Monday, September 5, 2022

अगले जनम मोहे मास्टरनी ही कीजो

 सफर जारी है...1047

07.09.2022

अगले जनम मोहे मास्टरनी ही कीजो.......

हां, तो क्या बुराई है भई मास्टरनी बनने में, सबकी पसंद अलग अलग होती है। किसी को डाक्टर बनना पसंद है तो किसी को इंजीनियर, कोई समाज सेवा करना चाहता है तो कोई वकील कोई नेता कोई अभिनेता तो कोई राजनेता। कोई कुछ भी बने, ये उसकी मर्जी। और किसी के नाम पर तो नाक भोंह नहीं सिकोड़ते फिर मास्टरनी और वह भी हिंदी वाली के नाम इतना बुरा इंप्रेशन क्यों दिया, मुंह तो ऐसे बनाया जैसे मुंह में कड़वी गोली आ गईं हो या चबाते चबाते दांत तर कंकड़ आ गया हो। क्यो भाई पहले तो हमें ये बता दो कि मास्टर मास्टरनी के नाम से इतनी एलर्जी क्यों है। इन्हीं मास्टर मास्टरनी की बदौलत तुम और तुम्हारी औलाद चार आखर पढ़ के भले लोगों के बीच खड़ी हो पाती है। ये प्रजाति न हो तो सब के सब काले अक्षर भैंस बराबर बने रहते। बालक अभी चार कदम चलना भी नहीं सीख पाता, तब से उसे स्कूल जाने को लगातार उकसाते हो। अभी तो वह अपनी दैनिक आवश्यकताओं को कहने लायक भी नहीं होता तब तक उसे कंधों पर भारी भरकम बैग टांग, टिफिन और बोतल के साथ स्कूल रवाना कर देते हो, अभी छुटके तीन बरस के भी नहीं हो पाते तो उनके इम्तिहान शुरू हो जाते हैं। जो स्कूल में बच्चा खुशी खुशी जानें को तैयार हो जाता है तो इसकी वजह ये स्नेहिल मास्टरनियां ही होती हैं जो प्यार से सब सिखा  देती हैं। उनके पास पढ़ाई के अतिरिक्त भी बहुत कुछ है देने को, वे छोटी छोटी बातें जिन्हें सिखाने में आपके पसीने छूट जाते हैं, वहीं उसे वह ऐसी ट्रिक से सिखाती हैं कि आप भी दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं। ओर हद तो तब हो जाती है जब आप का बालक आपकी बात को तरजीह न देकर मास्टरनी, मैम, भैनजी की बात मानने लगता है, मैम ने जो कहा, वह ही सोलह आने सत्य है।

और तो किशोर होते वे बच्चे जो आप से नहीं संभलते, उन्हें भी ये मास्टरनियां उचित राह पर ले आती हैं, भाषा की शालीनता सिखाती हैं, उज्जड़ से उज्जड विद्यार्थी भी अपनी टीचर जी के आगे गऊ बनकर रहता है। वह जानता है ये घर नहीं है जो उसकी मनमर्जी चलेगी, ये कक्षा है, स्कूल है यहां सबको नियम से ही चलना पड़ता है, गुरुजी का आदेश मानना ही पड़ता है नहीं तो समाजिक निंदा होती है और बेभाब की पिटाई होती है। बालक की तो छोड़ो, बालक के माता पिता भी टीचर जी को बहुत मानते हैं। बिगड़े बालक को मास्टर मास्टरनी के हाथ सौंप आते हैं कुछ भी करो पर इसे सुधार दो और पैसे का ज्यादा ही घमंड हुआ तो एक वाक्य और चैंप आते हैं कि पैसे की बिलकुल चिन्ता मत करना, दो तीन चार जितने मरजी कहो, ट्यूशन लगा देंगे पर ये शर्तियां पास होना चाहिए। क्या जादू होता है इन मास्टर मास्टरनियों के हाथों में कि बिगड़ैल बैल को भी नाथ देते हैं, मस्त हाथी को भी अंकुश के जोर से काबू में कर लेते हैं।

                मास्टरनी बनने के ढेरों लाभ हैं बल्कि कहूं तो दोनों हाथ लडडू होते हैं। नमस्ते तो थोक के भाव मिलती है। पिछले पैंतीस वर्षो में अपने विद्यार्थियों से इतना स्नेह और सम्मान मिला है कि अभिभूत हूं। उनकी प्रतिदिन की टिप्पणियों ने जो इतने ऊंचे आसन पर बिठाया है उसके आगे ये बेस्ट टीचर अवार्ड कोई मायने नहीं रखते। यदि आप अपने विद्यार्थियों के दिल में गहरे उतर जाते हो, हर क्षण उनके लिए उपस्थित रहते हो, उनकी बड़ी से बड़ी परेशानियों को चुटकी बजाते सुलझा देते हो तो आप अपने विद्यार्थी के लिए किअलादीन के चिराग से कम नहीं। यदि आप अपने दायित्व को शिद्दत से निभाते हो तो जो सम्मान जो आदर उनकी आंखों में झलकता है, उसके आगे बहुत कुछ फीका हो जाता है। कितना कितना सम्मान मेरी झोली में आया है, उससे में भरी पूरी हूं। जब बहुत साल पहले पढ़े विद्यार्थी को नाम से पहचान जाती हूं तो उसके चेहरे पर जो खुशी झलकती है, उसके कोई सानी नहीं। जब उन्हें कौली भर उनकी राजी खुशी पूछती हूं तो वे जैसे धन्य हो जाते हैं। उनकी संख्या से मेरे परिवार में वृद्धि होती है। कितनी कितनी मानस संताने हैं मेरी जो विश्व पटल पर फैली हुई हैं। उनके स्नेह भाव से मैं खूब लदी फदी हूं। जिन्होंने डुगलाते कदमों से कक्षा की देहरी पार कर मुझ तक आना सीखा, अब वे कद्दावर हो गए हैं, अपने अपने क्षेत्र में रोशनी बिखेर रहे हैं। कई तो परामर्श दाता की भूमिका में है, तकनीक सिखाने में माहिर हैं। जिन तकनीकों  को समझने सुलझाने में हमें द्रविड़ प्राणायाम करना पड़ता है ,उसे वे चुटकी बजाते ही सुलझा देते हैं लो गुरुजी हो गया। 

                अपनी इन मानस संतानों से बहुत समृद्ध होती है ये मास्टरनी की प्रजाति। पूरी धरती कुटुम्ब सी लगने लगती है। जहां मर्जी चले जाओ आपने जिस फसल को बोया है जोता है सींचा हैं, संस्कारों की बुआई की हैं निराई की है खर पतवार को उखाड़ फैंका है, कठोर जमीन को गोड गोड कर मिटी को भुरभुरा बनाया है, उसे समतल किया है उस फसल के दस बारह तैयार फल हर जगह मिल जाते हैं, आपकी प्रतीक्षा करते हैं, आपसे मिलकर अपने को धन्य समझते हैं। पहले आपने उन्हें सहारा दिया आज वे आपका सहारा बन जाते हैं। इस टीचरी की नौकरी ने तो मुझे बहुत कुछ दिया है, मेरे संपर्क सूत्र विस्तृत किए हैं, मेरे ज्ञान में वृद्धि की है। विषय समझ आ जाने पर विद्यार्थी के चेहरे पर जो तृप्ति जो संतोष देखा है, उसे देख सारे श्रम की भरपाई हो गई है। और आप पूछते हो भला मास्टरनी बन के तुम्हें मिला ही क्या। बंधी हुई सेलरी, आदर्श की हद में बंधा जीवन, सादा रहन सहन, कोई फ़ैशन नहीं, बस दिन रात अनुशासन के कठोर दायरे मैं बंधा रहना, केश विन्यास में कोई बदलाब नहीं बस सारे बालो को कस कर बांध लेना, वाणी में संयमित रहना, आवरण में हर पल सावधान रहना, आपकी हर गतिविधि कई कई जोड़ी आंखों से लगातार निगरानी की जाती है, आप किसी के रोल माडल बन रहे होते हैं तो व्यवहार में इतनी सावधानी तो अपेक्षित है ही। जितना दिया, उससे कई गुना अधिक पाया है।

                पढ़ाना मेरा पैशन है, व्यवसाय नहीं। तो हर जनम में मास्टरनी और वो भी हिंदी की मास्टरनी ही बनना चाहूंगी । प्रभु जी अगले जनम मोहे मास्टरनी ही कीजो।

No comments:

Post a Comment

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...