सफर जारी है....1019
09.08.2022
डबल जीरो....
अब नहीं आता संबंधों का जोड़तोड़ गुणा भाग तो क्या करें। गणित में शुरू से ही कच्चे रहे , गणित ही तेज होता तो उसमें विज्ञान का छौंक लगाकर आज मास्टरनी की जगह डाक्टरनी बने नहीं बैठे होते। खूब पच्चीस तक पहाड़े और एक हजार तक गिनती याद की पर दो और दो पांच, न तीन में न तेरह में, एक और एक मिलकर ग्यारह होते हैं, तीन पांच करने और चौके छक्के की कला नहीं सीख पाए। जोड़ जोड़ के कितना भी भंडार में डाला पर हमेशा माइनस में ही रहे। न संबंधों के गुणनफल समझ आए और न रिश्तों के विभाजन। खूब ईमानदारी से पूरा सवाल हल करते पर अंत तक आते आते कुछ न गड़बड़ हो जाती और हमारा उत्तर किताब के उत्तर से मैच नहीं करता। टीचर जी अलग समझाती जब सब ब्लैक बोर्ड से टीप लेते हैं तो तुम अलग से अपनी अक्ल क्यों लगाती हो। अरे उत्तर का मिलान करो, प्रक्रिया में मत उलझो। बस उत्तर सही आ जाना चाहिए। नम्बर तो उसी में मिलते हैं। जीवन में सफलता जरुरी है, सब सफलता ही देखते हैं, बस एक बार पास हो जाओ तो कोई नहीं देखता कि कैसे पास हुए, नकल से या अक्ल से। यहां पूरी जिंदगी सही गलत के चक्कर में ही पड़े रहे। न बीजगणित के क की घात समझ आई, न वर्गमूल और न रेखागणित की तिर्यक रेखाएं और कोणों के विभाजन। अब किताबी गणित समझ आ जाता तो जीवन के गणित के कठिन सवाल हल करने की योग्यता आ जाती। अब तो सब करते धरते भी बुद्धू के बुद्धू कहे जाते हैं। थोड़ी सी सयानपताई मां घुट्टी में पिला देती तो आज हमारी गिनती भी सफल आदमियों में होती। पर अब क्या करें लोगों के दोनों हाथों में लडडू हैं और यहां लडडू तो दूर की बात, चाटने को गुड़ की डली भी मयस्सर नहीं। सब अपना ही किया धरा है और बनो सीधे सट, ऐसे ही काटे और निचोड़े जाओगे। और बनो भोले भंडारी, मत दौड़ाओ अपनी अक्ल के घोड़े, सबको पेट में भरो, कुछ मत छिपाओ सब उगल दो, और बन लो सच धारी। तब लगता था कि इमानदारी में बहुत ताकत है, सारे झूठ का पर्दाफाश होता है और अंत में निखालिस सच ही जीतता है। नहीं भाई नहीं, सोलह आने सच के दाम लद गए। अब तो जो कहो, उसे भी थोड़ा घुमा फिरा के कहो तब सच माना जाता है।
बड़ा अभिमान था कि हम तो सबके हैं, रिजल्ट सामने आया तो पता चला जो सबका है वह दरअसल किसी का भी नही होता। जैक आफ आल भले हो पर मास्टर ऑफ नन होता है। उसे कोई भी अपना नहीं मानता, सबको लगता है कि यह उसका इसका सबका है तो जरूर घालमेल है। कोई उतना बड़ा हो ही नहीं सकता कि सब पर समान वर्षा कर सके, ये तो आकाश और धरती के बस का ही है। तभी तो कहा जाता है इतने ऊंचे उठो जितना उठा गगन है,धरती कहती धैर्य न छोड़ो कितना भी हो सिर पर भार, नभ कहता है फैलो इतना ढक लो तुम सारा संसार। ये धरती आकाश, पर्वत, सागर सब सिखाते हैं पर हम जड़ बुद्धियों की समझ में कुछ आए तब न।
चलो अब गणित में कच्चे रह गए तो थोड़ी बहुत राजनीति ही सीख लेते। सीधी सीधी कहने के बजाय थोड़ा घुमा फिरा के कहने की ही क्लास नहीं तो कोचिंग ही ले लेते पर नहीं साब, हमें तो उस ओर रुख ही नहीं करना था। पॉलिटिक्स को तो गंदा तालाब समझते कि गलती से भी उस ओर निगाह चली गईं तो धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। तो बने रहो हरिश्चंद्र , जैसे उनका देश निकाला हुआ, विपत्ति पे विपत्ति आई, रोहिताश्व को सांप ने डस लिया, शैव्या के पास कफन खरीदने तक को पैसे नहीं थे, शमशान का कर कहां से चुकाती। राजा नल पर विपत्ति आई तो खूंटी हार निगल गई और मछली तालाब में चली गईं। जो सत्याग्रह करने निकले उन्हें जेल में ठूंस दिया गया। धर्मज्ञ युधिष्ठिर को कौन से सुख मिले। जो सच का रास्ता पकड़ेगा, सफलता उससे सौ कदम दूर ही चलती है और जिकजेक मार्ग पकड़ने वाले जल्दी मंजिल पा लेते हैं।
काहे का रोना धोना,गणित और राजनीति की एबीसीडी न जानने वालों का ये ही हश्र होता है, वे चारों खाने चित्त गिरते हैं, किए कराए पर उनकी बेवकूफी और सिधाई पोता फेर देती है। उनके भाग में यश का अल्पांश भी नहीं होता। पिछले कर्म इतने प्रभावी होते हैं कि अब के सारे सुकर्म एक तरह और सिधाई वर्सेस बेवकूफी के परिणाम दूसरे पलड़े में। तो मत सीखो गणित के फार्मूले, राजनीति का क ख ग, लिपटे रहो अपने दो पैसे के मारकीन के लिबास में, चुनौतियां ऐसे ही मुंह चिढ़ाती रहेंगी। रास्ते दोनों है, चुनना तुम्हें है कि कठिनाइयों से भरा सच का रास्ता चुनते हो या मक्खन मलाई सा कोमल झूठे आंकड़ों का गणित और जलेबी सी गोल गोल और उलझी राजनीति। बाकी शून्य बटा शून्य तो घोषित कर ही दिए गए हो।
No comments:
Post a Comment