सफर जारी है.....968
19.06.2022
सारे जग से न्यारी अम्मा......
उन महिलाओं को सौभाग्यशाली कहा जाता हैं जिनके ऊपर माता पिता और सास ससुर दोनों की छत्रछाया होती है।जनश्रुति है कि ऐसी महिला जो पीहर और ससुराल दोनों की छत्रछाया से भरी पूरी हो, के बालों में बांधा गया रिबन/ फीता बांध लेने से बायठा ठीक हो जाता है।जब तक मां पिता सास ससुर दोनों जीवित थे, अडोसी पड़ोसी कितनी कितनी बार अपने हाथ दर्द को उस रिबन को बांध दूर करते रहे हैं।इसी प्रकार चिक चली जाने पर विशन पाँय पैदा हुआ व्यक्ति यदि लात मार दे और लात खाने वाला पीछे मुड़कर न देखे तो चिक ठीक हो जाती है।इन घटनाओं के वैज्ञानिक सन्दर्भ से तो परिचय नहीं है पर इतना निश्चित है जिनके दोनों घर भरे पूरे होते हैं, जिन्हें दोनों घर का लाड़ प्यार मिलता है, वे निश्चित ही भाग्यशाली होते हैं।तो जब तक दो दो माता पिता का सान्निध्य मिलता रहा, चिंता फिक्र जैसे शब्दों से साबका नहीं पड़ा.बस नौकरी और बाहर बास के काम में व्यस्त रह आये क्योंकि उस घर में मां और इस घर में सास सब संभाल लेती थी।वे थीं तो मेरे खाने पीने की चिंता भी उनके जिम्मे थी।देर सवेर आने पर डांट में उनकी चिंता झलकती थी।पहले पिता, फिर ससुर ,फिर मां और फिर सासु मां सभी उस पथ के पथिक बन गए जहां से कोई वापस नहीं लौटा करता।श्मशान तक विदा करने सब आते हैं पर उसके बाद जाने वाले किस दुनिया के बाशिंदे बन जाते हैं, यह अभी तक रहस्य ही है।
कल सासु मां की पुण्य तिथि थी, अचेतन में तो बार बार कौंध रहा था कि इतना अनमनापन क्यों है पर कार्यालयी व्यस्तता दिन भर हावी रही और बिस्तर पर लेटते ही जैसे तीन वर्ष पहले की उनके विछोह की घटनाएं मस्तिष्क को झकझोरती रही।उनकी बीमारी, कोरोना काल और घर में बंद अडोस पड़ोस नाते रिश्तेदार।वृद्ध होते शरीर कमजोर होता जाता है और रोग शरीर में घर बनाने लगते हैं या कहें कि शरीर को छोड़ने का कोई बहाना भी तो चाहिए।तो बड़ों की छत्रछाया की अंतिम कड़ी अम्मा जी भी तीन वर्ष पूर्व संसार को छोड़ बैकुण्ठ धाम जा बसी हैं।वहीं से अपने घर परिवार को देख सिहा लेती होंगी क्योंकि बच्चों में तो उनकी जान बसती थी।सच तो यही है कि वे परिवार का आधार स्तम्भ थी,रीढ़ थीं घर परिवार की।उनके जाते ही सब बिखर गया सा लगता है।और सब तो समेट बांध भी लो पर मन सहेजना थोड़ा मुश्किल होता है।ऊपर से तो सब सहज सामान्य से दिखते हैं पर यादों के पिटारे पर किसी का बस तो नहीं हुआ करता न, वे तो बिना चित्र के भी मन में अंकित रहती हैं।बस तिथि उन यादों का संकेतक बन जाती हैं ।अम्मा जी, आपको शत शत नमन।आप जहां भी हैं, बस परिवार पर अपना आशीष बनाये रखें।आप थीं तो कभी सोचा ही नहीं कि एक दिन आपसे बिछुड़ना भी होगा।बस अब तो तस्वीर की शोभा बन गई हो।पर रहती हम सबके दिलों में ही हैं आप।
मां कहीं नहीं जाती, वह अपने बच्चों के आसपास ही बनी रहती है गर्म दुशाला सी, वक्त जरूरत सबको अपने आँचल में समेट लेती है।सो हम बालक उस गर्माहट को आज भी अनुभव करते हैं।आपकी तीसरी पुण्यतिथि पर शत शत नमन।ईश्वर हम परिवारी जनों को शक्ति दे कि हम आपके बताये मार्ग पर चल सके, परिवार में जोड़क की भूमिका निभा सके।हम सबकी थी प्यारी अम्मा, सारे जग से न्यारी अम्मा ।
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