राम जी होते हैं।जिसका कोई नहीं, वह राम भरोसे हैं।यही विश्वास बहुत से दुखों से मुक्ति दिला देता है।जो भजे हरि को सदा, वह परम पद पावेगा।अंधरा के गैया, राम रखवैया।तो अंधा और कुछ करे न करे पर राम को तो भज ही सकता हैIतुम उसे भजते रहो,वह तुम्हारे दुख सुखों की परवाह करेगा।पर विश्वास रखना जरूरी है।और मजे की बात तो यह है कि जो सहज और सरल है ,उसे ईश्वर पर बड़ा भरोसा है।अपना सा जितना मर्जी कर ले, पर बाद में राम पर ही सब छोड़ देता है जैसी राम जी की मर्जी।भगवान चाहेंगे तो सब ठीक होगा।ये भाव जैसे जैसे प्रबल होता जाता है, मन में शांति आती जाती है।जो होगा ठीक होगा।वैसे भी आप रो झींक कर क्या कर लेते हैं, बस मन तन से कमजोर ही होते जाते हैं।तो बने रहिये इन मुहावरों कहावतों और लोकोक्तियों के साथ, क्या पता कब कौन सी कहावत डूबते का सहारा बन जाये।जब मित्र ने मुझे कहा अंधरा के गैया राम रखबैया, तो मन में कौंधा काहे परेशान होती हो, ईश्वर तेरे साथ है, जब आंधरे की गैया का रखबैया वह काली कमली वाला है तो तेरा क्यों नहीं होगा।तो भजते रहो रटते रहो,नैया तो पार राम जी ही लगाएंगे।
No comments:
Post a Comment