Friday, September 2, 2022

दुविधा में दोऊ गए

सफर जारी है.....1045

03.09.2022

दुविधा में दोऊ गए........

जीवन संकल्प विकल्प से भरा है। न जाने कितनी कितनी बार ऐसे क्षण आते हैं जब हमें दो में से एक चुनना होता है पर हम निश्चय नहीं कर पाते, दोनों के बीच झूलते रहते हैं,। एक तरह से कहें तो दोनों हाथ में लडडू की चाहना होती है, अम्मा भी प्यारी और बबुआ भी प्यारो, किसी एक को भी छोड़ना नहीं चाहते। यदि दोनों ही नुकसान दायक हों, इधर कुआ उधर खाई की स्थिति हो तो भी कम नुकसान वाले को चुनना चाहेंगे। पर जिनमें चयन के निर्णय की योग्यता नहीं होती, वे बीच में झूलते रहते हैं। बहुत मन पक्का कर होय सो राम कर भी लें तो भी जो नहीं चुना होता, उसी में पूरी चेतना केंद्रित रहती है और जो कच्चे पक्के मन से चुन भी लिया और वह अधिक लाभ का सौदा नहीं रहा तो दिन रात मार खिझियाते खिसियाते रहते हैं कि इससे अच्छा तो उसे ही चुन लेते।

दो या दो से अधिक में से एक चुनने के निर्णय की दृढ़ता अचानक नहीं सीखी जाती। इसे तो बचपन से ही सिखाना होता है। पर हम माता पिता अपने ही विकल्पों को बहुत जल्दी समाप्त कर लेते हैं और बच्चे की जिद के आगे हथियार डाल देते हैं कि तुझे नहीं समझ आ रहा तो ले, दोनों ले ले । बस यहीं से चूक प्रारंभ होती है। उसे जितना मर्जी समय दीजिए पर उसे अपना मन समझने दीजिए कि उसे चाहिए क्या, उसे निर्णय करने दीजिए, उसे उसके संकल्प विकल्पों पर विजय पाने दीजिए, उसे सिखाएं कि सोच समझ के चुनो और जो चुनो उस पर दृढ़ रहो, उसके लाभ हानि समझ लो। यह ही नहीं निश्चित कर पा रहे कि तुम्हारी पसंद क्या है, मीठा चाहिए या नमकीन या खट्टा, गर्म, ठंडा या गुनगुना, हल्का या भारी, उसे चुनने की आदत डालो, उसे समझाना ज़रूरी है कि दो में से एक चुनना होता है, अपने मन को जानना होता है, अपनी रूचि पता होनी चाहिए। इधर उधर फैली पसरी वस्तुएं हमारा ध्यान जरूर बंटाती हैं पर हमें अपने को अपनी रूचि पर केंद्रित करना आना ही चाहिए। हमेशा मन पर ही सब नहीं छोड़ देना चाहिए। मन की क्या, वह तो खूब भटकाता है। उसे तो सब चाहिए होता है, वह तो अपने को कभी एक जगह केंद्रित कर ही नहीं पाता ,बस इच्छाओं के आकाश में उड़ता घूमता भटकता ही रहता है। उसे नियमित और अनुशासित तो आप करते हैं, डांट डपट के रखते हैं, वर्जित स्थानों पर जाने से रोकते हैं। मन की क्या, वह तो निरंकुश होता है, जब चाहे ,जहां चाहे, मुंह उठा के चल देता है। हम मन को नियंत्रित करें न कि मन हमारे ऊपर शासन करे।

         आप एक होटल में खाना खाने जाते हैं ,आप चार प्राणी है, उनमें से तीन अपनी अपनी पसंद का खाना आर्डर कर देते हैं पर चौथा सदस्य बड़ी देर तक यह तय नहीं कर पाता कि उसे पिज्जा चाहिए या बर्गर या कुछ और। कभी बहन की प्लेट का पिज्जा देखता है तो कभी मां की प्लेट का पिज्जा या पिता की प्लेट का आलू परांठा। मां विकल्प देती है तुम कुछ भी मंगा लो, सबमें में शेयर कर लेना पर पिता अड़े रहते हैं कि नहीं, तुम अपनी पसंद का चुनो, उसे मंगाओ और खाओ लेकिन तब दीदी की प्लेट पर नजरें नहीं गडी होनी चाहिए। ऐसा नहीं है कि पिता कंजूस है कि उसके पास इतना पैसा नहीं कि वह अपने बालक को इतने ऑप्शन खरीद के न दे सके कि जो खाया जाय खा लो, बाकी पैक करा के ले चलेंगे। वह ये सब कर सकता है लेकिन नहीं करता क्योंकि उसे बच्चे को यह अभ्यास डालना है कि वह अपनी रूचि पहचान सके, वह उस पर ध्यान केंद्रित कर सके और उसे एंजॉय कर सके। हम में से आधों की समस्या तो यह है कि हमें ये ही मालूम नहीं होता कि हमें आखिर चाहिए क्या, कभी उसे चुन लेते हैं जो अधिकांश लोग चुन रहे होते हैं या हम उस के निर्णय से प्रभावित हो जाते हैं जिसे जीवन में अधिक मानते हैं, जिसके प्रभाव में होते हैं और फिर जिंदगी भर गाते रोते हैं कि भाई क्या करें, हम ने तो इसके उसके कहने से ऐसा कर लिया, हमारा तो मन ही नहीं था। अरे मन नहीं था तो क्यों किया और किसी के कहने से ही निर्णय लिया, किसी के दवाब में ही लिया तो उसे डिट्टो करो, लाभ हानि भुगतने के लिए तैयार रहो। ऐसे थोड़े ही होता है कि जो लाभ हुआ तो शुरू हो गए कि हमने तो पहले ही कही थी और जो कहीं नुकसान हुआ तो अगले को पानी पी पी के कोसेंगे कि हमारा काम तो इसने बिगाड़ दिया। यानि चित्त भी मेरी पट्ट भी मेरी। तुम ही सबसे अधिक समझदार हो सो तुम्हारे दोनों हाथों में लडुआ होने चाहिए।

अपने पाल्य में चयन करने, निर्णय करने और उस निर्णय पर अडिग होने की आदत बचपन से ही डालिए, पहले तो झुनझुने से उसके हाथो बजते रहते हो और फिर जब उसकी आदतें सीमेंट सी पक्की हो जाएं, वह किसी भी बात में निर्णय न ले पाए, हमेशा दूसरे के नाम की पर्ची फाड़ता रहे, उसका आत्मविश्वास डूगलाता रहे तब मार परेशान होते हो। सोच सोच के बहुत सोचो पर संकल्प विकल्प में ही मत उलझे रह जाओ, चयन का निर्णय करो और अपने उस चयनित फैसले के साथ आगे बढ जाओ। नहीं तो दुविधा में दोऊ गए माया मिली न राम या आधी छोड़ पूरी को धाबे, आधी मिले न पूरी पाबे का हाल हो जाएगा। 

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