Wednesday, August 17, 2022

बनो तो कर्मवीर बनो

 सफर जारी है......1006

26.07.2022

बनो तो कर्मवीर बनो......

अपने अपने पाल्यों को अभिभावक चिकित्सक,अभियंता, चित्रकार, आईं ए एस, पी सी एस अधिकारी, शिक्षक, आर्किटेक्ट और जीवन के जितने भी अनुशासन हो सकते हैं, उनके प्रमुख बनाने , उन प्रकल्पो का हिस्सा बनने का स्वप्न संजोते हैं, उन स्वप्नो को पूरा करने में धन संपत्ति और अपनी सारी ऊर्जा लगा देते हैं पर वे उनमें इतना गौरव बोध नहीं भर पाते कि कोई भी कार्य छोटा बड़ा नहीं होता। मर्जी जिस क्षेत्र में चले जाओ, अपना सौ प्रतिशत दो, काम के प्रति प्रतिबद्धता रखो, सत्य के रास्ते चलो, व्यवहार प्रतिमानों का उल्लंघन मत करों, शिष्टता के दायरे में रहो यानी कर्मवीर बने रहो तो तुम दुनिया फतह कर सकते हो।

              कभी धन प्रभावी हो जाता है तो कभी सिफारिश का बल, योग्यता हो न हो पर सिफारिश और वह भी किसी उच्च ओहदे प्राप्त व्यक्ति की हो तो शत प्रतिशत काम कर जाती है। ये सिफारिश भी व्यक्ति की ज़िंदगी में बड़ा रोल निभाती है। आपके और आपके कार्य के विषय में पूरा आंकलन कर बिना किसी दवाब के स्पष्ट शब्दों में नियमानुसार संस्तुति करना एक बात है और केवल अधिकारों का प्रयोग कर जबरदस्ती किसी को निर्देशित करना दूसरी। हम किस समाज में रहते हैं दुर्भाग्य से दूसरे प्रकार की सिफारिश अधिक प्रभावी है।

              अरे अपने अपने पाल्यों को प्रारंभ से ही कर्मवीर बनाने में क्यों नहीं जुट जाते। कितने विस्तार से कर्मवीर लंबी कविता में समझाया गया है कि कर्मवीर कौन होते हैं। देखकर बाधा विविध बहु विघ्न घबराते नहीं, रह भरोसे भाग्य के दुख भोग पछताते नहीं, काम जितना भी कठिन हो लेकिन उकताते नहीं, भीर में चंचल बने जो धीर दिखलाते नहीं, हो गए एक बार में उनके बुरे दिन भी भले, हर जगह हर काल में वे ही मिले फूले फले। पर्वतों को काटकर रास्ते बना देते हैं वे, सैकड़ों मरुभूमियों में नदिया बहा देते है भी, है काम कौन सा ऐसा जो उनसे नहीं होता भला। केवल पहले अनुच्छेद की पंक्तियां ही आचरण का विषय बन जाए तो सफलता स्वयं ही चरण चूमने चली आती है। पर सफलता के ये रास्ता बहुत कम लोगो के चयन का विषय बनता है। लोगों का शॉर्टकट में विश्वास अधिक है।

              मन से दुर्बल हैं इसलिए जरा सी भी विपत्ति आते हायतौबा मचाने लगते हैं, हाइपर हो जाते हैं, मार घबराते हैं कि अब कया होगा, कैसे होगा, मेरे पास तो न धन का बल है न सिफारिश का, मैं तो ज़िंदगी में कभी आगे बढ़ ही नहीं सकता। पर वे यह भूल जाते हैं कि इन सबसे बड़ कर आत्म बल और धैर्य का बल होता है, निरंतर कार्यशीलता होती है। विघ्न बाधाएं तो जीवन का हिस्सा हैं, जीवन की राह समतल होती कब है, उसमें तो ढेर खतरनाक मोड़, रपटन, कांटे, पथरीला पन होता ही है, पर उनके डर से हाथ पैर छोड़ कर बैठा नहीं रहा जा सकता, उन सब को पार करते अपनी मंजिल, अपने लक्ष्य को साधना होता है। भाग्य के भरोसे छोड़ हाथ पर हाथ धरे बैठे नहीं रहना होता, दुख भोग पछताना नहीं होता बल्कि अपनी निरंतर कार्यशीलता से उन बाधाओं पर विजय पानी होती है। काम की कठिनता को देख कर जी नहीं चुराना होता, बार बार ये नहीं कहना होता कि हमसे तो होगा नहीं, हो ही नहीं सकता। जितनी बार आप इन निराशा पैदा करने वाले वाक्यों को दोहराते हैं आपका मनोबल कम होता जाता है और आप अंतत उस ककार्य में असफल हो जाते हैं। दरअसल आप प्रारंभ से ही ये मानस बना चुके होते हैं कि मुझसे नहीं होगा। आपकी शक्ति लगातर क्षीण होती जाती है। तो हमेशा सकारात्मक बने रहिए। काम की कठिनता से उकताएं नहीं, आप के स्थान पर उसे जो भी करेगा, वह भी आप जैसे दो हाथ पैर का स्वामी होगा, वह चतुर्भुज या चतुरानन या दशानन नहीं होगा। तो जब कोई अन्य कर सकता है तो आप क्यों नहीं। संकल्प की शक्ति बहुत बडी होती है, पांच फुटी मानव इतने बड़े बड़े जलयान और जलपोत को उड़ा और खींच ले जाता है। मुसीबत कठिनाई आने पर मन की चंचलता बढ़ जाती है, धैर्य जबाब दे जाता है। पर इन सब से कार्य सिद्धि नहीं मिला करती।

                 और जो दुर्दिन बुरे समय का रोना रोते बैठे रहते हैं मार खीझते और झींकते रहते हैं उन्हें याद दिलाना जरूरी है कि कर्मवीर इन सबको बाधा के रुप में लेता ही नहीं, ये सब तो प्रेरक हैं। फिर से रेखांकित करते हैं हो गए इक आन में उनके बुरे दिन भी भले, हर जगह हर काल में वे ही मिले फूले फले। तो करना ज़रुरी है, ईमानदारी ज़रुरी है और निरंतरता ज़रुरी है। और जो संकल्प ले लिया तो पर्वतों को काटकर मार्ग बनाना या मरुभूमि में नदियां बहा देना सरल हो जाता है। ऐसी प्रेरणास्पद कविताएं केवल कक्षा में पढ़ने पढ़ाने, अर्थ, व्याख्या, प्रश्न उत्तर और शब्दार्थ लिखने के लिए ही नहीं हुआ करती, ये तो जीवन बदल कर रख हैं। बस उन्हें दिन भर गुनगुनाने और आचरण में लाये जाने के प्रयत्न जरूरी हैं। जब आप दिन भर ऐसे अंशों को गाते दुहराते हैं तो आपका मानस भी वैसा तैयार होता है। तो कर्मयोगी बनने के प्रयास में लगे जरुर रहिए। देर सबेर सफलता मिलेगी अवश्य।

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