सफर जारी है....966
17.06.2022
मास्टरनी/बहनजी ....
सफर जारी है में संख्या 66 जब किसी अंक के साथ जुड़ती है तो नए खण्ड की शुरुआत होती है।तो मन खूब खुश है कि इस यात्रा के दस महत्वपूर्ण पडाव पूरे हुए और आषाढ़स्य प्रथम दिवस से एकादश सोपान प्रारम्भ हो रहा है।पर दूसरे क्षण एक विचार उपजता है ये गिनती क्यों, ये गिनना किसलिए ,अरे जब तक अंगुलियां कीबोर्ड पर दौड़ रही हैं, और दिमाग में विचार आये जा रहे हैं,पेज काले करते चलो।जब पांच फुटी काया मुठ्ठी भर राख में सिमट जाएगी तब सब समाप्त होना ही है।पर मन को खुश होने को आंकड़े चाहिए न।मन की भली चलाई वो तो हरिनाम भी माला के मनके गिन गिन कर जपता है।ज्यादा सयाना जो है।अब करे भी क्या मास्टर बुद्धि है और वह भी भाषा का ,उसमें भी हिंदी का।मास्टर तो वैसे ही दलिदरी होता है, बस उसके हिस्से विद्यार्थियों की मुंह भर नमस्ते ही आती है और भोले भंडारी को देखो इसमें ही कैसा फूला फूला डोलता है मानो कुबेर का खजाना मिल गया हो।उसकी शिष्य सम्पदा सबसे बड़ा कोष है।तो उसी की जुबानी सुनो हिंदी मास्टरनी की कहानी।
तो क्या हुआ जो मैं मास्टरनी /बहिनजी हूँ।अरे लोग शराबी, जुआरी ,पापी, चोर, डाकू ,भगोड़े, आलसी और जन क्या क्या होने में नहीं शरमाते । तो मैं क्यों शर्माऊ,अरे भाई ,मास्टरनी है तो क्या हुआ।अब छोटो को पढाओ प्राथमिक में पढाओ ,माध्यमिक में पढाओ या यूनिवर्सिटी में पढ़ा आओ, क्या फर्क पड़ता है, पढाना तो पढाना है।तो तुमको क्या लगता है पढाना काम नहीं है,पचपन साठ विद्यार्थियों को संभालना हंसी ठठ्ठा है क्या, तुम पे तो अपने जाये दो ही नहीं संभलते, उन्हें बिस्तर छोड़ते ही स्कूल पठा देते हो।खुद तो अपने बालक को किटकिन्ना भी नहीं सीखा पाते और मास्टरनी में रोज सौ दोष खोजते हो।और फिर तुम्हें तो परकटी अंग्रेजी मैम ही ज्यादा पसंद है जिनकी गिटर पिटर भले ही पल्ले पड़े न पड़े पर ये भरम तो बना रहता है कि हमाई औलाद भी ऐसी अंग्रेजी मैम जैसी गिटर पिटर करना सीख जाएगी।
हम तो हिंदी वाली मास्टरनी है,बहनजी नुमा है,विलायती मैम नहीं हैं । हिंदी पढ़ाती हैं हिंदी।हिंदी के नाम सुनते ही चेहरा क्यों उतर गया, क्या ये भाषा नहीं है।जितने मर्जी विषय हों,पढ़े तो सब भाषा के माध्यम से ही जाते हैं।बिना भाषा के भला कैसी पढाई। विषयों को पढ़ने के लिए आधार रूप जो भाषा है, उसे तो मैं ही सिखाती हूँ न।जो कहीं मैं ही उनकी नींव पक्की नहीं करूं तो फिर कैसे पटर पटर बोलोगे।भाषा सीखे बिना आगे बढ़ा ही नहीं जा सकता।जिसकी जो भाषा है ,उसे वही अच्छी लगती है।मेरी भाषा हिंदी, मेरा गौरव हिंदी।उसे बोलकर तो मेरा सिर उन्नत होता है।यूं ही नहीं सीखी जाती कोई भाषा, उसे बोलना, सुनना, पढ़ना, लिखना सीखना होता है।उस की संस्कृति समझनी होती है।उसके शब्दों को याद करना होता है, उसके अर्थ समझने होते हैं ,उन्हें प्रयोग करना होता है, उनसे नई नई कविता कहानी रचनी होती हैं,उसके सम्प्रेषण में दक्ष होना होता है, उसका खूब खूब प्रयोग करना होता है तब जाकर कहीं शब्दों से दोस्ती होती है,शब्द अपने से लगते हैं, फिर तो वे तुम्हारे हाथ के लट्टू हो जाते हैं, मर्जी चाहे जैसे घुमा दो।
तो मैं हिंदी पढ़ाती हूँ हिंदी, पूरे होशोहवाश में और सौ प्रतिशत गौरव बोध के साथ, पर्वतों जंगलों नदियों सबसे कहती हूँ ....सुनो सुनो सुनो, मैं हूँ हिंदी की मास्टरनी, मैं सबको जोड़ती चलती हूँ।कश्मीर से कन्याकुमारी तक मैं घूम घूम आती हूँ, अपने को समृद्ध कर आती हूँ।हर प्रांत मुझे पसंद करता है, मेरे स्वागत में पलक पाबड़े बिछाए रहता है।मैं कबीर, सूर,तुलसी, रहीम, रसखान, मीरा के पदों में बिगुल सी बजती हूँ, कान्हा की बांसुरी हूँ।मैं हिंदी हूँ, मुझमें रम के तो देखो, कैसा आनन्द आएगा।बस मधुर मधुर लोरी सुनते कब सपनों की दुनिया में पहुंच जाओगे, पता भी नहीं चलेगा।
तो आओ मेरे पास, चलो मेरी कक्षा में, वहां तुम्हें सब मिलेंगे...... तेलगू ,तमिल ,कन्नड़, मलयालम, कोंकणी, मराठी, असमी,पंजाबी, गुजराती, सिंधी, ये सब मेरी बहने हैं, मुझसे बहनापा रखती है क्योंकि मैं मास्टरनी जो हूँ हिंदी की।हां, मुझे बहुत अच्छा लगता है जब कोई कहता है देखो, देखो, वो आ गई हिंदी की मास्टरनी। सीधे पल्ले की साड़ी पहने माथे पे बड़ी सी बिंदी लगाए हाथों में छमाछम चूड़ियां और पैरों में झनाझन बजती पायल के साथ हिंदी मास्टरनी/बहनजी का खिताब मुझे उल्लास से भर देता है।हाँ हूँ मैं मास्टरनी हिंदी की और जिंदगी भर वही बनी रहना चाहती हूँ।
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