सफर जारी है....1053
11.09.2022
पाठशाला जीवन की........
विद्यालय महाविद्यालयों की कक्षाओं में बहुत पढ़ लिख लिये, खूब डिग्री डिप्लोमा प्रमाणपत्र बटोर लिये, प्रथम द्वितीय तृतीय आते रहे और अपने को खूब फन्ने खां समझते रहे, अपनी उपलब्धियों पर मार इतराते रहे कि मैं ये मैं वो, मुझसा कोई नहीं, देखो मुझे मिले मैडलों और प्रशस्ति पत्रों से पूरा घर भरा पड़ा है, मेरे अध्यापक और सहपाठी मेरी खूब प्रशंसा करते हैं, स्वप्न लोक में विचरण करते रहे पर जब जीवन के कठोर और यथार्थ धरातल से सामना हुआ तब पता चला कि ये पढ़ाई लिखाई, ये मेडल, ये शील्ड ये पुरस्कार सब के सब एक कोने में धरे रह गए, जिन प्रश्नों और कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, उनके उत्तर और समाधान तो किसी भी कक्षा में किसी भी अध्यापक द्वारा बताए ही नहीं गए हैं, बताना तो दूर उनका जिकरा भी नहीं क्या गया। जाने किया क्या रटते रहे हम, रट्टा मार मार के खूब कापी भरते रहे हम, मास्टर जी ने सब सही सही बताया, कुछ भी नहीं काटा और न कापी पर कोई लाल लाल गोले बनाए, खूब झोली भर भर के अंक दिए। जब सब कुछ सही था तो उस सही को व्यवहार में लाते ही सब गड़बड़ कैसे हो गया। सब लिखा पड़ा बरबाद कैसे हो गया। जो जो सिद्धांतत सीखा सिखाया गया, उसे प्रयोग करते ही हम गलत कैसे ठहराए जाने लगे, सबके माथे पर लकीरें क्यों पड़ गई, सब नाराज क्यों हो गए। सब उसे झुठलाने में क्यों लग गए।
यदि सत्य का पाठ झूठा था तो तीसरी कक्षा की पुस्तक में सत्यवादी हरिश्चंद्र,सच्चा बालक का पाठ क्यों पढ़ाया गया, श्रवण कुमार की मातृ पितृ भक्ति के प्रसंग क्यों बार बार दोहरवाए गए, गांधी की सत्य अहिंसा का पाठ क्यों पढ़वाया गया, राखी,नन्ही लाल चुन्नी, झूठा गडरिया, लालची और चालाक लोमड़ी, बंदर और मगर, सोने का अंडा देने वाली मुर्गी, आरुणि, एकलव्य, ध्रुव, प्रहलाद के प्रसंग बार बार क्यों सुनाए जाते रहे। इन्हें पढ़ते जो मानस तैयार हुए, जिस तरह के सुनहले स्वप्नो की दुनिया रची गई, जो सब्जबाग दिखाए गए, वे सब आज बिखरे क्यों जा रहे हैं, इतने इतने बिखर गए हैं कि समेट में ही नहीं आ रहे, सदा सच बोलो, झूठ बोलना पाप है, चोरी का माल मोरी में जाता है, सच्चे का बोलबाला, झूठे का मुंह काला जैसे वाक्यों की खुश्कत , इमला, इन्हें बीस बीस बार लिखने का निर्देष सब धुंधलाते जा रहे हैं, मंच पर वाद विवाद में अपना पक्ष दृढ़ता से रखते, भाषण वक्तव्य देते जो तालियों की गूंज से हाल गूंज उठता था, आज वही तालियां कानों में जहर बुझे स्वरों में क्यों बदलती जा रही हैं। सिखाया तो ये गया था कि न तो अन्याय करो और न अत्याचारी, अनाचारी, अन्याय करने वाले का साथ दो। यदि तुम ऐसों के साथ खड़े हो, कोई विरोध नहीं करते फिर चाहें चुप्पी का कोई भी कारण क्यों न हो, आप पाप और अपराध में लिप्त माने ही जते हैं, आपकी चुप्पी भी स्वीकृति ही है मौनम स्वीकृति लक्षणम।
पढ़ाया तो ये गया था कि प्रकृति की तरह देना सीखो, प्रकृति हमें देती है सब कुछ हम भी तो कुछ देना सीखें, सूरज हमें रोशनी देता, हवा नया जीवन देती है, भूख मिटाने को हम सबकी धरती पर खेती होती है, औरों का हित हो जिसमें हम कुछ ऐसा करना सीखें, हम भी तो कुछ देना सीखें। हमें पढ़ाया गया परोपकारम सदा विभूतय कि नदियां अपना पानी स्वयं नहीं पीती, पेड़ अपने फल स्वयं नहीं खाते, संत पुरुष बिच्छू जैसे बार बार काटने डंक मारने वाले की भी रक्षा ही करते हैं, हमें दधीचि,कर्ण और शिवि की दानशीलता के प्रसंग रच पच कर सुनाए गए, सीता सावित्री लक्ष्मीबाई जीजाबाई की कहानी सुनाई जाती रही, बड़े बड़े महापुरुषों के जीवन की घटनाएं बताई जाती रहीं और जब ऐसा मानस तैयार हो गया तब बार बार सुनाया जा रहा है कि ये सब बातें परीक्षा पास करने कराने के लिए हुआ करती हैं। इनका जीवन की वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं हुआ करता। तो जो अब तक पूरी वसुधा ही कुटुम्ब है जैसे सूत्र पढ़ते रटते रहे, उन्हें भूलो और जो जीवन का सच है उसे समझो।
जीवन की पाठशाला में प्रवेश करते ही सारे आदर्श बिला गए, सारे सूत्र गड़बड़ा गए, जो पढा जो सीखा जिसके बल पर उपाधिया बटोरी, मेडल और प्रशस्ति पत्र पाए, उस सबको भूलने के लिए कहा जा रहा है, जो गणित पढा, जिन फार्मूलो को रटा, सब आउटडेटेड हो गए, सारी की सारी कहावतें, मुहावरे, लोकोक्ति बेकार हो गईं। सांच को आंच कहां जैसी बातें गई तेल लेने। अब तो निकम्मो, कामचोरो, झूठे, बकबकियों, आलसी, बड़बोलो की फौज तैयार हो रही है। संवेदना और करुणा अलग थलग पड़ गईं हैं, उन्हें कोई कौदी के भाव भी नहीं पूछता, सत्य से सब आंख चुराने लगे हैं, जो कर सकते थे, उन्होंने गांधारी की तरह आंख पर पट्टी बांध ली है, पिता धृतराष्ट्र की तर्ज पर केवल और केवल अपने दुर्योधन को राजगद्दी दिलाने में लगे पड़े हैं। पुत्र मोह इतना अधिक गहरा गया है कि उन्हें सत्य असत्य, न्याय अन्याय में भेद करना भारी पड़ रहा है, द्रौपदी का चीर बढ़ाने अब कृष्ण नहीं आया करते, द्रौपदी को ही आगे आना पड़ता है। भीष्म पितामह भला मौन के अलावा क्या कर सकते हैं। वे दुर्योधन का नमक जो खा रहे हैं और अपनी प्रतिज्ञा से बंधे हुए हैं।
जीवन की पाठशाला जो पाठ पढा रही है वह पहले पढ़े पाठों से बिलकुल भिन्न है। अब दुविधा में है कि सच कौन सा है जो किताबों में लिखा था वह या जिसे अब नंगी आंखो से देख रहे हैं वह। अब तो झूठ और अन्याय ही फलता देख रहे हैं, सत्य पर झूठ हावी है, जो कुछ नहीं करते, वे जोर जोर से बोलकर सही को धमकाते धकियाते रहते हैं। अब सारा समय तो इन कुत्सित लोगों की चालों से बचने और उनसे निपटने में ही चला जाता है। उनके पास पैसे और सिफ़ारिश का बल है, उनकी ऊंचे लोगों में पैठ है, वे कुछ भी कर सकते हैं , सफेद को काला करने की कुब्बत रखते हैं और सही लोग बेचारे एक कोने में उपेक्षित से पड़े रहते हैं। जो जीवन की पाठशाला सिखा रही है, सत्य तो वही है। पर फिर भी पिछले पढ़े पर, उन जीवन मूल्यों पर विश्वास गहरा है कि झूठ के पैर नहीं होते, उसे घुटने टेकने ही पड़ते हैं, सत्य जी विजयी होता है इसलिए सत्यमेव जयते कहा ही नहीं जाता, सब जगह लिखा भी जाता है। पढा तो यह भी है कि सत्य परेशान भले ही हो पर अन्तत जीतता अवश्य है। अभी तो संघर्ष के दिन हैं, झूठ पैर पसारे है, देखें सत्य कब जीतता है, उसका सूर्य अपने तेज से कब दीप्त होता है कि उसके तेज प्रकाश से सबकी आंखें चुंधिया जाए। बस प्रतीक्षा और प्रतीक्षा ही है।
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