Wednesday, August 17, 2022

हामिद के बहाने

 सफर जारी है.....1012

01.08.2022

हामिद के बहाने....

महान रचनाकार मुंशी प्रेमचंद की आज जयंती है, उन्हें  शत शत नमन । वे एक समर्थ रचनाकार के रुप में सदैव सदैव याद किए जायेंगे । कालजई साहित्य रचकर वे अमर हो गए हैं। आम जन की समस्याओं को बड़ी गहराई से चित्रित करते वे जनता के प्रतिनिधि बन गए हैं। एक सफल साहित्यकार आसपास के परिवेश से विषय चुनता है, पात्र भी वहीं से लेता है, वहीं की घटनाओं को शब्दों में पिरोता है और उसे एक पुस्तक के रुप में सबके सामने ले आता है। दरअसल वह केबल लिखता नहीं है, उन स्थितियों को जीता है। उदासीन होकर किनारे नहीं बैठा रहता, समुद्र में छलांग लगा देता है और मोती चुन कर ले आता है, मन की थाह ले लेता है, और उन्हें करीने से सबको परोस देता है ।हम जैसे तो डूबने के डर से किनारे ही बैठे रहते हैं। अपने निजी लोगों के मन ही नहीं समझ पाते, औरों की तो बात तो दूर की है।

             चूल्हे से तवा उतारते रोटी सेंकते  दादी नानी के हाथ तो आज भी जल जाते हैं पर कितने नाती पोते धेवते हामिद बन अपने हिस्से के तीन पैसे से मेले के विभिन्न आकर्षणों से अपने को दूर रख, बाल सुलभ चंचलता को बिसार, अपने साथियों के मध्य अपने को हीरो सिद्ध करते बूढ़ी दादी के लिए चिमटा खरीद पाते हैं। क्या आधुनिकता के इस दौर में हामिद का चरित्र अब बदल गया है। उसकी संवेदन शीलता चूक गई है जो वह दादी नानी की पीढ़ी तो छोड़ो, अपने ही जन्मदाताओं और सहोदरों के साथ भी समाज सम्मत व्यवहार नहीं कर पाता। अब हामिद जैसे चरित्र गढ़े नहीं जाते, इनका प्रतिशत जो बहुत कम हो गया है। सब बदल गया है, स्व प्रधान हो गया, निजी स्वार्थ हावी हो गया, अब कौन किसके लिए सोचे भला, अपने से ही समय नहीं बचता।

             बड़े भाई साहब आज भी मौजूद हैं, दो बैलों की कथा के हीरा मोती की संवेदन शीलता आज भी दिख जाती है। सवा सेर गेहूं का शंकर, कफन का माधव और बड़े घर की बेटी सब ज्यों के त्यों हैं। बड़े घर की परिभाषा बदल गई, अब धन संपत्ति और आधुनिक संसाधनों से लैस मगर संवेदनाओं से रिक्त घर बड़े घर कहे जाते हैं और तथाकथित बड़े घर की बेटियां अब घर बनाती नहीं, बिगाड़ती हैं। किस किस का जिक्र करूं,उनकी कहानियां पढ़ते एक नई दुनियां में पहुंच जाती हूं, सारे पात्र जाने पहचाने लगते हैं, ऐसा लगता है मानो कल ही तो मिले थे उनसे। प्रेमचंद मनोभावों के चितेरे हैं। घटनाओं को इतनी बारीकी से उकेरते हैं कि सब हस्तालमक हो जाता है, पाठक उस काल में पहुंच जाता है, घटनाओं को जीता है, पात्रों से दोस्ती कर लेता है, और जब रचना के आखिरी पन्ने पर पहुंचता है,रचना समाप्त होती है तो वह जैसे स्वप्न से जागता है। उपन्यास सम्राट उन्हें ऐसे ही नहीं कहा जाता। गोदान के होरी,गोबर,धनिया,झुनिया, मातादीन,सिलिया कहीं चले थोड़े ही गए हैं, वे आज भी जैसे के तैसे अपनी जगह स्थिर हैं। बदलते परिवेश में वेशभूषा भले ही बदल गई हो पर अंतस वैसा का वैसा है, आचरण और कार्य पद्धति में रंचमात्र भी परिवर्तन नहीं आया। निर्मला तो हर दसवें परिवार में नजर आ जायेगी। पढ़ी लिखी निर्मला जानती तो सब है पर कभी बाबुल के घर की इज्जत ढापने और कभी ससुरालियों का मान बनाए रखने के चक्कर में अपना सर्वस्व होम कर देती है पर फिर भी उसके हिस्से क्रेडिट नहीं आता, बदनामी और सौतेली मां होने का ठप्पा जरुर लग जाता है। इन निर्मलाओं का को भवितव्य तब निर्धारित था, वही आज भी है। कुछ नहीं बदला। कर्मभूमि और रंगभूमि की पृष्ठभूमि में भी कौन से बड़े बदलाब हो गए।

             आज जयंती के ब्याज से उन्हें स्मरण करते नमन करते हैं। उनकी रचनाएं हर पाठक के मन में गहरे रची बसी हैं। रचनाओं के पन्नो से निकल निकल पात्र जब मर्जी बाहर आ जाते हैं, पाठक से घुल मिल जाते हैं, उनके साथ साथ घर तक चले आते हैं, उठते बैठते, सोते जागते साथ चिपके रहते हैं। उनसे पीछा छुड़ाना सहज नहीं। तो प्रेमचन्द की रचनाएं तो मन में गहरे धंसी हुई है, उनकी कितनी कितनी कहानियां कंठस्थ है, बस उचित परिवेश देखती हैं और झट से जबान पर आ जाती हैं। प्रेमचन्द हर आम व्यक्ति के पसंदीदा रचनाकर हैं, वे निर्विवाद व्यक्तित्व हैं, समर्थ रचनाकार हैं, मन के भावों के सफल चितेरे हैं। उन्हें शत शत नमन।

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