Sunday, September 25, 2022

शिल्पी तू जीभ बिठाता चल

 सफर जारी है .........1067

25.09.2022

शिल्पी तू जीभ बिठाता चल....... 

रामधारी सिंह दिनकर राष्ट्रीय चेतना के रचनाकार हैं । संस्कृति के चार अध्याय, कुरुक्षेत्र , रश्मि रथी, हुंकार, परशुराम की प्रतीक्षा, लोहे के पेड़ हरे होंगे, शक्ति और क्षमा और अन्य अन्य रचनाकर्मों से गुजरते, उनका अध्ययन करते यह धारणा पुष्ट होती गई कि पाठक किसी रचनाकार को पढ़ते पढ़ाते, उन्हें कंठस्थ करते उनके व्यक्तित्व के कई कई आयामों से परिचित होता जाता है। जो पूरे मन से लिखा जाता है, यदि पाठक भी उतने ही मन से उसे पढ़े, समझे, उसके भावों को ग्रहण करें तो लिखा सार्थक हो जाता है।

क्षमा सोहती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो पंक्ति को  मां के मुख से कई कई बार बहुत से संदर्भों में सुना कि क्षमा का अधिकार केवल शक्तिशाली को है। विष दंत हीन सर्प की सारी शक्ति नष्ट हो जाती है, इसलिए शक्तिशाली बनो और दूसरों को क्षमा करना सीखो। बाद में दिनकर की रचना को पढ़ाते इसे संदर्भ सहित ग्रहण किया। कर्ण के जीवन के विविध पक्षों विविध आयामों को जानना हो तो रश्मि रथी का घोटा लगाए जाना आवश्यक और अनिवार्य दोनों है। स्नातकोत्तर में दिनकर की कविताओं को जानने समझने का भरपूर मिला। शिक्षक प्रशिक्षण की वार्षिक परीक्षा के दौरान लोहे के पेड़ हरे होंगे तू गीत प्रेम के गाता चल, नम होगी ये मिट्टी ज़रूर आंसू के काम बरसाता चल को पढ़ाते पूरा मानस ही बदल गया। जब भी मौका मिलता है, इस कविता को कई कई बार दोहरा लेती हूं।कैसे एक रचना आपके जीवन में आश्चर्यजनक रुप से बदलाब ले आती है। इतनी लंबी कविता के सभी अनुच्छेद तो आज तक भी कंठस्थ नहीं हो पाए, हर बार पृष्ठों को पलटना होता है पर भाव बहुत अच्छे से समझ आ गए कि प्रेम से लोहे जैसी कठोर जमीन भी नम हो जाती है और उसमें हरे भरे पेड़ अपना विस्तार पाते हैं। इस जगत में चाहे जितनी कटुता और विषमता क्यों न हो, प्यार उन सब पर भारी पड़ता है। तब से सबको प्यार से ही गुनने और समझने में लगे हैं पर अक्सर हार जी जाए हैं। सामने वाला विनम्रता और प्यार से बोलने को कमजोरी मान लेता है और बड़े तो बड़े, छोटे और अधकचरे भी हावी होने की कोशिश में लगे रहते हैं, कोशिश में क्या लगे रहते हैं, पूरी तरह हावी हो जाते हैं,पीठ पर लद जाते हैं ओर सिर पर सवार बने रहते हैं।

फिर बार बार सोचती हूं कि इतने बड़े और स्थापित कवि ने झूठ थोड़े ही लिखा होगा कि आशा के स्वर का भार पवन को लेकिन लेना ही होगा, जीवित सपनों के लिए मार्ग मुर्दों को देना ही होगा, रंगों के सातों घट उड़ेल ये अंधियारी रंग जाएगी, जीवन को सत्य बनाने को जावक नभ पर बिखराता चल। सो इस कलुषता कुटिलता को जाबक से ही जीता जा सकता है। पढ़ लिख तो बहुत लिए पर उसे गुनना अभी बाकी है। जब जब मस्तिष्क जये होता, संसार ज्ञान से चलता है, शीतलता की है राह हृदय तू यह संवाद सुनाता चल। जैसे जैसे कविता आगे बढ़ती जाती है, जीवन का सत्य उद्घाटित होता जाता है दीपक के जलते प्राण दिवाली तभी सुहावन होती है। रोशनी जगत को देने को अपनी अस्थियां जलाता चल। सो दीपक को तो जलना ही होगा तभी रोशनी बिखरेगी। सौरभ है केवल सार उसे, तू सबके लिए जुगाता चल। आधी मनुष्यता वालो पर जैसे मुस्काता आया है वैसे अब भी मुस्काता चल। ऐसों से अटकने से क्या लाभ, उनकी नादानी पर मुस्करा कर आगे बढ़ने में ही भलाई है। जो उठे राम जो उठे कृष्ण भारत की मिट्टी रोती है तलवार मारती उन्हें बांसुरी नया जीवन देती, जीवन शक्ति के अभिमानी, यह भी कमाल दिखलाता चल।

और अंतिम पंक्तियां तो जैसे कविता का प्राण है.... धरती के भाग हरे होंगे भारती अमृत बरसाएगी दिन कि कराल दाहकता पर चांदनी सुशीतल छाएगी।ज्वालामुखियों के कंठो में कलकंठी का आसन होगा, जलदो से लदा गगन होगा, फूलो से भरा भुवन होगा। बेजान यंत्र विरचित गूंगी मूर्तियां एक दिन बोलेगी, मुंह खोल खोल सबके भीतर शिल्पी तू जीभ बिठाता चल।

तो हम सब ऐसी शिल्पी बनें , गूंगे बहरों के मुख में जीभ बिठाते चलें, सबकी आवाज बनें, सबके सहयोगी बनें। रामधारी सिंह दिनकर को याद करते उनकी स्मृति में श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।

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