Tuesday, September 13, 2022

घूरे पे गुलाल, न बाबा न

 सफ़र जारी है....1056

15.09.2022

घूरे पे गुलाल, न बाबा न.......

सबके लिए करो जरुर ,मरो ज़रूर पर जब लोग आपको यूज करने लगें तो सावधान होना बनता है। सीधे सादा होना और बेवकूफ , सिंपल और सिंपलटन होना दो अलग अलग बातें हैं। प्राणि मात्र के लिए संवेदन शील होना,सबकी सहायता के लिए सदैव तत्पर रहना, सबका हित साधना तो अच्छी बात है पर यदि अगला आपको बेवकूफ समझ आपका दुरुपयोग ही करने लग पड़े तो न केवल सावधान हो जाएं बल्कि सतर्क भी हो जाइए। जानते समझते तो आप सब है कि जो अति का सीधा होता है वह जीवन भर कष्ट उठाता है, देखो तो मीठे गन्ने को कोल्हू में पेला जाता है और कड़वी तीखी चीजों को थू थू थूका जाता है। वन में भी सट्ट सीधे पेड़ ही पहले काटे जाते हैं ,टेडे मेडे तो वैसे ही अनुपयोगी मान छोड़ दिए जाते हैं। उनके सीधे करने में, छील खुरचने में कौन वक्त बेकार करें, इन अड़ियलो के संग जितना दिमाग और समय लगाएगा, उससे आधे में तो खुद ही कर लेगा। तो दुष्टों और खलो से सब दूर रहना ही पसंद करते हैं। गोस्वामी तुलसीदास तो मानस के प्रारंभ में ही ऐसे खलो की वंदना कर लेते हैं और आगे कह भी देते हैं दुष्ट संग नहि देय विधाता, ताते भलो नरक कर बासा। कुछ उन्हें दूर से ही प्रणाम कर लेते हैं कि इनसे तो दूर की राम राम भली, कौन अटके ऐसों से, बिना बात ही दिमाग खराब करो, ऐसों की तो सुन के उका जाओ, ज़बाब ही मत दो, कान ही मत दो, अनसुना कर दो, आवाज घूंट जाओ, उनके सामने ही मत पड़ो, रास्ता बदल लो, क्या फायदा ऐसों के मुंह लगने से, चुप ही भली। तो कुछ उनके प्रति उदासीन हो जाते हैं और कुछ उन्हें ऐसे काम सौंप देते हैं जो देर सबेर पूरे हों भी तो कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता।

           जिन्हें केवल अपना स्वार्थ ही दिखता हो, जिनकी आंख में सुअर का बाल हो, उन्हें भला किसी की सज्जनता,सहृदयता,दयालुता, कर्तव्य परायणता, निष्ठा से भला क्या लेना देना। जैसे भी हो बस इनका काम बनना चाहिए, उनका स्वार्थ सिद्ध होना चाहिए फिर वे आपको दूध में से मक्खी की तरह निकाल फेंकेंगे, उनके जाने आप भाड़ में जाओ, चूल्हे में जाओ, उन्हें आपसे क्या लेना देना। लेना देना तो केवल तब तक था जब तक आपसे उनका काम सध रहा था, मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं, अब यूं जा रहे हैं कि हमें जानते नहीं। इन जैसों का तो वही डौर है कि अपना काम बनता, फिर भाड़ में जाए जनता। अब आपको यदि ऐसों कृतघ्नो पर बहुत लाड आ रहा है तो आप अपने को प्रस्तुत करते रहिए, उनकी बला से। वहां उड़द पे सफेदी भी नहीं आयेगी चाहे आप कर कर के मर ही क्यों न जाओ। वो तो मरने की खबर सुन ये और कह देंगे कि अरे ये काम और निबटा जाता तभी मर लेता यानी उनके काम पूरे होने से पहले आप मर भी नहीं सकते।आप को ज्यादा ही पिदने का शौक है तो धा पा के लगे रहो, चला नहीं जा रहा हो तो भी लंगड़ाते लंगड़ाते गर्म नर्म रोटी परस के खूब खिलाए जाओ, कोई मना भला क्यों करेगा। शरीर तुम्हारा, तुम्हें ही चिन्ता नहीं है, तुम्हें ही अपनी परवाह नहीं तो दूसरा क्या करेगा। देखो भाई जब तुम नहीं रहोगे तो भी सब काम होंगे, सब वैसी आदत डाल लेंगे तो तुम्हारे करने से सब बदला नहीं जा रहा और हट जाने से आसमान गिरा नहीं जा रहा। तो जितना बस का हो, जितना कर सको खूब कर दो। मन भा रहा है तो करो। किसी दवाब में मत करो। और  मुफ़्त की सेवा भला किसे बुरी लगती है। मुफ्त का चंदन, घिस मेरे नंदन। सो आपके पास जरूरत से ज्यादा है, और भरपूर है तो खूब बांटो, तुम्हारे हाथ पैर में दम हो तो खूब करो।दोनों हाथ उलीचिए यही सयानो काम। 

           करने की दिली इच्छा हो और भलेमानस बनने का रोग लगा हो तो आदमी स्वेच्छा से जान हथेली पर रखकर  सेवा के क्षेत्र में निकल जाता है, फिर किनने क्या कही, उसे परवाह नहीं होती। आप सोच लेते हो  उनका किया उनके साथ है और मेरा मेरे साथ। जैसी करनी वैसी भरनी , बोया पेड़ बबूल का आम कहां से हो, जो जैसा करेगा वैसा भरेगा, जैसा बोओगे वैसा काटोगे,सूधे का सदा भला बरगी बातें बोल बोल कर अपने को तसल्ली देते रहते हो। ये बातें कहने  सुनने में बहुत अच्छी लगती है पर व्यवहार में लाने में बड़ा कठिन होता है । आखिर तो आप मनुष्य ही हैं, आप में भी भावनाओ का अथाह सागर हिलोर लेता है , बुरा भला आपको भी लगता होगा, ठगे जाने का दुख भी मनाते होंगे, उन क्षणों को कोसते भी होंगे कि जब आप ऐसों के चंगुल में पड़ गए। तो जब महसूस होने लगे कि आपके करने का कोई मतलब नहीं है, यहां सब धान बाईस पसेरी गिने जाते हैं तो घूरे पर गुलाल डालना बंद करो। भरे पेटो में ठूंसने का कोई फायदा नहीं। अपात्र को देना देने का अपमान है। जिसके लिए दिन रात मगज मारी कर रहे हो, उस पर कोई असर नहीं, घर की मुर्गी दाल बराबर है। तुम तो लुटा लुटा के खाली हुए जाओ और उनकी आंखों के तर ही न आबे तो कया जरूरत है खुद को खोखला करने की। किसी को उतना ही देना चाहिए जितने की उसे जरूरत है। जरूरत से अधिक तो वैसे भी इधर उधर लुढ़क जाता है। तो करो ज़रूर पर घूरे पे गुलाल डालने की कोई जरूरत नाय। हमने तो कान में ऐंठा दे लयो, न बाबा न , हमें तो कर्रे वाले हाथ लग गए , तिहाई मज्जी डालो तो खूब डालबो करो।

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