Tuesday, July 19, 2022

जो सापेक्ष हो वह सत्य कैसा

 सफर जारी है...924

02.05.2022

 अक्सर सोचती हूँ कि आखिर सच की परिभाषा है क्या, न्याय किसे कहते हैं, योग्यता अयोग्यता का क्या पैमाना है।जो बात एक संदर्भ में ठीक होती है, वह संदर्भ बदलते ही गलत कैसे हो जाती है।संवेदना है तो जीव मात्र के लिए होनी चाहिए, पर उसमें भी अपने पराये का भेद कहां से आ जाता है ।अपना काला कलूटा तीन फुटी भी दुनिया का सबसे स्मार्ट बन्दा लगता है तो जिसे दूसरा कहते हैं उसके गोरे रंग और छह फुटे शरीर को भी नजर अंदाज क्यों कर दिया जाता है।अपनों के घेरे में आने वाले के सौ खून भी माफ और इस घेरे से बाहर के व्यक्ति की सामान्य सी भूल भी तिल का ताड़ कैसे बना ली जाती है।अपनों की आंख में झलकते पानी की चंद बूंदें भी संज्ञान में आ जाती हैं तो अगले के झर झर बहते आंसुओं को नौटंकी कैसे कह दिया जाता है।कैसे एक के चेहरे की हल्की सी मलिनता नोटिस ले ली जाती है तो अगले का ह्रदय विदीर्ण कर देने वाला रोदन भी कैसे अनसुना कर दिया जाता है।एक की धीमी सी फुसफुसाहट भी समझ आ जाती है तो दूसरे के स्पष्ट कथन भी क्यों नजर अंदाज कर दिए जाते हैं।

 ये अपने तुपने का घेरा दिन प्रतिदिन संकीर्ण होता जा रहा है।बातें भले ही वसुधैव कुटुम्बकम की दोहराई जाती रहें पर सत्य और असत्य को परिभाषित करते हमारा सरोकार केवल और केवल अपने पराये के भेद पर आधारित होता है।इन अपनों की भी अनेक अनेक श्रेणियां है।ये थोड़ा सा अपना है ये वाला ज्यादा अपना है।ये पहले घेरे में आता है तुम अंतिम वाले में।रक्त सम्बन्ध सिर चढ़ कर बोलता है या घुटने तो भैया पेट को ही नवते हैं तो इस न्याय के अनुसार सबके घुटने पेट को ही नवने चाहिए, इस पर कोई आपत्ति और सवाल भी नहीं उठाए जाने चाहिए पर ऐसा होता कब है।जो जो अपनों के लिए सच और न्याय पूर्ण होता है वह दूसरों के लिए कैसे बदल जाता है।अब बेटा बेटी तो एक भाव हैं, हर माता पिता को अपने बेटा बेटी में दुनिया भर की अच्छाई नजर आती ही है, उसके दोषों पर दृष्टि जाने का रेखांकित करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।पर जैसे ही ये सन्दर्भ बदल ते हैं हमारे सोच की दिशा भी बदल जाती है, शक की सुईं दूसरे कहे जाने वाले पर चली जाती है, हमारे सोचने का ढंग ही बदल जाता है, हम तटस्थ नहीं रह पाते ।शायद तभी नीर क्षीर विवेकी न्यायाधीश की व्यवस्था की जाती है, सरपंच के रूप में अलगू जैसे पंच चुने जाते हैं जो सारी मित्रता को परे रख जो उचित है वही कहते हैं, इसमें मेरा तेरा नहीं देखते।यदि गलत है तो गलत है।रानी वरुणा के अपने सुख के लिए गरीबों की झोंपड़ी जलाने पर राजा न्याय सुना देते हैं कि जब तक रानी अपने स्वयम के श्रम से कमाई से गरीबों की झोपड़ी नहीं बनबा देती उनका महल में प्रवेश वर्जित है।

 तो न्याय की परिभाषा अपने परायों के मध्य नहीं रची जा सकती कि जो मेरा है वह सब सच और जो दूसरे का है वह सौ प्रतिशत, सोलह आने गलत, इसमें कोई शक सुभा की गुंजायश ही नहीं।अपने ने कहा है तो उसे आंख मूंद कर स्वीकार कर लो और अपने की सीमा रेखा से घेरे से बाहर का हो उसे भाड़ में जाने दो, धूल डालो ससुरे पर, हमें क्या लेना देना, मेरा तो हो गया न, अब तेली की तीनों मरे और ऊपर से टूट टे लाट, हमें क्या लेना देना हमारा तो हो गया न, ऐसे सबके लिए सोचते रहे तो पड़ गया पूरा।खजाना नहीं खाला हो जाएगा, फिर हम क्या ठनठन गोपाल बन कर नहीं बैठे रहेंगे।ये सूमता अर्थ की ही नहीं, भाव की भी है आखिर हम दूसरों के लिए क्यों सोचे, अभी तो हम अपनों से ही निबट पाए और तुम और पाँय पो रहे हो।अरे भाई घर में दीया जला कर ही चौराहे पर जलाया जाता है।घर फूंक तमाशा क्यों देखे भला।हमें कोई कबीर नहीं बनना,तुलसी कहते होंगे काहू की बेटी सों बेटा न ब्याहब और मांग के खायबो मसीत को सोइबो उनका सिद्धांत होगा, हम तो अपने के दायरे में ही खुश है।हम तो छोटी बुद्धि के ही भले, हमें नहीं बनना उदार चेता, हमें क्या लेना देना विश्वमय और ईशमय से।बस हम तो येन केन प्रकारेण अपनों की रक्षा करते रहें, उनके रक्षा कवच बने रहें इतना ही बहुत है जी।अब तुम्हें सोचने का रोग है तो सोचते रहो,तुम्हारी मर्जी।तो दुनिया सदैव से ऐसे ही चलती है ऐसे ही चलती रहेगी।वशुधैव कुटुम्बकम की बड़ी बातें नोटिस बोर्डों पर बोल्ड अक्षरों में चस्पा कर जरूर दी जाएंगी, पर हम तो ऐसे ही चलेंगे।न बदले थे न बदलेंगे।केवल अपना स्वार्थ देखेंगे।बोलेंगे भी तो उतना ही बोलेंगे जिससे हमारा काम सधता हो।न हम सुधरे हैं न सुधरेंगे।सत्य सदा से  सापेक्ष ही हुआ करता है, वह निरपेक्ष हो ही नहीं सकता।अब तुम्हें अपनी मटर अलग भुनाने हो तो तुम्हारी मर्जी, अकेले बैठे अपनी नई मनु स्मृति लिखते रहो, किसने रोका है और कौन रोक सकता है भला।

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