सफर जारी है.....1054
12.09.2022
पितर गया भेज दिए गए हैं.......
श्राद्ध पक्ष में पितर धरती पर आते हैं अपने प्रियजनों को आशीर्वाद देने, उनकी कुशल मनाने और उनका लोकमंगल चाहने। स्वजन भी पितृपक्ष में अपने अपने पितरों का जल में काले तिल डाल कुशा से तर्पण करते हैं, अग्नि प्रज्वलित कर पितरों का आवाहन करते हैं, घी,लौंग, परसी थाली में से मीठा और पूरी के टूक से उन्हें जिमाते हैं, जलती अग्नि पर जल छिड़कते हैं, कौए, गाय, कुत्ते, भिखारी का भाग निकालते हैं और फिर ब्राह्मण के ब्याज से उन्हें भोजन खिला तृप्त कर दक्षिणा दे विदा करते हैं और मन ही मन संतुष्ट हो लेते हैं। जब से होश संभाला है, घर में बाबा दादी का श्राद्ध ऐसे ही होते देखा है। ससुराल में भी कमोवेश यही प्रक्रिया दोहराई जाती रही है। कुछ ज्यादा पढ़े लिखे लोग जो इस सबमें विश्वास नहीं करते, इसे ढकोसला मानते हैं, वे गाय को घास खिला, किसी अनाथ या वृद्ध आश्रम में जा दान दे आते हैं, किसी भूखे को भोजन करा आते हैं। जिसको जिसमें सन्तोष मिले, वह वही कर लेता है पर पितरों को खूब मान देता है। जीते जी भले उन्हें सूखी रोटी के दो टुक्कड़ मिले न मिले पर स्वर्गस्थ होते ही, दूसरे लोक का प्राणी होते ही उनके लिए देशी घी की पूरी, इमरती, दही बूरे और भी उस बहुत कुछ का प्रावधान भी हो जाता है जो भले से उनके बजट में नहीं समाता। इस पक्ष में सोलह दिन तक किसी न किसी रिश्तेदार का श्राद्ध अवश्य रहता है। पूर्णिमा से प्रारंभ होकर अमावस तक की तिथियां पूर्वजों के नाम कर दी गईं हैं, इन्हीं तिथियों में से ही किसी दिन उनके प्राण छूटते हैं।
छह दशकों में पहली बार ऐसा हुआ है कि पूर्णिमा, पड़वा, दौज़ सूने रहे हो, दादी सास, ददिया ससुर, बड़ी बहू और माताजी किसी को जिमाया तक न हो। अभी तो श्वसुर, सास, पिता की तिथि आनी शेष है। इस बार चूल्हे पर न कढ़ाही चढ़ी है और न इमरती का भोग लगा है, न खीर बनी न दहीबड़े और न अदरक डाल के मूली कस और न मूली की भुजिया। न जिजमान जिमाए गए हैं, न दक्षिणा न दानदिया गया है। नहीं नहीं ऐसा बिलकुल नहीं है कि हम अति आधुनिक हो गए या अपने संस्कार भूल गए हों, हमारी श्रद्धा समाप्त हो गई हो, कदापि नहीं बिल्कुल नहीं, अरे उन्हें कैसे भुलाया जा सकता है भला, वे तो अब भूत हो गए हैं और मनों में गहरे जम गए हैं। लोकश्रुति के अनुसार जिनका पिंड दान गया में जाकर भर आते हैं, उन्हें वहां प्रतिष्ठित कर आते हैं, उन्हें उनके परम धाम पहुंचा आते हैं तो फिर उनका श्राद्ध वर्जित है। श्राद्ध भले से ही न किया जाए पर श्रद्धा का भाव अधिक से अधिक गहराता जाता है। कुछ माह पूर्व पटना की यात्रा के सुयोग बनने पर हम भी गया जाकर अपनी तीन पीढ़ियों के पिंड भर आए हैं। अब सालाना परंपरा गत विधि से श्राद्घ करने की औपचारिकता भले से न हो, पर श्रद्धा भाव से उन्हें याद करने पर तो कोई प्रतिबंध नहीं है। आश्चर्य है जो पितर अपनी तिथि वाले दिन स्वप्न में साकार हो जाते थे, उन्हें देख कर समझ आ जाता था कि अरे, आज तो इनकी तिथि है। पर इस बार तीन दिन बीते जा रहे हैं पर न तो बूढ़ी दादी सास जिन्हें प्रत्यक्ष देखने का सौभाग्य ही नहीं मिला, बड़ी बहू और माताजी आज रात सपने में भी नहीं आए तो मान लें कि पितर अपने अपने स्थान पर सचमुच चले गए हैं। वे इस पितर पक्ष में घर भले न पधारे हों पर अपने गोलोक धाम से दोनों हाथ उठा हमें आशीर्वाद अवश्य दे रहे होंगे। हमारी कुशल मंगल अवश्य मना रहे होंगे। वे हमारे बड़े हैं, पूज्य हैं, श्रद्धास्पद हैं, हमारे मन में गहरे धंसे हुए हैं। उन्हें किसी ब्याज से याद थोड़े ही करना पड़ता है। वे हैं जरुर फिर चाहें वे किसी भी जगत में क्यों न हों। कुछ माह पूर्व ही उन्हें अपने हाथों से विष्णु लोक के परम धाम भेज कर आए हैं। अब वे आवागमन से मुक्त हो गए हैं। वे भले से मुक्त हो गए हों पर हम जीवधारी तो अभी तक माया मोह में फंसे हुए हैं, कहां विमुक्त हो पाए हैं। सब तो यादों में बसा हुआ है। रोज एक एक चैप्टर अपने आप आंखो के आगे खुलता चला जाता है और तिथि विशेष पर ज्याड़ा गहराता जाता है। साथ बिताए क्षण मन पर हावी होने लगते हैं, उन क्षणों को खूब भाव मग्न हो कर जी लिया जाता है।
जो हैं और जो शेष हो चुके हैं, सब अपने ही हैं। वे अपने ही बने रहें, बस इसी में सारा सन्तोष है। हम श्रद्धा से उनके साथ बने रहे, उतना ही पर्याप्त है। कभी हमें भी इतिहास ही बन जाना है, इन्हीं सोलह तिथियों में ही हमारे जन्म मरण की तिथि निहित है। इन्हीं में से किसी को हमें गोलोकवासी होना है, जीवन मरण से, आवागमन के बंधनों से मुक्ति पानी है , भूत हो जाना है, अपने आत्मजो के हाथो तर्पित होना है,श्राद्ध का भोजन पाना है, काक के ब्याज से पुकारे जाना है, सूक्ष्म हो जाना है। हम सबको देख सकेंगे पर हमारे आत्मीय हमें स्थूल रुप में नहीं देख पाएंगे इसलिए वे किसी ब्राहमण रुप में हमें खोजेंगे, हम तक भोजन पानी पहुंचाएंगे, कभी पीपल पर घड़ा बांध आऐंगे तो कभी किसी प्यासे को भरपेट जल पिला हमें तृप्त कर देंगे। हम सब की गति और नियति यही है। एक दिन हम सबको भूत हो जाना है, श्राद्ध के निमित्त अपनों की कुशल मंगल लेने आना है, उन्हें फलने फूलने का आशीष देना है, अपनी लगाई बेल को हरहराते देखना है। बस तो जो आज है वह भी हमारा है और जो कल होगा, वह भी हमारे नाम होगा। रहें न रहें हम महका करेंगे, श्रद्धा भाव से याद किए जाते रहेंगे, श्राद्ध के ब्याज से पकवान पाते रहेंगे और एक दिन गया में स्थापित कर दिए जाएंगे।
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