सफर जारी है ....1011
31.08.2022
आ, अब कोंकण चलें.....
कोंकण प्रदेश गोवा, भाषा मराठी और कोंकणी दोनों का प्रभाव, गोवा नाम सुनते ही सच सच बताना क्या इमेज बनी दिमाग में, यही न, अठखेलियां करता दहाड़े मारता समुद्र और उसकी शोभा मीरामार, कोलबा, और कलंगुट बीच, पणजी में मनोरंजन से भरपूर क्रूज की सवारी, चर्च, बेयर फुट, स्वर कोकिला लता मंगेशकर की याद दिलाता मंगेश मंदिर, उत्तरी और दक्षिणी गोवा का प्राकृतिक सौन्दर्य, नारियल और काजू का प्रदेश, यही न। आप ने बिलकुल ठीक सोचा, हर दसवें पर्यटक की गोवा के विषय में कमोवेश यही राय होती है।
लेकिन किसी भी स्थान को देखने की पर्यटन से इतर दृष्टि भी हुआ करती है।सन 88 और 89 में दो बार गोवा में वास्को और पणजी आना हुआ। संस्थान के शैक्षिक सदस्यों का किसी भी हिंदीतर प्रदेश में जाने का मुख्य संदर्भ हिंदी अध्यापकों का नवीकरण और पुनश्चर्या कार्यक्रम ही होता है। इस बार का प्रयोजन आजादी अमृत महोत्सव के तहत केंद्रीय हिंदी संस्थान और दो संस्थाओं के संयुक्त तत्वाधान में गोवा मुक्ति संघर्ष में साहित्यकारों का योगदान विषयक दो दिवसीय संगोष्ठी थी। संगोष्ठी की पूर्व संध्या में गोवा के हिंदी साधकों के साथ चर्चा में विद्वानों को जानने का अवसर मिला। हिंदी की बढ़ोत्तरी के लिए इन स्नेहिल बंधुओं की ललक और हिंदी के लिए कुछ कर जाने की चमक ने हमारी टीम को आनंद से भर दिया। अगला पड़ाव प्रसिद्ध कोंकणी साहित्यकार ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता आदर योग्य श्री दामोदर मौजो जी से मुलाकात का था। मध्यस्थ बने प्राचार्य भूषण भावे जी, एक सौम्य और ज्ञान के आगार व्यक्तित्व से मिलना बहुत ही सुखद रहा। एक बार फिर पुष्टि हुई कि विद्या ददाति विनयम। सहज सरल व्यक्तित्व के धनी दंपत्ति से मिलते लगा कि भरी हुई डाल ही झुकती है। उनकी आयु ने भले ही सत्तर से अधिक वसंत देखे हों पर सोच से वे युवा ही नजर आए। कितनी सरलता सहजता से जीवन की महान उपलब्धियों को बहुत संकोच के साथ ऐसे गिना दिया जैसे गिनती पहाड़े सुना रहे हों। विशिष्ट बात यह है कि ये पुरस्कार उन्हें निबंधों के लिए मिला। कोंकणी के लोकसाहित्य को सहेजने की चिंता उन्हें बराबर है, लगातर इसका उल्लेख उनकी टिप्पणियों में उभरा। ऐसे संत स्वभाव के धनी व्यक्तित्व से मिलना इस प्रवास की महती उपलब्धि अंकित की जा सकती है।
गोवा मुक्ति संघर्ष को उकेरती, झरोखे से लोहिया जी, मधु लिमए, सुधा ताई जोशी ,गोवा मूल के साहित्यकारों और इस आंदोलन में अपनी आहुति देने वाले, संघर्ष करने वाले हुतात्माओं के विषय में जानना हो तो हीरक जयंती के उपलक्ष्य में ग्वालियर से पुनर्प्रकाशित तीन रचनाओं... वरिष्ठ मराठी साहित्यकार इंदुमती केलकर की लाहौर किला से गोवा की अगवाद जेल तक... डाक्टर राम मनोहर लोहिया के संघर्ष का एक अध्याय, प्रसिद्ध हिन्दी पत्रकार गणेश मंत्री की गोवा मुक्ति संघर्ष,संस्कृत व मराठी की प्राध्यापिका चम्पा लिमए और वरिष्ठ पत्रकार कुर्बान अली द्वारा संपादित गोवा लिबरेशन मूवमेंट एंड मधु लिमए को अवश्य पढ़ा जाना चाहिए। गोवा मुक्ति के मंत्रदाता डाक्टर राम मनोहर लोहिया के साहस और देशभक्ति के प्रति श्रद्धापूर्ण नमन। मराठी साहित्यकार बोरकर जी की दो पंक्तियां दृष्टव्य हैं..धन्य है लोहिया, धन्य है ये भूमि, धन्य हैं इसके पुत्र, धन्य हैं जनता के वे नेत्र जिन्होंने यह त्याग देखा।
मूल प्रश्न भाषा का है। लोकसाहित्य और संस्कृति का संरक्षण भाषा से ही संभव है। केंद्रीय हिंदी संस्थान के प्रतिनिधि और गोवा विश्व विद्यालय हिन्दी विभाग की अध्यक्षा, चौगुले महाविद्यालय की प्रभारी प्राचार्य, आयोजक और संचालन सूत्र संभाल रहे नेतृत्व का एक सुर से यही मंतव्य था कि विदेशी भाषा के पुछल्ले से छुटकारा पा हमें भारतीय भाषाओं के विकास पर बल देना चाहिए। बड़ी बड़ी बातें तो बहुत कर ली गईं, अब उन्हें व्यावहारिकता का जामा पहनाने की जरूरत है। अभिभावकों के निमित्त भी अपने सोच में बदलाब लाने का समय आ पहुंचा है, अपने पाल्यों को अपनी अपनी भाषाओं में शिक्षित करें, शिक्षा केबल रोजगार का ही माध्यम नहीं, वह मनुष्य को मनुष्य बनने में महत्वपूर्ण रोल निभाती है। सभी को मल्टीनेशनल में जाकर कमाई नहीं करनी, सभी को देश छोड़ छोड़ कर विदेशों में नहीं बसना है। प्रतिभा पलायन बहुत हो चुका, अब अपने देश, अपनी भाषा, अपनी संस्कृति पर ध्यान दो।
यात्राएं बहुत समृद्ध करती हैं बशर्ते उनके पीछे प्रयोजन सुनिश्चित हों। ये छोटी छोटी एक दो दिवसीय यात्राएं अनुभव से भर देती हैं।
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