Thursday, May 19, 2022

परिचय इतना इतिहास यही

 सफर जारी है....889

28.03.2022

महादेवी गरीयसी महीयसी हैं, आधुनिक युग की मीरा कही जाती हैं, छायावाद के स्तम्भ की मजबूत कड़ी है, उनके संस्मरण उनकी संवेदनशीलता और अपनत्व के आईने हैं, वे कविता लिखती हैं, गद्य लिखती हैं, संस्मरण लिखती है पर जब परिचय की बात आती है तो लाज शर्म से सिकुड़ कर बस इतना ही कह देती है विस्तृत नभ का कोई कोना, मेरा न कहीं अपना होना, परिचय इतना इतिहास यही, उमड़ी कल थी मिट आज चली।

सच में महनीय लोग इतने ही विनम्र होते हैं कि वे अपने गुणों को कभी प्रकाशित नहीं करते, अपने विषय में कभी डींग नहीं हांकते।उनकी खुशबू तो स्वयम ही उड़ उड़ कर चारों ओर बिखर जाती है।रहिमन हीरा कब कहे लाख टका मेरो मोल।हीरे की परख जौहरी ही कर पाता है।और फिर हीरा कौन दुकानों में सज के बिकता है। वह तो खदानों में खानों में मिट्टी के नीचे दबा कुचला पड़ा रहता है ,टेढा मेढ़ा सा।कितनो को तो वह हीरा सा लगता ही नहीं।अब हीरा तो हीरा है, उसे तो तराशना होता है, खोजना होता है और जब तराशा जाकर किसी आभूषण में नग बन जड़ जाता है तो बस इतना जगमगाता है ,इतना दिपदिपाता है कि आंखें चुंधिया जाती है।समंदर के किनारे किनारे चलने वालों को मोती भला कब मिला करता है, वह तो उनके हाथ ही लगता है जो गहरे जाते हैं।जिन खोजा तिन पाईया गहरे पानी पैठि, हों बौडी ढूढन गई रही किनारे पैठ।महादेवी को जानना है तो उनकी रचनाओं के सागर में गहरे डूबना होता है।दसवीं कक्षा में उनकी शैली याद करते बस जीवन परिचय और रचनाएं ही रटा करते थे।भाषा शैली और संवेदना से परिचय तो तब हुआ जब स्मृति की रेखाएं पढा, गौरा, गिल्लू ,घीसा को पढा, अतीत के चलचित्र पढा, सोनजुही को पढा।जिन महिला अधिकारों और स्वतंत्रता की बातें आज की पीढ़ी करती है और स्वच्छंदता को ही स्वतंत्रताका पर्याय मानती हैं,उन्हें तो वे कब का प्राप्त कर चुकी थीं।वे सिखाती है अधिकार मांगे नहीं जाते, उन्हें तो लिया जाता है।वस्त्रों की स्वतंत्रता से विचारों की स्वतंत्रता घोषित नहीं होती।वे सीधे पल्ले की साड़ी पहने सिर पर आँचल लिए ही महिला विद्यापीठ की स्वामिनी बन जाती हैं,खुद तो आगे आती ही हैं,सुभद्रा जैसी मित्रों को भी आगे लाने के लिए दृढ़ संकल्पित होती है, कितनी कितनी लड़कियों के लिए शिक्षा का द्वार खोल देती हैं।स्वभाव से बेहद सरल हैं ।राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद से मिलने जाती हैं तो रेलगाड़ी में सूप साथ धर ले जाती हैं।उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई क्या कहेगा।

ऐसा पारदर्शी मन है उनका जो सब कह देता है ।अंदर कुछ नहीं रखता।राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद जी के पास पहुंचती है और भोजन के समय जब पता चलता है कि आज तो उनका एकादशी उपवास है तो महादेवी मन ही मन सोच लेती हैं कि बस आज तो आनन्द आ गया, खूब फलाहार, मिठाई, दूध, दही की दावत मिलेगी पर उन्हें आश्चर्य होता है जब इतने उच्च पद पर आसीन व्यक्ति को अर्धांगिनी सहित जमीन पर बैठ उबले आलू से व्रत का पारण करते देखती हैं।वे भी सुखपूर्वक वही खाती है और एक पाठ सीख लेती हैं कि बड़े होना सरल और सह्रदय होना है।दर्प विहीन होना है।वे इतनी सह्रदय हो पाती हैं क्योंकि उनके परिवेश में सब संवेदनशील ही हैं।

आम व्यक्ति को यदि वैवाहिक जीवन में अपेक्षित नहीं मिलता तो वे टूट जाते हैं, निराश हो जाते हैं, डिप्रेशन में चले जाते हैं या बहुत ही एग्रेसिव हो जाते हैं और सब कुछ तहस नहस कर देते हैं पर महादेवी ऐसा कुछ भी नहीं करतीं, बाल विवाह होता है उनका, गृहस्थी नहीं बस पाती ।वे कोई हायतोबा नहीं करती, कोई केस नहीं ठोकती,बस शांति से अपने को रचनात्मक कार्य में लगा देती हैं।अपने दुख को भुला जगत के दुख दूर करने में स्वयम को झौंक देती हैं।मैं नीर भरी दुख की बदली में उन अकेले के दुख की बात नहीं है। स्पंदन में चिर निस्पंद बसा, क्रंदन में आहत विश्व हंसा, नयनोँ में दीपक से जलते, पलकों में निर्झरणी मचली, मैं नीर भरी दुख की बदली।

वे साहित्याकाश में द्युतिमान नक्षत्र हैं।हम स्त्रियों के लिए प्रेरणा हैं।हमारी आदर्श हैं।उन के कद तक पहुंचने के लिए तो ढेरो ढेरो मंजिल पार करनी होती हैं।इतना बूता सबका कहां हो पाता है।हां,वे आपकी पसंदीदा साहित्यकार हों, आपके मन में रची बसी हों, उनकी रचनाओं को पढ़ते आप उन्हें अनुभूत कर पाते हों तो यही बड़ी उपलब्धि होगी।महादेवी महा देवी ही हैं, उनकी अष्टभुजा भले से न दिखती हों पर उनके साहित्य की व्यापकता उन्हें वाकई देवी के पर आसीन कर देती है।

का करि सकत कुसंग

 सफर जारी है

24.03.2022

सत्संगति किम न करोति पुनसाम, बड़ी महिमा गाई गई है सत्संगति की।सज्जन पुरुषों का साथ ही सत्संगति है और सज्जन पुरुषों का अर्थ भी बता दिया गया कि जिसे देख आपकी बांछे खिल जाए वे होते हैं संत।बड़े भाग तब जानिए जब मिलने आबे सन्त, सन्तन को मिलनो करे सब दुखन को अंत।सन्त हिरदय नवनीत समाना जो पराये दुख से भी द्रवित हो जाता है।परोपकाराय सतां विभूतय:।फिर सन्तो के लक्षण भी गिना दिए गए कि वृच्छ कबहू नहि फल भखे नदी न सन्चे नीर, परमारथ के कारने साधुन धरा शरीर।चित्त प्रसन्न हो जाता है, बुद्धि की जड़ता दूर होती है,वाणी में सत्य का संचार होता है पाप दूर होता है,और भी जाने क्या क्या संतों के मिलने से सम्भव हो जाता है।सो एक सूत्र रटा दिया गया कि हमेशा अच्छे लोगों का संग करो।

पर दुनिया तो संतो के साथ असन्तों से भी भरी पड़ी है तो कैसे चुनें सज्जनों को तो उसके भी उपाय गिना दिए गए, आबत ही हरषे नहीं नैनन नहि सनेह, तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसत मेह।रहीम भी पट्टी पढ़ाते रहे रहिमन रहिला की भली जो परसे चित लाय, परसत चित मैलो करे सो मैदा जरि जाए।कबीर भी हाथ भर आगे बढ़ आये रूखी सूखी खाय के ठंडा पानी पीब, देख पराई चूपरी मत ललचावे जीभ।सो अच्छे बनने भले बनने और बुरों से बचने की सीख सब देते रहे पर दुनिया में केवल अच्छे ही अच्छे थोड़े ही भरे पड़े हैं तो यह भी सिखा बता दिया गया कि कहो रहीम कैसे निभे बेर केर को संग, वे डोलत रस आपने उनके फाटत अंग।फिर भी ऐसों के साथ रहना ही पड़ जाए तो जिमि दसनन महुँ जीभ बिचारी जैसे रहो, विभीषण रहा कि नहीं रावण की लंका में, प्रह्लाद हिरण्यकशिपु के साथ और ध्रुव सुरुचि के साथ जिसने उसे पिता की गोद से ही उतार दिया और माता सुनीति ने भगवान प्राप्ति की राह दिखा दी।तो असज्जन मिल जाये, उनके पड़ोस में बसना ही पड़ जाए तो  उनसे भिडो मत, उपेक्षा भी मत करो उन्हें बुरा लग गया तो तुम्हारी सात पुश्तो तक की खबर ले लेंगे तो तुलसी बाबा लिख गए बन्दो संत असज्जन चरना।अटको मत, अपनी राह चले चलो फिर भी दुष्ट बीच में आ जाये तो हाथ जोड़ लो।भिड़ोगे तो तुम्हारा ही टाइम खोटा होगा, उसका क्या बिगड़ना है भला ,वह तो पहले से ही बिगड़ा हुआ है।

    सो पहले तो कुसंग से बचने की कोशिश करो और जो मान लो कि उनके साथ रहनव ही पड़ जाए तो चन्दन बन के रहो।अपनी प्रकृति उत्तम रखो, तुम क्यों किसी से प्रभावित होते हो, प्रभावित करना ही है तो अपनी सद प्रवृत्ति से उसे प्रभावित करो।देखो चन्दन के वृक्ष पर ढेरों सांप लिपटे रहते है पर चन्दन तो अपनी शीतलता छोड़ उनका विष ग्रहण नहीं करता।बल्कि अपनी खुशबू से उन्हें ही तर रखता है।न मानो तो याद कर लो रहीम दादा की बात.. जो रहीम उत्तम प्रकृति करि सकत कुसंग, चन्दन विष व्यापत नहिं लपटे रहत भुजंग।रात दिन भुजंगों से घिरा रहकर भी अपनी शीतलता नहीं छोड़ता, विष ग्रहण करना तो दूर रहा।सो कैसे बना जाता है चन्दन वृक्ष सा जो जितना घिसा जाता है उतनी ही सुगन्ध देता है, माथे पर लेप करो तो शीतलता देता है।तुलसी इसी चन्दन को लगाने के ब्याज से ही तो राम लक्ष्मण राजकुमारों के दर्शन कर पाते हैं।चित्रकूट के घाट पर भई सन्तन की भीड़, तुलसी दास चन्दन घिसे तिलक देत रघुवीर।

    कैसे हुआ जाता है चन्दन सा शीतल कि दिन रात भुजंगों के मध्य रहकर भी उनका विष तनिक प्रभावित न करे।यहां तो भुजंग ही अपना विष छोड़ते रहते हैं, डसने को हरदम जीभ लपलपाते रहते हैं।सारा दिमाग ही खराब कर देते हैं।सारी की सारी अक्कल घास चरने चली जाती है।उनकी जहर बुझी बातें इतना असर छोड़ जाती है, दिल में ऐसी धंस गढ़ जाती हैं कि उससे आगे कुछ सूझता नहीं है।बहुत पहले एक मित्र ने कहा था क्यों दूसरे की दुष्टता से प्रभावित हो जाते हो, तुम्हारी सज्जनता का असर माहौल पर क्यों नहीं पड़ता।अगला गलत होते भी कैसे प्रभावी हो जाता है और तुम सत्यवादी और सही होते सोते भी उसके जाल में कैसे फंस जाते हो, क्यों इतना प्रभावित हो जाते हो कि अपने को ही चौपट कर बैठते हो।तुम्हारी अच्छाई सज्जनता सामने वाले को प्रभावित क्यों नहीं कर पाती, एक अच्छा हो तो पूरे माहौल को खुशनुमा कर देता है तो तुम कैसे हर बार बुराई के आगे सिर झुका उससे प्रभावित हुए रहते हो, यानी सीधी सी बात है तुम्हें चन्दन होना नहीं आता।हो जाते तो लिपटे रहें भुजंग तुम्हारा बाल बांका भी नहीं कर पाते।कुसंग की आयु ही कितनी होती है, साधु जब अपनी सज्जनता से वाल्मीकि जैसे डाकू को मरा मरा जप में लगा राम का चरित्र लिखबा लेते हैं, बुद्ध अंगुलिमाल की आंखों में आंखे डाल अपने चरणों में झुकने को विवश कर देते हैं, बाबा भारती खड़गसिंह को सुल्तान घोड़े को अस्तबल में बांधने को विवश कर देते हैं तो तुम्हारी अच्छाई तुम्हारी सज्जनता दुष्टों पर प्रभाव क्यों नहीं छोड़ पाती। अब या तो तुम्हारी सज्जनता सोलह आने खरी नहीं ,उसमें कुछ मिलावट है या अगले के संस्कार ऐसे गहरे हैं कि कारी कामर पर दूजा रंग नहीं चढ़ता।सो चन्दन बनो चन्दन कि भले ही सैकडों भुजंग लिपटे रहें पर वह अपनी शीतलता नहीं छोड़े,उस पर विष का प्रभाव हो ही नहीं।सो चन्दन बनो चन्दन।प्रभुजी तुम चन्दन हम पानी, जाकी अंग अंग बास समानी।तुम्हारी सुगन्ध सामने वाले जे नथुनों में घुस जाए, व्याप्त हो जाये,चन्दन विष व्यापत नहीं लपटे रहत भुजंग।और जो रहीम उत्तम प्रकृति का कर सकत कुसंग।vv

बातें हैं बातों का क्या

 सफर जारी है

22.03.2022

बातें मोहक होती हैं,मन मोह लेती हैं, बातों ही बातों में प्यार हो जाता है, बातें गढ़ जाती है, चुभ जाती हैं, बातें खिसिया देती है,बातें उत्तेजित करती हैं, बातें क्रोध दिलाती हैं, बातें आवेश में ले आती हैं, बातें कुछ कर गुजर जाने को प्रेरित करती हैं,बातें जिला देती हैं, बातें जीते जी मार देती हैं, बातें रुला देती हैं, बातें हंसा देती है।आखिर बात बात होती है और जहां सलीके से कही बात आपका सौ दो सौ ग्राम खून बढा देती है तो उज्जडता और बेहूदगी से कही गई बात आपके पूरे सिस्टम को हिला कर रख देती है।

बात अपने में भला होती क्या है  कुछ शब्दों का समुच्च्य ही न ,कभी शब्द मोती की तरह पिरो माला बन जाते हैं तो कहीं क्रोध आक्रोश और जहर उगलते सामने वाले को धड़ धड़ धड़ गिराते चले जाते हैं।कुछ भी साबुत नहीं छोड़ते न दिल न दिमाग।बस एक तीखी तेज कटार से अगला पिछला सब काटते चले जाते हैं।काटते उन्हें यह भी याद नहीं रहता कि वे उसी पेड़ की डाली हैं,शाखा हैं, फूल हैं, पत्ती हैं।मूल पर बार बार चोट करते यदि एकबारगी सब तहस नहस हो गया तो क्या तुम्हारा अस्तित्व बच पायेगा।मूल को सींचे बिना तो पेड़ भी नहीं लहलहाते भले ही फुलक को बाल्टी भर सींचते रहो।पर जब अगला कहता है तो अपने अंदर का सारा गन्द, सारा कीचड़, सारा मैल, सारा आक्रोश, सारी भुनभुनाहट ,सारी खुदगर्जी रह रह कर निकालता जाता है।उसे कब याद रहता है कि उसने क्या क्या कह दिया है।वह तो बस अपने को खाली करता जाता है,करता जाता है और जब एकबारगी खाली हो जाता है तो फिर नए सिरे से अपने को भरना शुरू करता है। सात पुश्तों की बात याद करता है, गढ़े मुर्दे उखाड़ता है, अनेक बार कही गई बातों को बारीक बारीक काटता पीसता है। सुनाने के लिए अपने भार को टांगने के लिए वही खूंटी चुनता है जो सब लाद लेने को तैयार हो, सीमा से अधिक वजन उठा ले, रो झींक भले ले पर अगले का रंच मात्र अहित न करे।

जो ज्यादा बोझ से खूंटी लहक गई कि टूट ही गई तो क्या जल्दी ही नई खूंटी मिल जाएगी, टूटी हुई का क्रियाकर्म तो करोगे या उसे यू ही कबाड़ में डाल दोगे।आखिर तो इतने लम्बे समय तक तुम्हारी कहनी अनकहनी का बोझ चुप उठाये चली जा रही है कि कभी तो अगले को बुद्धि आएगी,कभी तो सोच पायेगा कि आखिर वह बोल क्या रहा है। ऐसों को अपसेट माइंड की श्रेणी में  नहीं रखा जा सकता, वे डिमेंशिया के शिकार तो बिल्कुल भी नहीं है, होते तो उन्हें अपने और अपनो के हित की एक एक बात भला याद रहती , वह अपने को कहीं कच्चा नहीं पड़ने देते, आश्चर्य की बात है लाख गुस्से में हों ,कहीं गच्चा नहीं खाते।विष बुझे तीर जने कहां कहां से निकाल कर लाते हैं कि उनका कोटा कभी खत्म नहीं होता।वे सीखे सिखाये पढ़े पढाये हैं, सारा दिन सी आई डी की तरह नये नये प्लान गढ़ने में लगे रहते हैं।उन्हें इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि कितना बहूमूल्य समय यों ही बीता जा रहा है।सुनने वाले का क्या, वह तो तब तक सुन रहा है जब तक चिपक है ,लाग लपेट है, सम्बन्धो की ऊष्मा है नहीं तो छूटने में भला कितना समय लगता है।चाहे तो सब वहीं का वहीं झाड़ झूड कर मुक्त हो जाये , अगला पिछला  सब हिसाब चुकता कर ले। ब्याज को छोड़ भी दे तो भी मूल ही इतना है कि देते देते चुक भले जाओ पर भाव सम्पदा का दस अंश भी न चुका पाओ।अरे कुछ देना भी सीखो, देना भौतिक सम्पदा का ही नहीं होता,किसी के मीठे वचनों का ही प्रतिदान दे दो।और जो देना सीखे ही नहीं हो तो कम से कम वाणी की शुचिता तो बनाये रखो।अगला तो इतने से ही भर पायेगा।कौन वह तुमसे कुछ लेने आया है, प्यार के दो बोल सबसे बड़ी नेमत कहे जाते हैं, उनमें तो कम से कम कंजूसी मत बरतो।वचने का दरिद्रता।

   फिर ये भी याद रखना जरूरी है कि ये सब खट्टी मीठी बातें किसी को चिपट नहीं जाती, वह तो धूल सी झाड़ कर आगे बढ़ जाता है पर तुम्हारा आंकलन खूब हो जाता है कि कितने पानी में हो।छोड़ो यार ये बातें हैं बातों का क्या।

है हार जीत तुम्हारे हाथों में

 सफर जारी है...875

14.03..2022

भक्त की महिमा न्यारी है।वह अपने ऊपर कुछ भी नहीं लेता, बस उसे भक्ति करनी आती है, प्रभु को भजना आता है।सब ईश्वर का कार्य मानकर करता है फिर परिणाम चाहे कुछ भी हो सब उसकी मर्जी मान लेता है।जीत गए तो भी भले और न जीते,हार गए तब भी कोई बात नहीं।जैसी प्रभु की मर्जी।सब उसे सौंप निश्चिन्त हो जाता है।अब सौंप दिया इस जीवन का सब भार तुम्हारे हाथों में, है जीत तुम्हारे हाथों में है हार तुम्हारे हाथों में।बस दिन रात एक ही निश्चय दोहराता है  मेरा निश्चय बस एक यही एक बार तुम्हें पा जाऊ मैं, अर्पित कर दूं इस जीवन का सब प्यार तुम्हारे चरणों में।अपने पास कुछ भी रखने की इच्छा शेष नहीं।जो जग में रहूं तो ऐसे रहूं ज्यों जल में कमल का फूल रहे,मेरे सब गुण दोष समर्पित हों करतार तुम्हारे हाथों में।जल में कमल वत रहना इतना आसान कहाँ होता है ये तो कमल ही है जो कीचड़ में भी खिला खिला रहता है, कमल नाल भले पानी में डूबी रहे पर पत्तों पर पानी का कोई प्रभाव नहीं, सब बूंदें फिसल जाती हैं।फूल भगवान को चढ़ जाता है,बीज से मखाने बन जाते हैं और नाल कमल ककड़ी सब्जी के काम आ जाती है।अपने पास कुछ नहीं रखता, तेरा तुझको अर्पण के भाव से सब सन्सार को सौंप देता है।उसकी एक मात्र इच्छा है यदि मानुष योनि में जन्म मिले तो बस तेरे चरणों में लगन लगी रहे।यदि मानुष का मुझे जन्म मिले तो तेरे चरणों का पुजारी बनूं, इस पूजा की एक एक रग का हो तार तुम्हारे हाथों में।रसखान भी तो यही मांगते हैं... मानुष हों तो वही रसखान बसों ब्रज गोकुल गांव के गवारिन, जो पशु हो तो कहा बस मेरो चरों नित नन्द की धेनु मँझारन, जो खग हों तो बसेरों करो मिलि कालिंदी कूल कदम्ब की डारन, और पाहन हो तो वही गिरि को जो क्यो छत्र पुरन्दर धारण।नहीं पता कि किस योनि में जन्म मिलेगा बस भक्त तो एक ही बातजानता है पशु पक्षी पत्थर मानव मर्जी जिस योनि में भी जन्म दो रखना आप के चरणों में ही प्रभु, उनसे विलग मत कर देना प्रभु, बस इतनी कृपा बनी रहे।जब इस संसार में आ ही गया, इसकी माया में बन्ध गया फंस गया फिर भी प्रभु एक ही विनती है जब जब संसार का कैदी बनूं, निष्काम भाव से करम करूं,फिर अंत समय में प्राण तजूं निराकार तुम्हारे हाथों में।अंत भी हो तेरी गोद में हो, आंखों में बस तेरी छबि बसी रहे।इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकले ,गोविंद नाम लेके प्राण तन से निकले ।वंशीवट हो श्री यमुना जी का तट हो,मेरा सांवरा निकट हो जब प्राण तन से निकले।मेरे मुख में गंगा जल हो और उसमें तुलसी दल हो, मुख में राम का नाम हो जब प्राण तन से निकले ।मरते मरते भी तेरी छबि आंखों में बसी रहे,बस और कोई इच्छा नहीं है प्रभु।कितनी श्रद्धा कितना विश्वास है भक्त को प्रभु आते जरूर हैं बस दिल की गहराइयों से अन्तस् से सच्चे भाव से उन्हें पुकारना होता है।भगवान और भक्त में बस एक ही भेद है।मुझमें तुझमें बस भेद यही मैं नर हूँ तुम नारायण हो, में मैँ हूँ संसार के हाथों में  संसार तुम्हारे हाथों में।तुम चालक हो हम तो सवारी हैं।बस नाव में बैठ गए, पतवार तो आप ही खेओगे।

बड़ा भरोसा है खेवनहार पर तभी मस्त होकर गाता है भक्त, मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है, करते हो तुम कन्हैया मेरा नाम हो रहा है।सब वही तो करता है, हम तो निमित्त भर हैं फिर भी सारा क्रेडिट अपने ऊपर लेते फूले नहीं समाते कि मैंने किया।पतवार के बिना ही मेरी नाव चल रही है,हैरान है जमाना मंजिल भी मिल रही है,करता नहीं मैं कुछ भी सब काम हो रहा है।सच जब प्रभु पर अगाध विश्वास हो तो काम सिद्ध हो ही जाते हैं।तुम साथ हो तो मेरे किस चीज की कमी है,किसी और चीज की अब दरकार ही नहीं है।बस एक तुझे पा लिया तो और क्या पाना शेष रह गया भला।मैं तो नहीं हूँ काबिल तेरा प्यार कैसे पाऊं,टूटी हुई वाणी से गुणगान कैसे गाऊं, सब तेरी प्रेरणा से ये कमाल हो रहा है।मुझे हर कदम कदम पर तूने दिया सहारा,

मेरी जिंदगी बदल दी तूने कर के एक इशारा,एहसान पे ये तेरा एहसान हो रहा है।प्रभु मैं तो बहुत भटक जाता हूँ पर आप हर बार संभाल लेते हो।तूफान आंधियों में तूने ही मुझको थामा, तुम कृष्ण बन कर आये मैं जब बना सुदामा,तेरे करम से अब ये सरेआम हो रहा है।करते हो तुम प्रभु जी मेरा नाम हो रहा है।प्रभु आपकी कृपा से सब काम हो रहा है।मेरा काम हो रहा है।

भाव तो जागे कि करने वाला कोई और है हम उसके हाथों की कठपुतली हैं, जैसा नचाता है नाचते हैं।सो अपने सब गुण दोष उसे समर्पित कर देने में ही भलाई है।सूरदास की तरह प्रभु जी मेरे औगुन चित न धरो, समदर्शी प्रभु नाम तिहारो चाहो तो पार करो।एक बार विनत होकर देखो तो सही, उसकी शरण गहो तो सही, उसका भजन करो तो सही, न जाने डमडम डीगा डीगा जैसा क्या क्या गाते हो, क्लब में उल्टे सीधे गानों पर थिरकते हो कभी भगवान का नाम भी ले लिया करो, दो चार भजन गुनगुना लिया करो, ठुमक लिया करो, छोटी छोटी गैया छोटे छोटे ग्वाल छोटो सो मेरो मदन गुपाल पर ठुमक लिया करो।देखना कैसा आनंद आएगा, मन खुश हो जाएगा।ये सब भले ही आधुनिकता की श्रेणी में न आता हो और मन को बहुत सुकून मिलता है।प्रभु भी हम तो चाकर तेरे।

लघु न दीजिये डारि

 फर जारी है......871

10.03.2022

लघु न दीजिये डारि.......

लघुता में भी व्यापकता छिपी है।एक छोटा सा दीपक घने अंधकार को अपनी ज्योति से चीर देता है।तभी महादेवी कहती हैं मधुर मधुर मेरे दीपक जल प्रतिक्षण प्रतिपल जीवन का पथ आलोकित कर, अज्ञेय भी यह डीप अकेला मदमाता इसको भी पंक्ति दे दो लिखते हैं।बिहारी के दोहे तो देखने में भले छोटे हों पर घाव बड़े गम्भीर करते हैं सतसैया के दोहरे ज्यों नाविक के तीर, देखन में छोटे लगे घाव करे गम्भीर।छोटी मिर्च बड़ी तेज बलमालोक में खूब प्रचलित है ही।रहीम तो दोहे दर दोहे रचते ही हैं रहिमन देख बड़ेन को लघु न दीजिये डारि, जहां काम आवे सुईं कहा करे तलवारि।सच ही तो बै छोटी सी बित्ते भर की सुई फ़टे हुए कपड़ो को सी देती है, सारे छिद्रों को रफू कर देती है, सुई का काम जोड़ने का है इसलिए दर्जी भी उसे टोपी में लगाता है, उसमें लम्बा धागा डाल के रखता हैं कहीं वह निगाह से बिलट न जाये।उसी छोटी सी नुकीली पैनी सुई से पैर में गड़ा कांटानिकाल लिया जाता है, कोई बड़े अस्त्र शस्त्र के साथ लड़ने आये पर आप छोटी सी सुई चुभोकर उसके सारे वार खाली कर देते हैं।अब सुई इतनी महत्वपूर्ण है तभी सबको जोड़ कर रख पाती है।कैंची का तो काम ही काटना है वह तो अच्छे भले नए कपड़े को भी अनेक टुकड़ो में बांट देती है वह तो सुई का ही बूता है कि सारे टुकड़ों को करीने से जोड़ कर बिल्कुल नाप की सुंदर पोशाक में बदल देती है।कैंची का काम कतरना है इसलिए दर्जी उसे पैरों के पास ही रखता है।अब चाहे जुबान हो जो कैंची सी कतर कतर चलती है और सबका बुरा बना देती है या फिर कैंची हो काम तो दोनों का एक ही है।

छोटी सी चींटी विशालकाय हाथी की सूंड में घुस जाए तो उसकी नाक में दम कर देती है, बेचारा घण्टों परेशान रहता है याद आ गई होगी दर्जी हाथी की कहानी कि कैसे दर्जी के लड़के के द्वारा फल न दिया जाकर उसकी सूंड में सुई चुभो देता है और हाथी तालाब का गंदा पानी सूंड में भरकर उसकी दुकान में डाल देता है।बस जैसा करो वैसा भुगतो।

किHछोटी सी चीटी पानी में पत्ता डाल कर फाखते को बाहर आने में भी सहायता करती है।शिकारी के पैर में काटकर उसका ध्यान बंटा देती है और पक्षी की जान बच जाती है।छोटी है तो क्या हुआ बड़े बड़े जो कर नहीं पाते उसे चुटकी बजाते कर देती है।चना न चब्बू कहानी में चिड़िया का दाना चिरी हुई लकड़ी के बीच फंस जाता है उसकी मदद चूहा बिल्ली राजा रानी बढ़ ई कोई नहीं करता, सब उसे टरका देते हैं लेकिन छोटी सी बेमालूम सी चींटी हाथी की सूंड में घुसकर उसे परेशान कर देती है और हाथी परेशान होकर वही करता है जैसा चीटी चाहती है।अंत में बढई लकड़ी चीर ढ़ेता है और नन्ही प्यारी चिड़िया को उसका दाना मिल जाता है वह दौल का दाना खुशी से चाब लेती है।

एक और कहानी याद आती है जिसमे सोते सिंह राजा को छोटा चूहा उस्ककी नाक पर चढ़ कर परेशान करता है, शेर को गुस्सा आता है वह चूहे लो अपने पंजे में दबा कर खतम करना ही चाहता है पर चूहा निवेदन कर लेता है मुझे आप छोड़ दें, कभी मैं भी आपके काम आ स्कता हूँ।शेर को हंसी आ जाती  है भला ये मरगिल्ला सा चूहा मेरी क्या सहायता करेगामममममKपर दयावश उसे छोड़ देता है।भाग्य का खेल देखिए कि वही छोटा चूहा शेर के जाल में फंसने पर अपने दोस्तों को साथ लेकर जाल काट देता है।वह तो इतना बहादुर है कि चित्रग्रीव कबूतरों की सहायता भी व्याध बहेलिया के जाल को काटकर करता है।

सच तो यह आकार प्रकार में छोटे होने से कुछ नहीं होता,सारा खेल बुद्धि का है।जहां छोटी सी सुई से काम चल जाए वहां भला तलवार का क्या काम।युद्ध हमेशा तलवारों से ही नहीं लड़े जाते,  समझदारी से भी बात बन जाती है।बात कहने का सलीका हो तो मधुर वचन से भी काम चल जाता है।सो आकार की लघुता पर ध्यान मत दो।बस ये देखो यदि अगला बुद्धि से छोटा है तो जरूर सावधान रहें।ये अक्कल से पैदल लोग खुद तो अपना कबाड़ा करते ही हैं साथ वाले को भी ले डूबते हैं।तो ऐसे लघु सोच वालों से दूरी बरतने में ही भलाई है।

शक्ति का नाम ही नारी है

 सफर जारी है.

09.03.2022

शक्ति का नाम ही नारी है.......

लो जी कर लो बात, जो शक्ति का स्वयम आगार हो, वह भला कमजोर कैसे हो सकती है, हां,कोमलता उसकी प्रकृति है पर कोमल होने से कोई कमजोर थोड़े ही हो जाता है।याद तो होगा कोमल है कमजोर नहीं तू शक्ति का नाम ही नारी है, जग को जीवन देने वाली मौत भी तुझसे हारी है।दुनिया में जीने के लिए  बल पहली आवश्यकता है और यह बल धन शक्ति और विद्या का होता है।धन की अधिष्ठात्री लक्ष्मी, विद्या की सरस्वती और शक्ति की दुर्गा हैं और तीनों स्त्री का ही प्रतिरूप है।तीनों शक्तियों ने अपने अपने वाहन भी निश्चित कर रखे हैं एक शेर पर सवारती है दूसरे उलूक पर तो तीसरी हंस पर।सौभाग्य से तीनों ही देवी के रूप में पूजी जाती हैं।बसन्त पंचमी पर मां सरस्वती, दीपावली पर महालक्ष्मी और नवदुर्गो में दुर्गा का आराधन वंदन पूजन होता है।अब यदि ये त्रिदेवियाँ शक्ति का आगार है तो हम स्त्रियां भी तो इनका ही प्रतिरूप हैं, हम भला कमजोर क्यों कही जाएंगी।

इतिहास साक्षी है खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी, विद्योत्तमा अपाला अनुसूइया के किस्से अभी पुराने नहीं पड़े, सावित्री अपने पातिव्रत बल से यमराज के मुंह से अपने पति को छुड़ा लाई, इस कथा को  हर बरस बडमावस पर ताजा कर लिया जाता है।वह विद्या बुद्धि में अपना लोहा मनवा चुकी है, अंतरिक्ष तक पहुंचकर उसने अपनी शक्ति को सिद्ध कर दिया, धनोपार्जन में वह किसी से पीछे नहीं।फिर भी वह दीन हीन उपेक्षिता क्यों है।क्या उसे अपनी शक्ति का विस्मरण हो गया है, क्या उसे हनुमान की भांति याद दिलाना पड़ेगा कि का चुप साधि रहे बलबाना।क्या वह अपने मार्ग से भटक गई है, क्या स्वतंत्रता के सही अर्थ को समझने में उससे कहीं चूक हो गई है, आखिर उसे मुक्ति चाहिए किससे,उसने अपने पैरों में खुद अपने सोच की बेदी तो नहीं डाल रखी है।कहीं उसने खुद को खूंटे से बंधा हुआ तो नहीं समझ लिया है जबकि खूंटे का अस्तित्व तो है ही नहीं, बस लम्बे समय से बंधे रहते उसे इसकी आदत सी पड़ गई है जबकि खूंटे तो कब के उखाड़ फैंक दिए गए हैं।उसने अपने घेरे स्वयम ही तैयार किये हैं और उसी में आबद्ध होकर रहना उसे रास आ गया है।

और मजे की बात यह है कि ये सब उसने स्वेच्छा से चुना है, उसे इस सब में आनन्द आता है, अपनों को भरपेट भोजन खिला कर उसे किसी मानसिक तृप्ति होती है, जन्म देते वह कैसे गौरव से भर उठती है, गृह लक्ष्मी है वह, घर की कल्पना ही उसी से है गृहणी ग्रहम उच्चयते, बिन घरनी घर भूत का डेरा।अरे सुबह से शाम तक वह परिवार के लिए ही खटती है न, इसको ये दे उसको वे दे, घर भर की छोटी से छोटी जरूरत का ध्यान रहता है उसे।आखिर वह अपने परिवार की स्वामिनी है।मकान पुरुष भले अपने बाहुबल से बना लेता हो पर घर तो उसे स्त्री ही बनाती है।वह अष्टभुजा होती है तभी न सारे काम जल्दी जल्दी सिलटा लेती है।उसे अव्यवस्था से अनख होती है सो आगे बढ़कर अपनी सारी थकान को भूलभाल कर पहले सब व्यवस्थित करने लगती है तब मुंह में हाथ देती है।उसे भला कौन निर्देशित करेगा वह खुद ही दिन भर सबको सही मार्ग सुझाती बताती रहती है।फूल से अधिक कोमल है तो वज्र से भी अधिक कठोर है।बस एक बार निश्चय कर ले तो पहाड़ को भी फूंक से उड़ा दे, कितनी भी कमजोर हो पर बच्चे की रक्षा के लिए तो रणचण्डी बन जाती है, अकेले ही दस बीस से भिड़ जाती है।वह आग का गोला है उस आग को चूल्हे के बीच सीमित कर दिया जाए तो हद भर के लिए भोजन तैयार हो जाता है और सीमाएं लांघ ले तो सब स्वाहा कर देती है।प्यार स्नेह की डोर से बांधो तो अपना सर्वस्व न्योछबर कर देती है पर उसे बेबजह बल और शक्ति से जंजीरों से जकड़ा जाय तो सारे बन्धन एक झटके में छिन्न भिन्न कर देती है।उसके भीतर सृष्टि और प्रलय दोनो पलती है।उसे कमजोर समझने की भूल भी मत कर लेना।अभी वह मार्ग से भटकी हुई है जिस दिन उसे बोध हो गया, अपनी शक्ति का स्रोत पता चल गया, अपने अस्तित्व का भान हो गया, वह नींद से जाग उठी, सब बदल जायेगा।नभी तो वह इस बात से बेखबर है उसे अपनी शक्तियों का भान ही नहीं, वह मार्ग भटक गई है, दुनिया की चकाचोंध में भटक गई है, सेमल के फूल के पीछे ताबड़तोड़ दौड़ भाग कर रही है।आनन्द स्रोत को पकड़ नहीं पाई है, आनन्द स्रोत बह रहा फिर क्यों उदास है आश्चर्य है कि जल में रहकर भी मछली को प्यास है। 

घर से तो शुरुआत होती है उसका परिवार बड़ा व्यापक है, एक घर में पलती है तो दूसरे घर को आकार देती है।माता पुता भाई बहिन के साथ नए रिश्तों को भी बखूबी निभा ले जाती है।उसे क्या परवाह उसके तो एक नहीं दो दो घर है, दो घरों का सम्बल उसके साथ है, एक घर से संस्कार पाती है तो दूसरे घर जा उसे बोती है।उसे तो दो घरों का प्यार मिलता है दशरथ से ससुर कौशल्या सी सास और लक्ष्मण से देवर उसकी कामना में रहते हैं।मान देती है मान पाती है।आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर उसे कई कई मंचों से सम्मानित किए जाने के उपक्रम हैं पर सबसे बड़ा सम्मान तो उसे अपने गौरव को याद कर मिल जाता है।उसमें सबको साथ ले कर चलने की शक्ति है, सबको एक सूत्र में बांध कर रखना जानती है वह।उसे सम्मानित करते पुरस्कार स्वयं सम्मानित होते हैं।उसके सामने संभावनाओं का खुला आकाश है, उसके पंख भी मजबूत हैं वह ऊंची उड़ान भरने को तत्पर है।उसकी दृष्टि कितनी भी दूर तक हो पर वह पैरों के नीचे की जमीन नहीं छोड़ती, जड़ों से सदैव जुड़ी रहती हैं, जानती है रहिमन सींचे मूल को फूले फल अघाय।केवल फुलक को सींचने से कुछ नहीं होता।

मानवी हो तुम, दुनिया को तुमसे बहुत सी आशाएं हैं।सच में तुम्हारे अंदर आशासों सम्भावनाओ का अथाह सागर लहराता है, बस अपनी शक्ति को पहचानो, सारे कुहरे को छांट दो, सूरज तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है, डरो मत, पूरी कायनात तुम्हारे साथ है।बस लक्ष्य से भटक मत जाना।सारा जहां तुम्हारा है।कोमल भले ही हो पर कमजोर नहीं हो, शक्ति की स्रोत हो बस पहचानो उसे और स्वयमसिद्धा और खूब सामर्थ्यवान बनो।शक्ति अपने अंदर से आती है बाहर से इंजेक्ट करने से नहीं।शक्ति की आगार तुम्हें शत शत नमन।

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...