सफर जारी है.......... 1047
05.09.2022
मूरख ह्रदय न चेत....
ज्ञान के अभाव में सभी मूरख ही हैं और ज्ञान मिलता है गुरूजी से। आजकल गुरुजी के अनेकों विकल्प मौजूद हैं मसलन नोट्स, कुंजी और सबसे महत्वपूर्ण गूगल बाबा जो एक क्लिक पर सारी सूचनाएं बिलकुल सही सही उपलब्ध करा देते हैं। अब सूचनाओं का संग्रह ही तो ज्ञान नहीं है न। जब तक समझ विकसित न हो , अक्क्ल में कोई बात पूरी तरह न घुस जाए, जब तक उसके प्रयोग की क्षमता न आ जाए तब तक मर्जी चाहे जितने डिग्री डिप्लोमा प्रमाणपत्र ले लो, सब रद्दी कागज के पुलिंदे बन कर रह जाते हैं। और जो जीवन में गुरू मिल जाए, और कहीं सदगुरु मिल जाए तो सब अंधकार छंट जाता है इसीलिए कहा गया मूरख ह्रदय न चेत, जो गुरू मिलहि विरचि सम।
गुरू वहीं नहीं है जो कक्षा में पढ़ाता है। श्रीमद भागवत की कथा में दत्तात्रेय जी ने जिन चौबीस गुरुओं का उल्लेख किया है, उनमें तो मक्खी चींटी से लेकर सर्प और कुत्ता भी सम्मिलित हैं। जो सिखाए वही गुरू। इसमें आयु की अधिकता का भी कोई प्रश्न नहीं। बोध जागे तो पांच साल के ध्रुव में जग जाए और न जागे तो सौ साल भी कम पड़ जाएं। सिद्धार्थ ने जो जो देखा, वह सब तो हम भी रोज रोज देखते हैं पर हमें तो बोध नहीं जगता। हम में से कितनों की हिम्मत होती है कि आधी रात को मनोरमा पत्नी और दुधमुंहे पुत्र राहुल को सोते लांघ कर ज्ञान की खोज में निकल जाएं। निकलना तो दूर, सोचें भी नहीं। अरे आराम से वातानुकूलित कक्ष में परिवार के साथ रह रहे हैं काहे को दर दर भटकते डोलें। ऐसी प्यास तो सिद्धार्थ को ही लगी सो पीपल वृक्ष के नीचे समाधि लगा के बैठ गए, बुद्धत्व प्राप्त हुआ और बुद्ध कहलाए। बौद्ध धर्म ही प्रचलित हो गया।
गुरू तो कोई भी हो सकता है और जिसके कहे शब्द दिल में गढ़ जाएं वही गुरू हो जाता है। तीन संदर्भ तो सब्की स्मृति में खूब गहरे धंसे होंगे । रत्नाकर जो पेशे से डाकू थे (ऐसा लोक में प्रचलित है), परिवार के भरण पोषण के लिए लूटमार करते थे पर जब सप्त ऋषियों के संपर्क में आए और उनके कहने से परिवार के पास दौड़े दौड़े ये पूछने चले गए कि मेरे पाप में कौन कौन भागी होगा और जब पारिवारिक सदस्यों ने एक स्वर से कह दिया कि परिवार के मुखिया होने के कारण हमारा भरण पोषण तुम्हारा धर्म है, अब उसे तुम कैसे निभाते हो पाप करते हो या पुण्य, ये तुम जानो, हमारा उसमें कोई भाग नहीं। रतनाकर की आंखें खुल जाती है। दौड़ कर जाते हैं, इनका बंधन खोलते हैं, मरा मरा का गुरुमंत्र लेते हैं और उल्टा नाम जप कर ही महर्षि वाल्मीकि बन जाते हैं, रामायण रच देते हैं। ऋषि का दिया ज्ञान उन्हे महर्षि बना देता है।
वरद राज की कथा भी याद होगी कि कैसे उसका ब्याह धोखे से विद्योत्तमा से करा दिया जाता है और जब मूर्ख कालीदास मुख खोलता है, उष्ट्र को उटर कहता है तो पोल खुल जाती है। विद्योत्तमा की डांट फटकार इतनी बुरी लग जाती है कि अभिज्ञान शाकुंतल, रघुवंश, किरातार्जुनीयम जैसे काव्य रच देते हैं, कवि नहीं महाकवि बन कर ही दम लेते हैं।
रामचारित मानस के रचियता तुलसी को भला कौन नहीं जानता। गोद लिए हुलसी फिरें तुलसी सो सुत होय। रत्नावली के प्रेम में ऐसे आसक्त कि सौंप को भी रस्सी समझ उसके सहारे चढ़ पत्नी के कक्ष तक पहुंच जाते हैं और रत्नावली की एक फटकार कि अस्थि चरम मय देह तामे ऐसी प्रीत, जो होती भगवान में तर जाति भवभीति। ग्रंथ के ग्रंथ लिख जाते हैं और राम चरित मानस लिख कर अमर हो जाते हैं।
तीनों ही घटनाएं सिद्ध करती हैं कि गुरू कोई भी हो सकता है और जब बोध जगता है तब सारा का सारा अंधकार छंट जाता है, प्रकाश ही प्रकाश छा जाता है इतना प्रकाश कि आंखें चुधियाने लगती है। ज्ञान का प्रकाश जब अन्दर जगाएगा, प्यारे श्री राम के तू दर्शन पाएगा, ज्योति से जिसकी है उजियारी सारी दुनिया, राम एक देवता। बस ज्ञान का प्रकाश हो जाए तो सब मूर्खता दूर हो जाती है। खूब समझदारी आ जाती है।ज्ञान गुरू देता है और कहीं गुरु विरंच सम हो तो सोने में सुहागा। गुरु को ब्रह्मा विष्णु महेश के साथ परम ब्रह्म की संज्ञा दी गई है पर ऐसे गुरु खोजने होते हैं ।कबीर को रामानंद, सूरदास को बल्लभाचार्य, विवेकानंद को राम कृष्ण परमहंस, दयानंद को विरजानंद चंद्रगुप्त को चाणक्य, शिवा को समर्थ गुरु रामदास, भगवान राम और कृष्ण को विश्वामित्र वशिष्ठ और सांदीपन जैसे गुरु न मिले होते तो वे वे न होते जो आज हैं। मुझको कहां खोजे बंदे मैं तो तेरे पास में की तर्ज पर गुरु भी हमारे आसपास ही होते हैं, माता को तो प्रथम गुरु कहा ही गया है। तो गुरुओं का वरद हस्त बना रहे, इनकी कृपा मिलती रहे, बस जीवन धन्य हो जाएगा। सदगुरु की खोज तो जारी रखें पर गुरु घंटालों से ज़रूर बच कर रहें।
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