सफर जारी है....1005
25.07.2022
मेल मुलाकातें.......
जीवन स्वयं में एक यात्रा है। जीवन पर्यंत हम मानुष न जाने कितने कितने व्यक्तियों से मिलते जुलते हैं, कितने कितने स्थानों को देखते हैं, कुछ स्मृति में ऐसे कैद होते जाते हैं कि भुलाए नहीं भूलते, बार बार स्मृति पटल पर छा जाते हैं, हम बार बार किसी न किसी ब्याज से उन्हें याद करते रहते हैं और कुछ ऐसे गायब हो जाते हैं कि गधे के सिर से सींग। कुछ महत्वपूर्ण क्षणों को हम एल्बम में कैद कर संजो लेते हैं और उन पन्नों को जब मर्जी उलट पलट कर देख लेते हैं, उनमें धूप हवा लगाते हैं और फिर स्मृति मंजूषा को बंद कर देते हैं। जैसे जैसे समय बीतता जाता है, यादें धुंधली पड़ती जाती है। ये हम सबके साथ कमोवेश घटित होता ही है।
ज्यादा ही सौभाग्यशाली हुए तो हर पड़ाव में इतने इतने स्नेही स्वजन मिल जाते हैं कि उनका स्नेह झोली में नहीं समा पाता, झोली छोटी पड़ जाती है तब दो चूंटी चावल और नेक से दूध की याद आती है जिसे बाल गणेश दादी अम्मा के पास लेकर पहुंचते है खीर बनवाने को और खीर उबल उबल कर इतनी अधिक हो जाती है कि बड़ी बड़ी नादों में भी नहीं समा पाती, सदावृत बांटने के बाद भी इतनी बच जाती है कि उसे मिट्टी में गाड़ना पड़ जाता है और वह सब हीरे मोती में बदल जाती है। जीवन के हर छोटे बड़े पड़ाव पर मुझे भी भले लोग बहुत मिले हैं। एकदम फिट और टिपटाप, व्यवहार में दक्ष, खूब कुशलता से अपनी बात रखने वाले, पहली भेंट में ही दिल में उतर जाने वाले, कौली भर गले मिलने वाले, बिछुड़ते पनीली आंखों के साथ विदा लेने वाले और फिर मिलने का वायदा करने वाले। बेलगांव और मैसूर के एक डेढ़ दिनी ठहराव ने भी खूब संपन्न कर दिया। उजास से भरे सेंट फिलोमिना विद्यालय के कार्य तत्पर विद्यार्थी, वहां का दक्ष स्टाफ, अतिथियों को हाथो हाथ लेने का भाव, सुदूर स्थानों से पधारे हिंदी साधकों का हिंदी प्रेम, समृद्ध मंच, प्रतिबद्ध हिंदी प्रेमियों के छोटे छोटे दलों से आत्मीय मुलाकात, उनकी भाषाई दक्षता सभी कुछ साये की तरह मेरे साथ चला आया है।
बेलगुंदी में कांग्रेस कुआं, आनंदेश्वर मंदिर, काका कालेलकर की बहुत बहुत पुरानामकान जिसमें वे बालपन में पांच छह वर्ष रहे, वहां की नगर पंचायत प्रधान हेमा जी और बुजुर्गवारों का स्नेहाशीष, यादव जी का स्नेहिल आतिथ्य , एयरपोर्ट अधिकारी की कार्य तत्परता के साथ साथ अदभुत चित्रकारी, जंगल में मंगल रचा देने की काबिलियत कभी भी भुलाई नहीं जा सकती। मैसूर में कितने कितने नए परिचय जुड़ गए और स्नेहिल संबंधों की पुस्तक और मोटी हो गई। जब स्वस्थ और सकारात्मक भाव से दिल से मिला जाता है तो दृष्टि भी बदल जाती है। फिर सामने वाले में केवल और केवल नुस्ख ही नहीं निकाले जाते, उनकी आलोचना ही नहीं की जाती बल्कि उनके व्यक्तित्व के प्रभावी पक्षों को सराहा जाता है और जो समझ में नहीं भरता उसके प्रति उदासीनता बरत ली जाती है। किसी का सुघड़ मंच संचालन भा गया तो किसी की साफगोई, किसी की बात कहते कहते भावुकता का चरम भिगो गया तो किसी की भाषा प्रेम और भाषाई दक्षता ने मन जीत लिया।
स्थान कहां पीछे रहे भला, मैसूर पैलेस का भव्य सौन्दर्य, चामुंडी मंदिर तक जा मां के दर्शन का सौभाग्य न मिल पाना शायद अभी तपस्या पूरी न हुई हो या दुबारा आना निश्चित हो। वृंदावन गार्डन के संगीतमय फव्वारे जैसे गीत के बोलों पर थिरक थिरक कर नृत्य कर रहे थे, भीड उमड़ी पड़ रही थी , इतना विशाल जन सागर, सब के सब उत्साह से लबरेज थे एकदम मेले जैसा दृश्य, वही भरे भरे बाजार, बच्चो को कंधे पर बिठाए माता पिता, गुब्बारे लेने को मचलते जिद करते बालवृंद और युवाओं की उत्साहित टोली। सारे के सारे दृश्य आंखें समेट रही हैं, सब साथ जो ले जाने का मन हो आता है। बस, अब कुछ ही घंटों में जेसे उड़ जहाज को पंछी फिर जहाज पर आबे, अपने जहाज पर लौट आना है। तो बस सब को दिल में बसाए चले चलते हैं।
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