Saturday, September 3, 2022

जिन गोविंद दियो बताय......... दु

 सफर जारी है.....1046

04.09.2022

जिन गोविंद दियो बताय.........

दुनिया में सबको एक उसी गोविंद की आस है, उसे ही भजा जाता है हे कृष्ण हे गोविन्द हे मुरारी, ईश इच्छा सर्वोपरि है, उसकी मरजी के बिना तो एक पत्ता भी नहीं हिलता, वो जो चाहे तो मूक भी बोलने लगे और पंगु भी पर्वत लांघ जाए। अभी चार दिन पूर्व ही विघ्न विनाशक का जै गणेश जै गणेश जै गणेश देवा की स्तुति से आवाहन किया है, उन्हें विराजा है, उनसे रिद्धि सिद्धि, बल बुद्धि मांगी है। अंधन को आंख देत कोढ़ी को काया, बांझन को पुत्र देत निर्धन को माया दोहराया है। पर उस परम पिता, सर्व शक्तिमान प्रभु का ठौर हमें कौन बताता है,  कौन हमें उससे मिलने की राह दिखाता है,कौन उस तक पहुंचने का मार्ग बताता है तो कबीर खंगालने होते हैं, उनके दोहे, सबद, रमैनी की व्याख्या करनी होती है, उसे समझना होता है जिसमें वह स्पष्ट रूप से कह देते हैं ....गुरु गोविंद दोउ खडे काके लागू पांय, बलिहारी गुरु आपने जिन गोविंद दियो बताय।

विचार का असली मुद्दा तो यहीं से शुरू होता है जब गुरु इतना बड़ा पथ प्रदर्शक है कि वह सामान्य समस्याओं उलझनों का तोड़ और समाधान तो बताता ही है, यह तो उसके लिए बाएं हाथ का खेल है। वह तो गोविंद तक पहुंचने का मार्ग भी बता देता है। यह सच ही होगा नहीं तो ज़रा मुसीबत पड़ने पर हम गुरुजी को क्यों तलाशते हैं, उनसे विनती प्रार्थना क्यों करते हैं, क्यों कहते हैं गुरू बिन ज्ञान नहीं।पर आज के गुरु क्या इस कसौटी पर खरे उतर रहे हैं, क्या वे दुनियावी झंझटों, मोह माया से छुटकारा दिलाने में वाकई समर्थ है। क्या ये गुरुजी शिवा के समर्थ रामदास, विवेकानंद के रामकृष्ण परमहंस, दयानंद के  विरजानंद, राम के वशिष्ठ और विश्वामित्र, कृष्ण के  सांदीपन , चंद्रगुप्त के चाणक्य जैसी सामर्थ्य रख पाते हैं, क्या उन्हें अन्तर हाथ सहार दे ठोक ठोक कर गढ़ पाते हैं गुरू कुम्हार शिष्य कुंभ है गढ़ गढ़ काढ़े खोट , अन्तर हाथ सहार दे बाहर बाहे चोट को जीवन में प्रयोग कर पाते हैं या काली कमरिया ओढ़े बैठे रहते हैं, चिकने घड़े से हो जाते है जिस पर कोई रंग नहीं चढ़ता और पानी फिसल जाता है। इतने उच्च गौरव बोध की तो बात भी मत करो, इसका तो जिकरा भी मत करो । वे लौकिक शिक्षा दे लें, वही बड़ी बात है। और अधिकांश तो इतना भी नहीं कर पाते। जो  इसे कमाई और आजीविका वृत्ति के रुप में ही लेते हों ,वे भी जितना कमाते हैं उसका दशांश भी नहीं देते। वे पढ़ते भी उतना ही हैं  जिससे अगली कक्षा में प्रमोट हो सकें। और जैसे तैसे डिग्री डिप्लोमा पाकर कहीं भैन जी या मास्टर जी बन चिपक सकें । जब पढा ही उतना खोंच भर जाता है तो रेज का कहां से पढा पाएंगे। पढ़ाने के लिए तो बहुत पढ़ना होता है, पढ़ने से अधिक गुनना होता है, समझना होता है, तथ्यों को उसी रूप में पहुंचाना होता है, दस बात याद करते हो तब जाकर क्लास तक पांच पहुंचा पाते हो। अपनी बात की पुष्टि के लिए जीवन जगत से लेकर उदाहरण और दृष्टांन देने होते हैं। ये सब तब संभव होता है जब विषय को अच्छी तरह समझा हो। अब रट्टा मार के परीक्षा में लिखने तक का ही श्रम करोगे तो कक्षा में पढ़ाने जाते डिब्बा गुल होगा ही। और जो कहीं किसी विद्यार्थी ने कोई प्रश्न पूछ लिया तो या तो उसे डांट के चुप करा दोगे या बगले झांकने लगोगे। हमारे प्राथमिक अध्यापको के  तो ४४१में चार का भाग देने में छक्के छूट जाते हैं और श्यामपट पर लिखते वर्तनी की ढेरो अशुद्धियां के बीच शुद्ध शब्द खोजने में द्रविड़ प्राणायाम करना पड़ता है। इंस्पेक्शन को आए बेचारे आधिकारी के सिर लाज से झुक जाते हैं कि क्या ये ही वे अध्यापक हैं जिनके हाथों हम भविष्य की पीढ़ी का निर्माण सुरक्षित सौंप निश्चिंत बैठे है। जरा भी लाज शर्म बाकी बची होती तो अध्यापक कहलाते लाज आती, दो चुल्लू पानी में डूब मरने का मन होता पर नहीं साब, हम तो निरे ढीठ और पक्के बेशरम हो गए हैं, कहता रहे लाख कोई, हम पर कोई फर्क नहीं पड़ता। क्यों पड़े , सब एक ही नाव पर सवार है, तू मेरी ढाक मैं तेरी ढाकता हूं। अब काम में दीदा नहीं लगता, काम चोरी की आदत पढ़ गई है तो काम चोर है और चोर चोर तो मौसेरे भाई होंगे ही। पूरे सिस्टम में भांग जो घुली हुई है। सिफारिश और रिश्वत खोरी का बाजार इतना गर्म है कि जिसकी जेब में पैसा है या बड़े ओहदे वालों को जेब में रखे घूमते हैं , वे सरेआम सिस्टम को चुनौती दे देते हैं। 

          बड़ी कोफ्त होती है आखिर सालाना शिक्षक दिवस मनाते हम कौन सी प्रतिज्ञा लेते हैं और उस पर कितने खरे उतरते हैं। शिक्षक होना अपने ज्ञान को, जानकारी को विद्यार्थी  में स्थांतरित करना है। उसे सजग समर्थ नागरिक बनाना है, उसे जीवन के उच्च आदर्शों से समन्वित करना है उसे सांच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप, जाके हिरदय सांच है ताके हिरदय आप का पाठ पढ़ाना है,ऐसी बानी बोलना सिखाना है जो मन का आपा खोय, औरन को शीतल करे आपहु शीतल होय । उसे सत्पथ पर चलने की शिक्षा देनी है, उसे मुसीबतों से लड़ना, उनसे जूझना सिखाना है, मुसीबतों के आगे हार जाना, घुटने टेक देना और पीठ दिखाकर भाग जाना नहीं। उसके विवेक को जाग्रत करना है। उसे बोध कराना है कि उसके अन्दर अपार शक्तियों का भंडार है, वह शक्ति पुंज है। उसे अपनी सामर्थ को तौलना है, वह भूला और भटका हुआ है, उसे चेताना है का चुप साध रहे बलबाना।उसे सही मार्ग दिखाना है, समझाना ज़रूरी है, सूचना तो वह गूगल बाबा की शरण में जाके भी ले सकता है।

          अब जो ये सब कर सको तब उस श्रेणी के अध्यापक बनने की पंक्ति में खड़े होने का साहस कर सकोगे  जिसके लिए कबीरा लिख गए सात समुद्र की मसि करूं लेखनी सब वनराय, सब धरती कागद करूं गुरू गुन लिखा न जाए। तो लगे रहिए लाइन में, कोशिश करते रहिए क्योंकि कोषिश करने वालो की हार नहीं होती और लहरों से डर कर ये नौका पार नहीं होती, कुछ किए बिना जय जय कार नहीं होती।

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