Monday, October 3, 2022

चले चलो बढे चलो

 सफर जारी है......1079

01.10.2022

चले चलो बढे चलो......

सांझ ढले सब घर लौटते हैं, रात्रि विश्राम करते हैं ओर फिर सुबह उठकर अपने अपने काम पर चल देते हैं। एक स्वस्थ व्यक्ति हमेशा काम करना चाहता ही है । उसे कुछ किए बिना चैन ही नहीं पड़ता, पड़ना भी नहीं चाहिए, जहां रुके, वहां सड़े। रुका हुआ तो पानी भी बदबू देने लगता है। बहता पानी और रमता जोगी की अवधारणा इसीलिए रही होगी। इन सबके मध्य आलसियों की एक लंबी फौज भी तैयार होती है जो अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम, दास मलूका कह गए सबके दाता राम पंक्ति को कस कर पकड़ कर बैठे हैं, उन्होंने इसे ही मूल मंत्र बना लिया है। न वे काम करते हैं और न करने देते हैं। कभी दवाब में करना ही पड जाए तो बेमन से करते कम बिखेरते अधिक है। ऐसी स्थिति पैदा कर देते हैं कि अगला सोचे जितनी देर में इससे बार बार करने के लिए कहो, मार माथा पच्ची करो, उतनी देर में तो खुद नहीं कर लो। करने की अपेक्षा कराना, सीखने की अपेक्षा सिखाना, पढ़ने की अपेक्षा दूसरे को पढ़ने के लिए तैयार करना शुरू से ही अधिक श्रम की मांग करता है।

            विद्यार्थी बन कर जिज्ञासु भाव से कठिन से कठिन विषय को सीखा अवश्य जा सकता है पर उसे दूसरों तक उसी रूप में पहुंचा देना कैसा आपने ग्रहण किया, अतिरिक्त श्रम की मांग करता है। न करता होता तो अध्यापक बनने के लिए लंबे और कठिन शिक्षण प्रशिक्षण की व्यवस्था क्यों रखी होती। प्रशिक्षण केवल विषय भर जा ही नहीं होता, ये आपके पूरे व्यक्तित्व को बदल कर रख देता है। आपके अंदर धैर्य और सहन शक्ति विकसित करता है, गलत को सुधारने की आदत डाल देता है, आपको कक्षा में प्रवेश पूर्व की तैयारियों से अवगत कराता है। विद्यार्थियों के मानस को समझने योग्य बनाता है। यदि कक्षा में बैठा हर विद्यार्थी सीखने और पढ़ने के लिए आया है, बैठा है तो अध्यापक भी वहां कुछ नया सिखाने, पिछले सीखे ज्ञान को दोहरवाने, उनके अनुभव में कुछ नया जोड़ने ही जाता है। जिस दिन आप बिना तैयारी के कक्षा में जाते हैं, आप सच में पढ़ाते नहीं, इधर उधर की बात कर घंटा बजने की प्रतीक्षा करते हैं कि ये समय जल्दी ही बीते। सीखने को उत्सुक विद्यार्थी के चेहरे मायूस हो जाते हैं, उसकी रूचि कम हो जाती है और उसका उत्साह ठंडा पड़ जाता है। केवल एक दिन की शिथिलता का ये प्रभाव होता है तो सोचो जो अध्यापक रोज ही खाली हाथ खाली दिमाग़ कक्षा में जाते हों तो भला किस की रूचि पढ़ते में रहेगी।विद्यार्थी  का मानस तैयार करना भी एक कला है। इसीलिए कक्षा शिक्षण में प्रस्तावना ज़रूरी होती है जिसे पूर्व ज्ञान से जोड़ा जाता है। पढ़ाना ये थोड़े ही न है कि कक्षा में गए और धड़ धड़ धड़ ताबड़तोड़ गोलियां दाग दी, ख़ुद खाली हो गए और चल दिए। अरे जो परोसा उसे प्यार और भाव से परोसा या नहीं, दूसरे ने उसे ग्रहण किया या नहीं, पता चला उसके लिए तो सब इतना अधिक गरिष्ठ था कि उसे कुछ पचा ही नहीं, आपके प्रहार इतने धड़ाधड़ थे कि उसके कान में कुछ गया जी नहीं। आपकी दृष्टि से पाठ्यक्रम पूरा हो गया, पूरी रामायण समाप्त हो गईं और अगले को पता ही नहीं चला कि राम रावण द कौन। तो ऐसा शिक्षण आपको संतोष भले दे दे पर विद्यार्थियों के किसी काम का नहीं होता।

            आप भी हद करते हो।अरे भलेमानस,जब किसी को भोजन तक कराते हो तो कितने मन से उसकी रूचि कस भोजन बनाते हो रूचि के साथ साथ ये भी ध्यान रखते हो कि उसके लिए क्या पौष्टिक है, उसे क्या हजम हो जायेगा, फिर थाली परोसते खाद्य पदार्थ ही नहीं परोसते उसके साथ प्रेम का दुलार का छौंक भी लगा देते हो, फिर अगला जब तक भोजन समाप्त नहीं कर लेता, उसके आसपास ही बने रहते हो, ज्याड़ा भाव उमड़े तो पंखा झलते रहते हो, थाली में कुछ कम हो तो तुरंत परोस देते हो और जब वह भरपेट खा प्रसन्न भाव से चला जाता है तब चैन की सांस लेते हो। पढ़ाना सिखाना भी कुछ कुछ ऐसा ही है। पात्र के अनुकूल विषय की तैयारी फिर उसे उतनी ही संजीदगी से प्रस्तुत करना, जब तक सामने वाले के चेहरे पर समझ आने का संतोष का भाव न दिख जाए बार बार इस उस तरीके से सिखाते बताते रहना और जब अगले को सब कुछ समझ आ जाए तो सन्तोष की सांस लेना सही और सच्चा शिक्षण है।

            तो मित्रो सिखाया ताभी जा सकता है जब स्वयं को सब क्रिस्टल क्लीयर हो, जो समझाना है उसमें पानी की तरह पारदर्शिता हो, खुद को विषय अच्छी तरह स्पष्ट हो, और उसके लिए रटना नहीं, समझना होता है। लगातार पढ़ना होता है, जानकारी को अद्यतन करना होता हेयर। विद्यार्थी तो पका पकाया चाहते ही हैं, उन्हें तो स्पून फीडिंग की आदत होती है, वे आपसे यही चाहेंगे कि बस आप नोट्स डिक्टेट करा दें, संभव हो तो वही उनको उपलब्ध करा दें, वे फोटो कापी कर आपस में बांट लेंगे, उसे रट रटा कर उत्तर पुस्तिका में लिख परीक्षा भी पास कर लेंगे फिर कक्षा में पढ़ाने की डिग्री भी ले लेंगे पर जो खुद ही नहीं समझे वे दूसरों को क्या दे पाएंगे। तो सिखाने वाली पंक्ति में शामिल हो तो लगातार चलो, चलते चलो, थके हो तो विश्राम करो और आगे बढ जाओ। यही तुम्हारी तपस्या है। भविष्य के निर्माण की जिम्मेदारी तो तुम्हारे कंधों पर है, तुम शिथिल कैसे हो सकते हो भला, गफलत में पड़े रहना तुम्हें शोभा नहीं देता। कैसी बे ते की भाषा बोलते हो। सुधारो अपने को, कर्मठ बनो, तुम्हारी छोटी सी छोटी बात पर सबकी दृष्टि केंद्रित है, तुम ही भटक जाओगे तो भटके भविष्य को क्या राह दिखाओगे। तो तुम्हारा सुधरना ज्यादा ज़रूरी है, अपने को रोज मांजना तराशना ज़रूरी है। तुम तो दुनिया को सिखाने वाले हो, ज्ञान देने वाले हो, तुम्हें ढीले पीले होना शोभा नहीं देता। तुम कमर कसे रहो, चलते चलो, बढ़ते चलो। चलना ही ज़िंदगी है रुकना है मौत तेरी, ए ज़िंदगी के राही किस बात की है देरी।

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