सफर जारी है...1068
26.09.2022
उल्टे बास बरेली के.....
गिरा होगा कभी किसी का झुमका बरेली के बाजार में और होते होंगे उल्टे बास बरेली के, इस बरेली यात्रा ने तो अनेक नाम परिचय श्रृंखला में जोड़ दिए , साहित्यिक उपलब्धि खाते में आई सो अलग।गंगशील महाविद्यालय का विस्तृत प्रांगण, रंगोली से अंकित सभागार का फर्श, भेंट में मिला रुद्राक्ष का पौधा, भाव पुष्पों से स्नेहिल भीना स्वागत, हिंदी के भविष्य और भविष्य की हिंदी पर चिंतन विमर्श। विद्वत जनों का सान्निध्य, कुल मिलाकर ज्ञान के कोश में वृद्धि।विद्वानों के अपनी बात रखने की अलग अलग शैलियां, वक्तव्यों के नित नए ढंग कुछ ऊर्जा से लबरेज तो कुछ सूचनाओं को क्रमबद्ध तरीके से परोसने वाले , कुछ अपने अनुभवों को सबका विषय बनाने वाले तो कुछ बासी उबाऊ थकाऊ झिलाऊ नुमा। सब जानती है ये पालिक सब जानती है ये पब्लिक है सो कभी तालियां बजाकर तो कभी उबासियां ले लेकर या चेहरे के इंप्रेशन से विषय के प्रति अपनी समझ खूब खूब व्यक्त कर देती है । और इन लगातार बजती तालियों से धोखे में मत आ जाईएगा। जरा से भेद से इन तालियां के अर्थ और तेवर बदल जाते हैं कहीं ये सब कुछ समझ आने की प्रसन्नता जताती हैं तो कहीं विषय की बोरियत से हूटिंग और वहीं बात को समाप्त करने की सूचक भी होती हैं। तो मंच पर चढ़ पोडियम पर जा हाथ फैंक फैंक कर बोलने से पहले अपने आप को दुरुस्त करना बहुत ज़रूरी होता है कि विषय की मांग क्या है और क्या हमने अपनी जानकारी को अद्यतन कर लिया है, बोली जाने वाली सामग्री को क्रम से संजो लिया है, उसे मन ही मन दोहरा लिया है। सिद्ध से सिद्ध वक्ता भी अपने आप को इस रुप में तैयार अवश्य करता ही है। वह कुछ भी यूं ही प्रस्तुत नहीं कर देता है। वह भली भांति जानता है कि आज अपनी बात को एक बड़े समूह तक पहुंचाने का अवसर मिला है तो उसका पूरा पूरा लाभ ले लेना चाहिए। जब आप पूरे मन से, गंभीरता, दिल से साफ और स्पष्ट बुलंद स्वर में अपनी बात रखते हैं तो उसका असर होता ही है, सुनने वाला सोचने पर बाध्य होता ही है , कहे गए शब्दों के प्रभाव में होता अवश्य है फिर भले ही उसकी समयावधि अल्प ही क्यों न हो। तो हर बार बोलते सुनते कुछ नए तथ्य संज्ञान में ले लिए जाते हैं।
बरेली और मेरे शहर आगरा में एक समानता और है दोनों ही अपनी अन्य अन्य विशेषताओं के साथ मानसिक रोगियों के इलाज के लिए विख्यात हैं मतलब कुछ दिमागी लोचा हो तो उसे भी दूर कर दिया जाता है। लंबे समय तक को बरेली को लेकर यही धारणा बनी रही कि यहां के बाजार बड़े व्यस्त और आकर्षक रहे होंगे कि झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में जैसे प्रसिद्ध गीत की रचना हुई होगी। और तब झूमके का बहुत प्रचलन रहा होगा। पर मिश्र जी से बात करते पता चला कि यहां महाभारत काल से जुड़े, उससे संदर्भित कुछ स्थल भी हैं और राय बरैली से इतर करने के लिए बास बरेली के प्रसंग है। हर शहर अपने में कुछ विशिष्टताओं को समेटे रहता है, पर आप अपने व्यस्त प्रवास में से क्या क्या खोज पाते हो, यह आप और जिनके संपर्क में आप आए, उस पर और उससे भी अधिक आपके दृष्टिकोण पर निर्भर करता है कि अमुक अमुक शहर के विषय में आपकी जानकारी कितनी पुख्ता है।
यात्राएं तो ज्ञान ,नई नई सूचनाओ और अनुभवो का पिटारा है, बस आंख कान खुले रखिए, दृष्टिकोण सकारात्मक बनाए रखिए, हर क्षण का उपयोग कीजिए तो आपकी झोली ख़ाली नहीं रहती हैं, उल्टे हर बार कुछ नया जुड़ जाता है, अनुभव में इजाफा ही होता है बशर्ते वैसा मानस भी बना कर जाएं। अब हर छोटे बड़े कष्ट पर भुनभुनाते ही रहोगे तो कुछ नहीं हाथ लगने का। ऐसे ही थोड़े घुमक्कड़ अथातो जिज्ञासा लिखा गया होगा, कहा गया होगा सैर कर दुनिया की गाफिल जिंदगानी है कहां। तो जब जब जो जो समय मिले, जिनसे मिलने और जहां जानें का सुयोग मिले खूब जिंदादिली से उन क्षणों को जीने की कोशिश कीजिए, अच्छा बुरा जैसा भी हो, अनुभव आपको कुछ सिखा ही जाता है, आपको समृद्ध ही करता है तो जब समय हो लोगों से मिलते जुलते रहिए और अपने दायरे को विस्तृत करते रहिए।
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