सफर जारी है.....1078
30.09.2022
सफलता के मायने.......
आख़िर इतनी भागादौड़ी है किसलिए, चाहिए क्या, मंजिल कहां है हमारी, कौन सा स्थाई सुख है जिसके पीछे भाग भाग के बेहाल हुए जा रहे हैं? जब सब के सुख की परिभाषा अलग है तो सबकी मंजिल भी अलग अलग होगी तो दूसरों की देखा दाखी ये हबड़ तबड किस लिए। जानते तो है कि कोई भी खुशी, कोई भी सुख सदैव रहने वाला नहीं है, जब तक वस्तु हाथ नहीं आ जाती, तब तक की बैचेनी भर है, और जैसे ही वह हस्तगत हो जाती है, मन कुछ और चाहने लगता है। मन की क्या, इसकी चाह तो कभी पूरी नहीं होती। जब सुख मिले तो उसके सदा बने रहने के लिए चिंता करता है और जो दुख में हो तो उससे छुटकारे के लिए बैचेन रहता है। दोनों ही स्थितियों में समत्व का भाव अभी तक विकसित ही नहीं हुआ। बस एक अजब सी बैचेनी में जी रहे हैं हम सब।
याद आती है पुन: मूषक भव: की कथा जिसमें मुनि अपने योग बल से चूहे को शेर बना देते हैं पर उसकी लगातार बढ़ती कामनाओं के कारण उसे पुन: मूल रुप में ले आते हैं। उस मछुआरिन का प्रसंग भी ताजा हो जाता है जो देवी मछली से लगातार वरदान मांगते प्रकृति को भी अपनी इच्छा से चलाने की मांग रख देती है और देवी मछली उसे ये वरदान नहीं दे पाती और उसे पहले रूप में रहने का शाप दे देती है। देवी देवता भी क्या करें उनके पास देने के लिए वरदान और शाप ही हुआ करते हैं। हम भी तो उतने उतावले हैं कि अपनी जिद में आ के कबीर को याद नहीं रख पाते कि साई इतना दीजिए जामें कूटुम समाय, मैं भी भूखा न रहूं साधु न भूखा जाय। अपने और अपने परिवार का पेट भर जाए और अतिथि अभ्यागत का भी पान फूल से स्वागत कर सकें, इतना मिले तो बहुत है। पर सुरसा की तरह मुंह फैलाती असीमित इच्छाएं इतने से कहां तृप्त होती हैं भला। उन्हें तो और और का रोग जो लगा हुआ है। जो पास है उसका उपभोग कर पाए अथवा न कर पाए, पर और भरने और लादने का शौक कभी पूरा नहीं होता।
जो ईश्वर ने दिया, वह काफी है, उसने तो वह सब भी दिया जिसके संभवत हम पात्र भी नहीं थे फिर भी बराबर असंतोषी बने रहते हैं। रहने के लिए सिर पर पक्की छत है, पांवों के नीचे ठोस जमीन है, दो टाइम पेट भरने का जुगाड है, परिवार है, बोलने बतराने को आत्मीय स्वजन हैं, मित्र हैं, बैंक खाते में शून्य की बढ़ती संख्याएं हैं, स्वस्थ शरीर की नेमत भगवान् ने दी है। छोटी मोटी सीजनल बीमारियों को छोड़ दें, तनाव और दवाब से मुक्त हो लें, दिनचर्या ठीक कर लें, आलस को छोड़ दें तो ये शुगर बीपी भी नियमित हो जाएं। पर नहीं हम तो इतने कृतघ्न हैं कि ईश्वर ने जो दिया उसका अहसान मान शुक्रगुजार नहीं होते, बस शिकायतों का पुछल्ला लगाए रहते हैं। आंख से ठीक ठीक दिखता है, कान सुनते हैं, बोल सकते हो, चल फिर सकते हो, हाथ काम करने के योग्य है, कोई अंग भंग नहीं , किसी के आगे हाथ पसारने की नौबत नहीं आती तो इससे बड़ा सुख और भला और क्या होगा पर नहीं, हमें तो झींकने रोने बिसूरने की आदत है, अपनी थाली का भात नहीं रूचता, बस दूसरे की थाली का भात मीठा लगता है। हममें संतोष रहा ही कहां, हमारे मन इतने अशांत और बैचेन हैं कि जो पास है, ईश्वर ने जो सौगात हमें दीहै, वह नज़र तर आती ही नहीं। बस मार हाय तौबा में लगे रहते हैं।
दो घड़ी शान्त बैठ कर सोचो तो सही कि आख़िर चाहिए क्या, इच्छाएं और कामनाएं तो असीमित हुआ करती हैं, इनकी पूर्ति कभी नहीं हुआ करती है। ये तो पेट भर जाने के बाद भी स्वाद के कारण कुछ और खाने की बलबती इच्छा है जिसके पूरा होने से नुकसान ही नुकसान है। तो जो पास है, जितना मिला है उसमें सुख तलाशना सीखो, बहुत दिया है भगवान् ने, उसका सुकाराना मनाओ। जीवन को और बेहतर बनाने की खूब कोशिश करो। साधनों से ही सब कुछ नहीं हुआ करता, जो पास है उसके सही उपयोग से भी ज़िंदगी बेहतर होती है। जरा अपने पास इकठ्ठे किए ढेर को कभी देखो तो सही, कितनी कितनी वस्तुएं ऐसी हैं जिनका कभी उपयोग ही नहीं हुआ फिर भी क्या कभी जरूरत पड़ जाए तो रख लेते हैं के भाव से जोड़ी वस्तुएं केबल जगह घेरती हैं, अस्त व्यस्त रखती हैं, तो उस कबाड़े को निकाल फेंको न। जितने अल्प साधनों और सुविधाओं में जीना आ जाएं , जीवन जितना सरल और सादा हो आप उतने ही सुलझे हुए होते हैं। बिना बात का बोझ क्यों लादे भला। खान पान पहनावे, आचार विचार के साथ मन से भी सरल और पवित्र बने रहिए, जलेबी की तरह गोल गोल उलझने की जरूरत नहीं। जितना लादोगे उतना उलझोगे। तो यथा संभव ज़िंदगी को सरल भाव से जीएं। अपनी मंजिल तय करें, आपको चाहिए क्या इसे स्पष्ट समझ लें, बस ज़िंदगी बहुत आसान हो जाएगी।
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