सफर जारी है....889
28.03.2022
महादेवी गरीयसी महीयसी हैं, आधुनिक युग की मीरा कही जाती हैं, छायावाद के स्तम्भ की मजबूत कड़ी है, उनके संस्मरण उनकी संवेदनशीलता और अपनत्व के आईने हैं, वे कविता लिखती हैं, गद्य लिखती हैं, संस्मरण लिखती है पर जब परिचय की बात आती है तो लाज शर्म से सिकुड़ कर बस इतना ही कह देती है विस्तृत नभ का कोई कोना, मेरा न कहीं अपना होना, परिचय इतना इतिहास यही, उमड़ी कल थी मिट आज चली।
सच में महनीय लोग इतने ही विनम्र होते हैं कि वे अपने गुणों को कभी प्रकाशित नहीं करते, अपने विषय में कभी डींग नहीं हांकते।उनकी खुशबू तो स्वयम ही उड़ उड़ कर चारों ओर बिखर जाती है।रहिमन हीरा कब कहे लाख टका मेरो मोल।हीरे की परख जौहरी ही कर पाता है।और फिर हीरा कौन दुकानों में सज के बिकता है। वह तो खदानों में खानों में मिट्टी के नीचे दबा कुचला पड़ा रहता है ,टेढा मेढ़ा सा।कितनो को तो वह हीरा सा लगता ही नहीं।अब हीरा तो हीरा है, उसे तो तराशना होता है, खोजना होता है और जब तराशा जाकर किसी आभूषण में नग बन जड़ जाता है तो बस इतना जगमगाता है ,इतना दिपदिपाता है कि आंखें चुंधिया जाती है।समंदर के किनारे किनारे चलने वालों को मोती भला कब मिला करता है, वह तो उनके हाथ ही लगता है जो गहरे जाते हैं।जिन खोजा तिन पाईया गहरे पानी पैठि, हों बौडी ढूढन गई रही किनारे पैठ।महादेवी को जानना है तो उनकी रचनाओं के सागर में गहरे डूबना होता है।दसवीं कक्षा में उनकी शैली याद करते बस जीवन परिचय और रचनाएं ही रटा करते थे।भाषा शैली और संवेदना से परिचय तो तब हुआ जब स्मृति की रेखाएं पढा, गौरा, गिल्लू ,घीसा को पढा, अतीत के चलचित्र पढा, सोनजुही को पढा।जिन महिला अधिकारों और स्वतंत्रता की बातें आज की पीढ़ी करती है और स्वच्छंदता को ही स्वतंत्रताका पर्याय मानती हैं,उन्हें तो वे कब का प्राप्त कर चुकी थीं।वे सिखाती है अधिकार मांगे नहीं जाते, उन्हें तो लिया जाता है।वस्त्रों की स्वतंत्रता से विचारों की स्वतंत्रता घोषित नहीं होती।वे सीधे पल्ले की साड़ी पहने सिर पर आँचल लिए ही महिला विद्यापीठ की स्वामिनी बन जाती हैं,खुद तो आगे आती ही हैं,सुभद्रा जैसी मित्रों को भी आगे लाने के लिए दृढ़ संकल्पित होती है, कितनी कितनी लड़कियों के लिए शिक्षा का द्वार खोल देती हैं।स्वभाव से बेहद सरल हैं ।राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद से मिलने जाती हैं तो रेलगाड़ी में सूप साथ धर ले जाती हैं।उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई क्या कहेगा।
ऐसा पारदर्शी मन है उनका जो सब कह देता है ।अंदर कुछ नहीं रखता।राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद जी के पास पहुंचती है और भोजन के समय जब पता चलता है कि आज तो उनका एकादशी उपवास है तो महादेवी मन ही मन सोच लेती हैं कि बस आज तो आनन्द आ गया, खूब फलाहार, मिठाई, दूध, दही की दावत मिलेगी पर उन्हें आश्चर्य होता है जब इतने उच्च पद पर आसीन व्यक्ति को अर्धांगिनी सहित जमीन पर बैठ उबले आलू से व्रत का पारण करते देखती हैं।वे भी सुखपूर्वक वही खाती है और एक पाठ सीख लेती हैं कि बड़े होना सरल और सह्रदय होना है।दर्प विहीन होना है।वे इतनी सह्रदय हो पाती हैं क्योंकि उनके परिवेश में सब संवेदनशील ही हैं।
आम व्यक्ति को यदि वैवाहिक जीवन में अपेक्षित नहीं मिलता तो वे टूट जाते हैं, निराश हो जाते हैं, डिप्रेशन में चले जाते हैं या बहुत ही एग्रेसिव हो जाते हैं और सब कुछ तहस नहस कर देते हैं पर महादेवी ऐसा कुछ भी नहीं करतीं, बाल विवाह होता है उनका, गृहस्थी नहीं बस पाती ।वे कोई हायतोबा नहीं करती, कोई केस नहीं ठोकती,बस शांति से अपने को रचनात्मक कार्य में लगा देती हैं।अपने दुख को भुला जगत के दुख दूर करने में स्वयम को झौंक देती हैं।मैं नीर भरी दुख की बदली में उन अकेले के दुख की बात नहीं है। स्पंदन में चिर निस्पंद बसा, क्रंदन में आहत विश्व हंसा, नयनोँ में दीपक से जलते, पलकों में निर्झरणी मचली, मैं नीर भरी दुख की बदली।
वे साहित्याकाश में द्युतिमान नक्षत्र हैं।हम स्त्रियों के लिए प्रेरणा हैं।हमारी आदर्श हैं।उन के कद तक पहुंचने के लिए तो ढेरो ढेरो मंजिल पार करनी होती हैं।इतना बूता सबका कहां हो पाता है।हां,वे आपकी पसंदीदा साहित्यकार हों, आपके मन में रची बसी हों, उनकी रचनाओं को पढ़ते आप उन्हें अनुभूत कर पाते हों तो यही बड़ी उपलब्धि होगी।महादेवी महा देवी ही हैं, उनकी अष्टभुजा भले से न दिखती हों पर उनके साहित्य की व्यापकता उन्हें वाकई देवी के पर आसीन कर देती है।